रबी अभियान 2025: किसानों के लिए गेहूं, चना, मटर, सरसों, मसूर की वैज्ञानिक खेती का पूरा पैकेज, जानें विस्तार से

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केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नई दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन – रबी अभियान (2025) के अवसर पर बताया कि रबी सीजन 2025-26 के लिए देश का अनाज उत्पादन लक्ष्य 36.25 करोड़ टन निर्धारित किया गया है। कृषि मंत्री ने भरोसा दिलाया है कि देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए हमारे पास पर्याप्त बीज स्टॉक उपलब्ध है। चौहान ने कहा, किसानों व वैज्ञानिकों की मेहनत तथा सरकार की नीतियों से कृषि क्षेत्र की ग्रोथ दर 3.7 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

रबी सीजन की बुआई के लिए 229 लाख मीट्रिक टन बीजों की आवश्कता पड़ेगी। – फोटो : गांव जंक्शन

राज्यों के कृषि विभाग, आईसीएआर से सम्बद्ध 113 संस्थानों, 74 कृषि विश्वविद्यालयों और देशभर में फैले 721 कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) के कृषि क्षेत्र में समन्वित प्रयासों के साथ ठोस कार्यक्रम व रणनीति बनाकर उसे जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए 15-16 सितंबर को दो दिवसीय रबी सम्मेलन आयोजित किया गया था। नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों और केंद्र व राज्यों के प्रतिनिधियों ने इस दौरान रबी 2025 की तैयारियों, उत्पादन लक्ष्यों और रणनीतियों पर मंथन किया।

घटिया खाद-बीज, कीटनाशक बेचने वालों के खिलाफ सरकार कड़ा कानून बना रही है। – फोटो : गांव जंक्शन

सम्मेलन में जलवायु के प्रति सहनशील खेती, गुणवत्तापूर्ण बीज-उर्वरक-कीटनाशक, बागवानी, प्राकृतिक खेती, कृषि प्रसार सेवाओं – केवीके की भूमिका और केंद्र प्रायोजित योजनाओं के समन्वय जैसे विषयों पर चर्चा की गई। दलहन-तिलहन की उत्पादकता बढ़ाने और एकीकृत कृषि प्रणाली को लेकर भी रोडमैप तय किया गया।

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बताया है कि इस बार रबी सीजन का लक्ष्य बीते साल के अनाज उत्पादन से 2.4 प्रतिशत अधिक है। मौसमी उथल-पुथल को देखते हुए उन्होंने किसानों को फसल बीमा कराने की सलाह दी है।

कृषि मंत्री ने कहा है कि देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त बीज स्टॉक उपलब्ध है। नकली या घटिया खाद-बीज, कीटनाशक बेचने वालों के खिलाफ सरकार कड़ा कानून बना रही है। उन्होंने कहा है कि सारे मानदंडों और कसौटी पर खरा उतरने वाले बायोस्टिमुलेंट (जैव उत्तेजक) ही बिक सकेंगे। हम किसानों का शोषण नहीं होने देंगे। 

केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा, देश में खाद्यान्न और फल-सब्जियों की कमी नहीं होने देंगे, भारत को विश्व की फूड बॉस्केट बनाएंगे। सही तकनीक व वैज्ञानिक खेती अपनाकर किसान न केवल आय बढ़ा सकते हैं, बल्कि निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने के साथ ही भारत को विश्व की फूड बॉस्केट बनाने में भी अहम योगदान दे सकते हैं।

रबी अभियान के लिए विस्तृत रूपरेखा तैयार की गई है ताकि उत्पादन बढ़ाया जा सके। – फोटो : गांव जंक्शन

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक प्रो. एम.एल. जाट ने बताया है कि वर्ष 2025-26 में रबी फसल सीजन के दौरान 36 करोड़ टन से अधिक फसल उत्पादन का लक्ष्य तय किया गया है। दलहन-तिलहन की खेती को आगे बढ़ाना है। इसको लेकर विस्तृत रूपरेखा तैयार कर ली गई है और जमीनी काम शुरू कर दिया गया है। 

