लखनऊ जिला न्यायालय में हिंसा की घटना: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डीसीपी से जांच पूरी करके एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट दाखिल करने को कहा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डीसीपी, पश्चिम क्षेत्र, लखनऊ को 30 अक्टूबर को लखनऊ जिला न्यायालय परिसर के बाहर वकीलों के हिंसक व्यवहार पर एक रिपोर्ट दाखिल करने के लिए कहा।

न्यायमूर्ति शमीम अहमद और न्यायमूर्ति राकेश श्रीवास्तव की खंडपीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 30 नवंबर की तारीख तय की, जब पुलिस उपायुक्त, लखनऊ सोमेन बरमा ने जांच पूरी करने और आदेश के संदर्भ में रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए एक सप्ताह का और समय मांगा।

दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 17 नवंबर को लखनऊ जिला न्यायालय हिंसा की घटना की जांच के आदेश दिए थे।

कोर्ट ने कहा था कि अदालत मूकदर्शक के रूप में वकीलों के गैर-पेशेवर और अनियंत्रित व्यवहार को नहीं देख सकती है।

डीसीपी बरमा द्वारा प्रस्तुत की गईं तस्वीरों (संख्या में 32) के साथ-साथ प्रभारी जिला न्यायाधीश, लखनऊ द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के साथ 18 नवंबर, 2021 की एक रिपोर्ट को रिकॉर्ड में लिया गया।

कोर्ट के समक्ष मामला

कोर्ट न्यायालय लखनऊ में प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ताओं द्वारा दायर एक याचिका पर विचार कर रहा था, जिसमें एक जिम्मेदार प्रशासनिक या न्यायिक अधिकारी की नियुक्ति की मांग की गई थी, जो कि पुराने उच्च न्यायालय भवन के गेट 6 के निकट लखनऊ जिला न्यायालय परिसर के पास 30.10.2021 को हुई हिंसक घटना की जांच की मांग की गई थी।

मामले के कथित तथ्यों के अनुसार 30 अक्टूबर को अयोध्या प्रचार में आरोपी व्यक्तियों को जमानत बॉन्ड भरने का आदेश दिया गया था। हालांकि, एक सतीश कुमार वर्मा ने खुद को एक वकील होने का दावा करते हुए याचिकाकर्ताओं को आरोपित किया और उन्हें आरोपी व्यक्तियों के जमानत बांड को फाइल न करने के लिए कहा।

फिर भी लगभग 3 बजे शैलेंद्र कुमार मिश्रा ने जमानत बांड के साथ-साथ जमानत की जांच की और लगभग 4 बजे आरोपी व्यक्तियों को जमानत पर रिहा कर दिया गया।

इसके बाद आरोप है कि उसी दिन शाम करीब 4.40 बजे, 30 से 40 अधिवक्ताओं ने गेट नंबर 6, ओल्ड हाईकोर्ट बिल्डिंग के पास याचिकाकर्ताओं को घेर लिया और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया और याचिकाकर्ताओं के साथ बुरी तरह मारपीट की।

वजीरगंज थाने में भी प्राथमिकी दर्ज करायी गयी है। यह भी कहा गया कि लखनऊ के जिला न्यायालयों में वैध कर्तव्यों का पालन करना सुरक्षित नहीं है क्योंकि वादियों, पुलिस कर्मियों और वकीलों के साथ हिंसा आज का नियम बन गया है।

केस का शीर्षक - पीयूष श्रीवास्तव (व्यक्तिगत रूप से) एंड अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के माध्यम से प्रिंट सिपल सचिव एंड अन्य।