उत्तर-पूर्वी जिले में हिंसा को शुरू से संभालने में पुलिस से चूक हुई है। पुलिस भड़काऊ भाषण देने वाले को शुरू में काबू नहीं कर पाई। दोनों ही पक्षों के लोगों को आमने-सामने आने से रोक दिया जाता, तो हिंसा नहीं होती। शुरू में देखा गया कि हिंसा प्रभावित इलाकों में पर्याप्त संख्या में पुलिस बल नहीं था। ये कहना है दिल्ली पुलिस के पूर्व पुलिस आयुक्तों व पुलिस अधिकारियों का।
दिल्ली के पूर्व पुलिस आयुक्त अजय राज शर्मा का कहना है कि उत्तर-पूर्वी जिले में हुई हिंसा को दंगों के रूप में देखना चाहिए। उनका कहना है कि इस बात की जांच होनी चाहिए कि हिंसा बढ़ कैसे गई, इसकी जांच होनी चाहिए। दिल्ली पुलिस के पूर्व डीसीपी एलएन राव का कहना है कि दिल्ली पुलिस से हिंसा को शुरू में संभालने में चूक हुई है। 

जब पुलिस को पता चला कि जाफराबाद दूसरा शाहीन बाग बनता जा रहा है तो पुलिस ने ऐसा क्यों करने दिया। पुलिस में अब ये परेशानी हो गई है कि वह जनता से दूरी बनाकर रखती है।

थानाध्यक्ष स्थानीय लोगों से नहीं मिलते हैं। पुलिस जनता के लिए है और जनता से ही दूरी बनाकर रखी जाती है। उनका कहना है कि हिंसा शुरू में संभल जाती तो संभल जाती। पुलिस ने सख्त कदम बहुत ही देर से उठाए हैं। जिला स्तर के अधिकारियों की गलती है।

पूर्व पुलिस आयुक्त अमोद कंठ का कहना है कि पुलिस से चूक हुई है। दिल्ली पुलिस ने शुरू में पर्याप्त फोर्स क्यों नहीं उतारी। दिल्ली पुलिस में फोर्स की कमी नहीं है। सवाल उसके इस्तेमाल पर निर्भर करता है। जब वहां एक प्रदर्शन पहले से चल रहा था तो सीएए के समर्थकों को प्रदर्शन की अनुमति नहीं देनी चाहिए। उन्होंने इसे दिल्ली पुलिस की नाकामी बताया है।

पूर्व पुलिस आयुक्त टीआर कक्कड़ का कहना है कि ऐसी हिंसा अभी तक नहीं देखी। वर्ष 1968 में ऐसे हालत पैदा हुए थे। इस हिंसा को सीएए से जोड़कर नहीं, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति के दौरे से जोड़कर देखना चाहिए।