25 डिग्री तापमान पर शुरू करें गेहूं की बुआई

आईसीएआर-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. राजबीर यादव बताते हैं कि जिन इलाकों के किसान मानसून पूर्व बाजरा की बुआई करते हैं, अगेती मूंग की बुआई करते हैं या धान की खेती करते हैं, वहां खेत सितंबर के अंत या अक्तूबर के शुरुआती हफ्ते में खाली हो जाते हैं। कुछ किसानों के खेत पहले ही खाली होते हैं। ऐसे स्थानों पर गेहूं की अगेती बुआई अक्तूबर के अंत से नवंबर के पहले सप्ताह तक करने से किसान अधिक पैदावार प्राप्त कर सकते हैं।

पत्तियां मुड़ती हुई दिखें या पत्तिया गिरने लगें तो समझ लें कि फसल पानी मांग रही है। – फोटो : गांव जंक्शन

हमेशा सही वेरायटी का चुनाव करें किसान 

जब तापमान 23-25 डिग्री के बीच हो तो गेहूं की बुआई कर दें। लेकिन, जल्दी बुआई के लिए सही वेरायटी का चुनाव जरूरी है। किसान बिना सोचे-समझे कोई भी वेरायटी लगा देते हैं तो बालियां जल्दी निकल आती हैं और फायदे की जगह नुकसान होता है। उपयुक्त किस्मों की बुआई से फसल तैयार होने के लिए लंबा वक्त मिलता है और उपज भी नवंबर में बोई जाने वाली किस्मों से 10-12% अधिक मिलती है।

मौसमी उतार-चढ़ाव के अनुसार करें फसल प्रबंधन। – फोटो : गांव जंक्शन

जनवरी तक कर सकते हैं एचडी-3298 की बुआई
कुछ चुनिंदा वेरायटीज हैं, जिनकी बुआई अक्तूबर के अंत से नवंबर के पहले सप्ताह तक कर सकते हैं। पूसा-एचडी 3385 के अच्छे परिणाम मिले हैं। डीबीडबल्यू-327 भी अगेती बुआई के लिए अच्छी किस्म है। कई किसान खेत खाली होने या फिर अपनी सुविधानुसार जनवरी तक गेहूं की बुआई करते हैं। इसी के अनुरूप वेरायटीज निकाली गई हैं। ऐसी ही एक वेरायटी एचडी-3298 है, जिसकी बुआई नवंबर से जनवरी तक कर सकते हैं। 

एक एकड़ गेहूं की फसल में दें एक बैग डीएपी
एक एकड़ गेहूं के खेत में एक बैग (50किग्रा) डीएपी और तीन बैग यूरिया डालें। आधा बैग पोटाश भी दे सकते हैं। खेत की मिट्टी की स्थिति के अनुसार, जिंक सल्फेट भी जोड़ सकते हैं। इससे अच्छी पैदावार मिल सकती है। फसलो की लगातार निगरानी करते रहें।

रबी सीजन में मसूर की खेती भी बड़े पैमाने पर की जाती है। – फोटो : गांव जंक्शन

देरी से सिंचाई करने से मजबूत होती हैं गेहूं की जड़ें 
पत्तियां मुड़ती हुई दिखें या पत्तिया गिरने लगें तो समझ लें कि फसल पानी मांग रही है। आमतौर पर, 5-6 सिंचाई गेहूं में करनी पड़ती हैं। पहली सिंचाई 5-7 दिन देरी से करें तो जड़ें बेहतर विकसित होती हैं, जो तापमान बढ़ने की स्थिति में फसल को सहारा देती हैं। 

मौसमी उतार-चढ़ाव से अपनी फसल का करें बचाव
तापमान, बारिश और हवा की स्पीड में उतार-चढ़ाव जैसी मौसमी परिस्थितियां फसल को प्रभावित करती हैं। इन मौसमी परिस्थितियों से फसलों को प्रतिरोधी नहीं बना सकते। लेकिन, सही किस्मों के चुनाव और फसल के रखरखाव से इनके असर को कम किया जा सकता है।

