हाईकोर्ट ने हाल ही में पुडुचेरी में एक स्कूल शिक्षक को एक नाबालिग छात्रा के यौन उत्पीड़न के आरोप से बरी करने के निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि चार साल के बच्चे से यौन उत्पीड़न के संबंध में ठोस गवाही या सबूत देने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। शिक्षक अर्लम पेरीरा को पोक्सो एक्ट के तहत दो मामलों में सजा सुनाई गई थी। जस्टिस पी वेलमुरुगन ने कहा, "पीड़िता एक बच्ची है, जो घटना के समय केवल 5 वर्ष की थी, वह तोते के जैसी घटना के सभी चरणों के बारे में बात नहीं कर सकती और उससे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि उसे सभी घटनाओं और आरोपी के कृत्यों को याद रखना चाहिए। .. उक्त कारण से हम पीड़ित बच्चे के साक्ष्य को अनदेखा नहीं कर सकते, जो वास्तव में प्रतिवादी/अभियुक्त द्वारा यौन उत्पीड़न का शिकार हुई थी।"



उससे पहले 27 मार्च 2018 को आरोपित ने बच्ची को कथित तौर पर धमकी दी थी कि अगर उसने किसी को इसके बारे में बताया तो वह उसे जान से मार देगा। बच्ची इसके बाद से काफी डरी हुई थी, लेकिन उसने हिम्मत कर 2 अप्रैल 2018 को अपनी माँ को इन घटनाओं के बारे में बताया। इसके बाद आरोपित अर्लम पेरीरा के खिलाफ पोक्सो अधिनियम की धारा 6 और 10 और आईपीसी की धारा 506 (ii) के तहत मामला दर्ज किया गया था। 

जब यह मामला निचली अदालत में पहुँचा तो आरोपित को बरी कर दिया गया था। निचली अदालत ने छह अक्टूबर, 2020 के अपने आदेश में आरोपित को यह कहते हुए बरी किया था कि पीड़ित बच्ची के माता-पिता के बयान सुसंगत नहीं हैं। पुडुचेरी के लोक अभियोजक डी. भरत चक्रवर्ती ने दलील दी थी कि पीड़िता बच्ची है और मार्च 2018 में घटना के समय वह केवल चार वर्ष की थी। लेकिन अदालत ने इस पर गौर नहीं किया। इस फैसले को मद्रास हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। 



मद्रास उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए कहा है कि चार साल की बच्ची से यौन उत्पीड़न के संबंध में ठोस गवाही या सबूत देने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। हाई कोर्ट ने शिक्षक अर्लम पेरीरा को पोक्सो एक्ट के तहत दो मामलों में 10,000 रुपए के जुर्माने के साथ 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है।