हमारे समाज का ताना-बाना औरत और मर्द से मिलकर बना है। लेकिन हमारे समाज का हिस्सा एक तीसरा जेंडर भी है, किन्नर समुदाय। जो ना औरत होता है और ना ही मर्द। इस वर्ग को सभ्य समाज में अच्छी नजर से नहीं देखा जाता। हमारे यहां इनके कई नाम होते हैं, किन्नर, हिजड़ा और न जाने क्या-क्या। किन्नर समुदाय का रहन-सहन साधारण मनुष्यों से बिल्कुल अलग होता है। इनसे जुड़े कई राज लोगों को पता नहीं होते।

रीति-रिवाजों का पालन:

महिलाओं और पुरुषों से बिलकुल अलग जीवन जीने वाले किन्नर अपने रीति-रिवाजों का पालन जरुर करते हैं। किन्नरों की दुनिया में भी काफी रिवाज हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक इनके नियम आम लोगों से बिल्कुल अलग होता है।

एक दिन के लिए होती है शादी:

किन्नरों की अपनी एक अलग दुनिया होती है। और ये सिर्फ अपने समुदाय के साथ रहते हैं। किन्नरों की शादी सिर्फ एक दिन के लिए उनके आराध्य देव आरावन से होती है। शादी के अगले ही दिन अरावन देवता की मौत हो जाती है और इनका वैवाहिक जीवन खत्म हो जाता है। इनके भगवान आरावन, अर्जुन और नाग कन्या उलूपी की संतान हैं। जिन्हें इरावन के नाम से भी जाना जाता है।

रात में निकाली जाती है शवयात्रा:

किन्नर की मृत्यु के बाद इनके शव को सभी से छिपा कर रखा जाता है। किन्नरों की शव यात्रा रात में चुपचाप निकाली जाति है। ऐसा माना जाता है की रात में शव यात्रा इसलिए निकाला जाता है ताकि कोई इंसान इनकी शव यात्रा न देख सके। साथ ही इस बात का भी ख्याल रखा जाता है कि इनकी शव यात्रा में किसी और समुदाय के किन्नर सम्मिलित न हों। कहा जाता है कि यदि किसी गैर किन्नर नें शव को देख लिया तो वह दिवंगत किन्नर फिर से अगले जन्म में किन्नर ही बनेगा इसलिए उसकी मुक्ति के लिए ही रात में शवयात्रा न‍िकाली जाती है।

जूते-चप्पलों से पीटते हैं शव को:

जानकारी के मुताबिक किन्नर समुदाय अंतिम संस्कार से पहले डेड बॉडी को जूते-चप्पलों से पीटते हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे उस जन्म में किए सारे पापों का प्रायश्चित हो जाता है।

अंतिम संस्‍कार:

किसी की मौत होने के बाद पूरा समूचा किन्नर समुदाय एक हफ्ते तक भूखा रहता है। इनके शवों को जलाया नहीं जाता, बल्कि दफनाया जाता है।