एमएसपी पर अपनी फसल बेचने के लिए किसान समय पर पंजीकरण कराएं। – फोटो : गांव जंक्शन

गेहूं की बुआई करते समय सीड ड्रिल से दें फॉस्फोरस

केवीके शाहजहांपुर के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. एन.सी. त्रिपाठी बताते हैं कि धान की कटाई के बाद खेत में बची पराली जलाने के बजाय उसे मल्चर, कल्टीवेटर या हैरो से अच्छी तरह मिलाकर सड़ा दें। खेत में पानी भरकर उसमें 10-15 किलो यूरिया प्रति एकड़ या डिकम्पोजर का प्रयोग करें। मिट्टी परीक्षण के आधार पर पोषक तत्वों का उपयोग करें। धान या गन्ने की फसल के बाद गेहूं की बुआई के लिए खेत तैयार करते समय 150 किग्रा नाइट्रोजन, 60 किग्रा फॉस्फोरस और 40 किग्रा पोटाश प्रति हेक्टेयर दें। 10 किग्रा जिंक प्रति एकड़ खेत में मिलाएं।

नपी-तुली मात्रा में उर्वरकों का उपयोग करने से लागत कम आती है और मिट्टी सुरक्षित रहती है। – फोटो : गांव जंक्शन

सीड ड्रिल से पौधों को फॉस्फोरस सही मात्रा में मिलता है। बुआई के समय फॉस्फोरस सीड ड्रिल के पहले बॉक्स में डालें, ताकि यह बीज के पास मिट्टी में पहुंचकर पौधों को मिलता रहे। बुआई के 20-25 दिन बाद जब फसल में जड़ें बनना शुरू होती हैं तो पहली सिंचाई अवश्य करें। फसल लगभग 30-35 दिन की होने बाद खरपतवार नियंत्रण जरूरी है। उपयुक्त खरपतवारनाशी दवाओं का प्रयोग करें, ताकि गुल्ली डंडा जैसे खरपतावार फसल को नुकसान न पहुंचा सकें।

भारत का कृषि क्षेत्र 15.38 करोड़ हेक्टेयर है, जिसमें अस्थायी फसलें, चारागाह शामिल हैं। – फोटो : गांव जंक्शन

मटर की पूसा प्रगति किस्म : एक फली में 11 दाने 

कृषि विज्ञान केंद्र, बुलंदशहर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. लक्ष्मीकांत सारस्वत बताते हैं कि मटर की फसल नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करके उर्वरता बढ़ाती है। मटर की अगेती किस्मों की बुआई अक्तूबर के मध्य में करें तो किसान कम समय में अच्छी पैदावार के साथ अधिक मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं। मटर की अगेती किस्मों में – पूसा प्रगति, अगेता-6, अर्किल, काशी नंदिनी और पंत मटर-3 शामिल हैं। पूसा प्रगति और अर्किल प्रमुख किस्में हैं। ये दोनों रतुआ रोग प्रतिरोधी किस्में हैं। 

अगेती मटर बोने के लिए 35-40 किग्रा बीज प्रति एकड़ की दर से चाहिए। अर्किल में 5-6 दाने होते हैं, जबकि पूसा प्रगति में 11 दाने होते हैं। पूसा प्रगति 50-60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और अर्किल 30-40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है। अर्किल 50-55 दिन और पूसा प्रगति 60-65 दिन में तैयार हो जाती है। सब्जी वाली मटर की बुआई 20-25 सेंटीमीटर की दूरी पर कतारों में करें। फसल की शुरुआती अवस्था में निराई-गुड़ाई करें। 

गोबर खाद या फिर कम्पोस्ट का उपयोग मटर की खेती में फायदेमंद है। – फोटो : गांव जंक्शन

