नई दिल्ली, आज से 36 साल पहले मध्य प्रदेश के भोपाल में एक ऐसी मनहूस रात आई जिसने एक झटके में हजारों लोगों की जिंदगी लील ली. मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल इस भयावह रात की गवाह बनी. 1984 में 2 और 3 दिसंबर की दरमियानी रात जहरीली गैस के रिसाव ने सो रहे हजारों लोगों की जान ले ली.

36 साल पहले भोपाल के काजी कैम्प और जेपी नगर (अब आरिफ नगर) और उसके आसपास के इलाके के लोग रात का भोजन करके सो रहे थे लेकिन आधी रात के वक्त आरिफ नगर स्थित अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में मौजूद तमाम गैस के टैंकों में से एक टैंक नंबर 610 से ऐसी खतरनाक गैस का रिसाव हुआ जिसकी वजह से हजारों लोगों की जान चली गई. यही नहीं इस खतरनाक गैस का असर अगले कई सालों तक रहा और हादसे के बाद भी यहां के लोगों को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.

40 टन गैस का रिसाव

बताया जाता है कि यूनियन कार्बाइड की फैक्ट्री से करीब 40 टन गैस का रिसाव हुआ था. रिसाव की वजह यह थी कि टैंक नंबर 610 में जहरीली मिथाइल आइसो साइनेट गैस (मिक) का पानी से मिल जाना. इस वजह से हुई रासायनिक प्रक्रिया की वजह से टैंक में दबाव पैदा हो गया जिससे टैंक खुल गया और उससे निकली गैस ने कुछ ही देर में हजारों लोगों की जान ले ली. 

गैस का रिसाव रात 10 बजे के आसपास हुआ और 11 बजे के बाद इसका असर दिखने लगा और कुछ ही देर में आसपास के क्षेत्रों में फैल गया. बड़ी संख्या में कुछ ही देर में लोग मारे गए.  

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक यूनियन कार्बाइड संयंत्र से रिसी जहरीली गैस 'मिथाइल आइसो साइनेट (मिक)' गैस की चपेट में आकर मरने वालों की आधिकारिक संख्या 4 हजार से कम है, लेकिन दावा किया जाता है कि इस हादसे में 16 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी.

मध्य प्रदेश सरकार के आंकड़ों के अनुसार इस गैस त्रासदी से कुल 5,74,376 लोग प्रभावित हुए थे तो वहीं, 3,787 लोगों की मौत हुई थी. हालांकि शुरुआत में गैस रिसाव की वजह से मरने वालों की संख्या 2,259 बताई गई थी जिसे बाद में अपडेट किया गया.

2006 में सरकार द्वारा दाखिल एक शपथ पत्र में यह माना गया कि गैस रिसाव से करीब 558,125 सीधे तौर पर प्रभावित हुए और आंशिक तौर पर प्रभावित होने की संख्या लगभग 38,478 थी. 3,900 लोग तो बुरी तरह प्रभावित हुए और अपंगता के शिकार हो गए.

यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन (यूसीसी) ने 2-3 दिसंबर, 1984 की रात को यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से जहरीली गैस के रिसाव के बाद 470 मिलियन अमेरिकी डालर (सेटेलमेंट के समय 715 करोड़ रुपये) का मुआवजा दिया, जिसमें 3,000 से अधिक लोगों की मौत हो गई और 1.02 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए.

ज्यादा मुआवजे की मांग
हालांकि भोपाल गैस कांड के पीड़ित लोग ज्यादा मुआवजे की मांग कर रहे हैं. दिसंबर 2010 में केंद्र सरकार ने सुधार याचिका लगाकर अतिरिक्त मुआवजा 7,844 करोड़ रुपये की मांग की थी. मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है.

7 जून 2010 को, भोपाल की एक अदालत ने यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल) के सात अधिकारियों को हादसे के सिलसिले में दो साल की सजा सुनाई थी, हादसे के वक्त UCC के अध्यक्ष वॉरेन एंडरसन मामले में मुख्य आरोपी थे, लेकिन मुकदमे के लिए पेश नहीं हुए.

1 फरवरी 1992 को भोपाल CJM कोर्ट ने उन्हें फरार घोषित कर दिया था. भोपाल की अदालत ने एंडरसन के खिलाफ 1992 और 2009 में दो बार गैर-जमानती वारंट जारी किया था. सितंबर, 2014 में एंडरसन का निधन हो गया.

आज भी दिखता है असर
दुनिया के भयानक औद्योगिक त्रासदियों में से एक भोपाल गैस त्रासदी का असर आज भी दिखता है. इस क्षेत्र में आज भी बड़ी संख्या में लोग किसी न किसी दिक्कत का सामना करते हैं. इन क्षेत्रों में रहने वालों ज्यादातर लोगों को सांस से जुड़ी दिक्कतें होती हैं. बच्चे विकलांगता का शिकार होते हैं.

गुजरते वक्त के साथ-साथ गैस त्रासदी के पीड़ितों का दर्द कम होने की बजाए बढ़ता ही गया. इन करीब साढ़े तीन दशकों में राज्य और केंद्र में सरकारें बदलती रहीं, लेकिन पीड़ितों की किस्मत नहीं बदली. मदद के लिए बड़ी संख्या में लोग भटकते रहे लेकिन कई तो आस लगाए ही इस दुनिया से चले भी गए.

अब कोरोना के शिकार 

मध्य प्रदेश सरकार ने बुधवार को कहा कि कोरोना वायरस महामारी की वजह से भोपाल गैस त्रासदी से बचे 102 लोगों की मौत हो गई है जबकि कुछ गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) ने दावा किया कि भोपाल त्रासदी में बचे 254 लोगों ने अब तक महामारी की वजह से जान गंवाई है.