वैज्ञानिक बोले – हरित क्रांति से उपज तो बढ़ी, लेकिन अब पुरानी खेती-बाड़ी और पारंपरिक बीजों की तरफ लौटने का समय

0
0

नई तकनीक के साथ पारंपरिक खेती भी अहम। – फोटो : ati

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

सीएसआईआर-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (NBRI) में आयोजित 7वीं अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में वैज्ञानिकों ने खेती के भविष्य और पर्यावरण में हो रहे बदलावों पर अहम चर्चा की। सत्र में विशेषज्ञों ने माना कि जहां एक तरफ हमें नई तकनीक अपनानी है, वहीं दूसरी तरफ हमें अपनी पारंपरिक खेती को भी नहीं भूलना चाहिए।

पुरानी किस्मों को फिर से अपनाने की जरूरत
NBRI के निदेशक अजीत कुमार शासनी ने अपने संबोधन में कहा कि पौधों में अपनी बीमारी से लड़ने और खुद को बचाने की प्राकृतिक ताकत होती है। वे अपनी सुरक्षा के लिए कई तरह के रसायन बनाते हैं। किसानों के लिए एक अहम बात साझा करते हुए उन्होंने कहा कि हरित क्रांति के दौरान हमारा पूरा ध्यान खाद और नाइट्रोजन का इस्तेमाल करके सिर्फ पैदावार बढ़ाने पर था। इस दौड़ में हम अपने पुराने, पारंपरिक पौधों की किस्मों और खेती के तरीकों को भूल गए। अब समय आ गया है कि हम उन्हें वापस लाएं।

उन्होंने यह भी बताया कि जीनोम एडिटिंग आज के दौर की एक अहम तकनीक बनकर उभर रही है। इसके जरिए हम फसलों को मजबूत बना सकते हैं और उन कमियों को दूर कर सकते हैं जो पौधों को कमजोर करती हैं।

बढ़ता तापमान और फसलों पर पाले का खतरा
कॉन्फ्रेंस में स्वीडन की यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज के प्रोफेसर ऋषिकेश भालेराव ने बदलते मौसम के खतरों से आगाह किया। उन्होंने बताया कि दुनिया भर में, खासकर ठंडे इलाकों में तापमान तेजी से बदल रहा है। प्रोफेसर भालेराव ने कहा कि बढ़ते तापमान के कारण 1960 के दशक के मुकाबले अब पेड़-पौधों के बढ़ने का समय करीब 10.8 दिन बढ़ गया है। इसके कारण पौधों में फूल आने का समय गड़बड़ा गया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यूरोप और एशिया के ठंडे इलाकों के 35 से 36 प्रतिशत जंगलों पर अब पाले से नुकसान होने का खतरा मंडरा रहा है।

देश-विदेश के विशेषज्ञ हुए शामिल
इस कॉन्फ्रेंस में सिर्फ भारतीय ही नहीं, बल्कि विदेशी वैज्ञानिकों ने भी हिस्सा लिया। इनमें अमेरिका के ‘द कनेक्टिकट एग्रीकल्चरल एक्सपेरिमेंट स्टेशन’ के निदेशक जेसन सी. व्हाइट, क्लेमसन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पुनीत के. द्विवेदी, ICAR-केंद्रीय कृषि वानिकी अनुसंधान संस्थान के निदेशक अय्यानदार अरुणाचलम और बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान के निदेशक महेश जी. ठक्कर शामिल थे।

वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के बीच विचारों के आदान-प्रदान वाला यह सम्मलेन मंगलवार को समाप्त होगा।