बुआई से पहले ऐसे करें बीज शोधन 
मटर की बुआई से पहले बीजों को फफूंदनाशक दवाओं से उपचारित करें, ताकि बीज जनित रोगों से बचाव हो सके। बीजों को 5 से 7 सेंटीमीटर गहराई में बोएं। बुआई के लिए देसी हल या सीड ड्रिल का इस्तेमाल कर सकते हैं। खेत में निराई-गुड़ाई नियमित रूप से करें, ताकि खरपतवार न पनप सकें। कीट व रोगों से बचाव के लिए समय-समय पर कीटनाशकों का छिड़काव करते रहें। खेत में जल-भराव न होने दें।

गोबर खाद या फिर कम्पोस्ट का उपयोग
खेत की दो से तीन बार जुताई जरूर करें। इसके बाद, हैरो चलाकर मिट्टी को भुरभुरा और समतल बनाएं। बुआई से पहले खेत में पलेवा करें, जिससे अंकुरण के लिए नमी बनी रहेगी। गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद का उपयोग करें, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी और फसल को भरपूर पोषण भी मिलेगा। अगेती मटर की तुड़ाई के बाद किसान खेत में दूसरी सब्जियां या मक्का उगा सकते हैं।  

चना-सरसों दोनों सूखा सहनशील फसलें हैं। – फोटो : गांव जंक्शन

चना और सरसों की सहफसली खेती से अधिक मुनाफा  

केवीके हमीरपुर के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. राजीव कुमरा सिंह बताते हैं कि वैज्ञानिक तकनीक की मदद से किसान चना और सरसों की सहफसली खेती करें तो अधिक उत्पादन के साथ मोटा मुनाफा मिल सकता है। सहफसली खेती में भूमि का अधिकतम उपयोग होता है और दोनों फसलों से औसतन 20-25 प्रतिशत अधिक आय प्राप्त होती है। चना की फसल मिट्टी में नाइट्रोजन जोड़ देती है, जिससे सरसों की वृद्धि बेहतर होती है। सरसों की गंध से कई कीटों का प्रकोप चने में कम होता है। किसान चने की तीन या चार कतार बुआई करने के बाद एक कतार सरसों की बुआई करें। इस व्यवस्था में सरसों को पर्याप्त धूप, हवा और स्थान मिलता है, जिससे उसका विकास तेजी से होता है। 

ऐसे करें खेत की तैयारी और बुआई
पहले खेत की गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें, फिर दो बार देसी हल या कल्टीवेटर चलाकर पाटा लगा दें। सीड ड्रिल मशीन का उपयोग करते हैं तो नौ कतार की सीट बेल्ट में 5वीं कतार में सरसों की बुआई की जा सकती है। मशीन में बीच की कतार के स्थान पर स्टील का डिवाइडर लगाकर एक हिस्से में सरसों का बीज और बाकी हिस्सों में चना बोया जा सकता है।

चना की फसल  – फोटो : AI Image

फसलों की किस्में और बीज की मात्रा
चना की बुआई 1 से 15 नवम्बर तक कर दें। छोटे दाने वाली किस्मों में 80 किलो और बड़े दाने वाली किस्मों में 100 किलो बीज प्रति हेक्टेयर चाहिए। सरसों के लिए 4-5 किलो बीज प्रति हेक्टेयर चाहिए। चने की प्रमुख किस्में जेजी-36, आरवीजी-204, जेजी-14, आईपीसी 6-77 और राधे हैं। जबकि, पूसा बोल्ड, वरुणा, रोहिणी, सुरेखा, आजाद महक सरसों की किस्में हैं।       

कितनी खाद और कितना पानी 
चना-सरसों की फसल में डीएपी 100 किग्रा/हेक्टेयर दें। मिट्टी परीक्षण के अनुसार, 30 किग्रा सल्फर खेत की तैयारी के समय देें। चना-सरसों दोनों सूखा सहनशील फसलें हैं। हल्की मिट्टी में फूल आने से पहले एक सिंचाई लाभकारी होती है। इस सहफसली खेती में शुरुआती 25-30 दिनों में खरपतवार तेजी से बढ़ते हैं, इसलिए खेत को साफ रखें। रोकथाम के लिए बुआई के तुरंत बाद, किसान पेंडिमेथालिन 30% ईसी 
(1 लीटर/हेक्टेयर) का छिड़काव करें। 

ऐसे करें रोग और कीटों की रोकथाम
चना में उकठा रोग तथा फलीछेदक कीट से बचाव के लिए ट्राइकोडर्मा पाउडर 5 ग्राम प्रति किलो बीज दर से शोधन करें। सरसों में माहू कीट का प्रकोप होने पर इमिडाक्लोप्रिड का छिड़काव करें। किसानों को चाहिए कि दोनों फसलों की निगरानी नियमित रूप से करें और कीटों का प्रकोप अधिक दिखे तो फेरोमोन ट्रैप का भी उपयोग कर सकते हैं।

किसान सरसों के खेत में मधुमक्खियों के बक्से रखकर शहद उत्पादन भी कर सकते हैं। – फोटो : गांव जंक्शन

सरसों के साथ शहद उत्पादन करके अपनी कमाई बढ़ाएं किसान 

किसान सरसों की खेती के साथ मधुमक्खी पालन करें तो कम लागत में दोगुना लाभ कमा सकते हैं। सरसों और मधुमक्खियों की जुगलबंदी से उपज 15 से 20 फीसदी तक बढ़ जाती है और शहद उत्पादन से अतिरिक्त कमाई भी होती है। सरसों की फसल के साथ मधुमक्खी पालन करने से किसानों को कम लागत में दोगुना फायदा हो सकता है। सरसों की खेती मध्य सितंबर से मध्य अक्तूबर के बीच की जाती है। यह अवधि सरसों की फसल के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। 

प्रति हेक्टेयर ऐसे मिल सकती है 20-25 हजार रुपये अतिरिक्त आय 
मधुमक्खियां खेत के 1-2 किमी के दायरे में फूलों पर बैठकर परागण करती हैं। इस प्रक्रिया से सरसों की फलियों में बीज बनने की दर बढ़ जाती है, जिससे उत्पादन बढ़ता है। किसान 1-2 हेक्टेयर खेत में 2-3 मधुमक्खी बक्से रखें तो प्रति हेक्टेयर औसतन 4 क्विंटल अतिरिक्त उपज मिल सकती है। वर्तमान बाजार दर के अनुसार, किसान को प्रति हेक्टेयर 20-25 हजार रुपये अतिरिक्त आय हो सकती है।

सरसों की खेती के साथ मधुमक्खी पालन – फोटो : AI Image

एक बॉक्स से निकलता है औसतन 25-30 किलो शहद
मधुमक्खी पालन से किसानों को शहद उत्पादन का भी लाभ मिलता है। एक बॉक्स से औसतन 25-30 किलो शहद निकलता है, जिसका बाजार मूल्य 150-200 रुपये प्रति किलो तक होता है। किसान सीजन में 3-4 बार शहद निकालकर अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं। यदि किसान समय पर शहद निकालते रहें तो मक्खियां लगातार शहद बनाती रहती हैं, जिससे प्रति बॉक्स 7000-8000 रुपये तक आय संभव है।

सब्सिडी और प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाती रहती है सरकार 
राज्य सरकार मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी और प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाती रहती है। मधुमक्खी सहित एक बॉक्स की कीमत लगभग 4000 रुपये होती है। मधुमक्खी बॉक्स प्राप्त करने के लिए अपने जिले के उद्यान विभाग या फिर कृषि विज्ञान केंद्र से जानकारी लें। कई मधुमक्खी पालक खेत में बॉक्स रखने के लिए किसानों को पैसे भी दे देते हैं, जिससे शुरुआती लागत बच जाती है।

किसान समय-समय पर मिट्टी का परीक्षण करवाएं – फोटो : ati

किसान कभी न भूलें खेती-बाड़ी के ये 7 मंत्र

जलवायु परिवर्तन, खेती की बढ़ती लागत, पानी व मजदूरों की कमी के बीच अत्याधुनिक कृषि तकनीकें कम मेहनत में अधिक उत्पादन लेने में किसानों की मदद कर रही हैं। आगामी रबी सीजन में यहां बताई गई 7 तकनीकों को अपनाकर किसान खेती की लागत कम करके फसल उत्पादन बढ़ा सकते हैं। 
  1. मिट्टी परीक्षण से करें शुरुआत : खेती की सफलता का पहला कदम मिट्टी की गुणवत्ता का पता लगाना है। बुआई से पहले मिट्टी की जांच जरूरी है। मोबाइल आधारित सॉइल टेस्टिंग किट, सरकारी लैब, केवीके या जिला कृषि विभाग की मदद से किसान खेत की मिट्टी का पीएच, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम का स्तर जान सकते हैं। मृदा स्वास्थ्य कार्ड मिट्टी की उर्वरता, पोषक तत्वों (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश) और अन्य गुणों (पीएच, जैविक कार्बन) की जानकारी देता है। यह कार्ड मिट्टी के स्वास्थ्य के आधार पर उर्वरकों के उपयोग, फसल के चयन और सुधारात्मक उपायों की सिफारिश करता है। 
  2. बीज उपचार है बेहद जरूरी : किसान अगर बीज भंडार से बीज नहीं खरीद रहे हैं और पुराने बीज दोबारा उपयोग कर रहे हैं, तो उसे उपचारित करना जरूरी है। एक किलो बीजों के उपचार के लिए लगभग 2.5 ग्राम कार्बेंडाजिम दवा का उपयोग करें। प्रति एकड़ बुआई के लिए लगभग 40 किग्रा बीज की आवश्यकता होती है। ऐसे में, कुल 100 ग्राम कार्बेंडाजिम पर्याप्त होगा। इससे बीज जनित रोगों से फसल की सुरक्षा होती है।
  3. नपी-तुली सिंचाई की तकनीक : सिंचाई का सही समय और तरीका उत्पादन में निर्णायक होता है। ड्रिप इरिगेशन और स्प्रिंकलर सिस्टम के उपयोग से पानी की 40–50% तक बचत हो सकती है। सोलर पंप और सेंसर आधारित सिंचाई खेत में पानी की नियंत्रित और नपी-तुली आपूर्ति करने में मदद करते हैं।
  4. स्मार्ट सीड ड्रिल और जीरो-टिलेज : गेहूं, चना और सरसों जैसी रबी की प्रमुख फसलों में बिना जुताई किए बुआई करने के लिए स्मार्ट सीड ड्रिल और जीरो-टिलेज तकनीक उपयोगी है। इस तकनीक में खेत की जुताई नहीं करनी पड़ती और बीज सीधे मिट्टी में बोए जाते हैं। इससे समय और डीजल की बचत के साथ मिट्टी की नमी बनी रहती है। इससे मिट्टी की संरचना भी सुरक्षित रहती है और फसल बेहतर होती है।
  5. कंबाइन हार्वेस्टर और रीपर बाइंडर : रबी फसलों की कटाई के समय मजदूरों की कमी अक्सर किसानों के लिए बड़ी परेशानी बन जाती है। ऐसे में, आधुनिक मशीनें, जैसे- कंबाइन हार्वेस्टर और रीपर बाइंडर सहायक हो सकती हैं। कंबाइन हार्वेस्टर गेहूं, जौ, चना जैसी फसलों की कटाई, मड़ाई और सफाई एक साथ कर देता है। वहीं, रीपर बाइंडर मशीन खेत में फसल काटकर उसका बंडल तैयार कर देती है।
  6. भरोसेमंद स्रोत से खरीदें अच्छे बीज :  उच्च गुणवत्ता और अधिक उपज वाले बीज अपनाकर फसलों को रोगों से बचाकर बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। गेहूं के लिए डीबीडब्ल्यू-303, डीबीडब्ल्यू-327, डीबीडब्ल्यू-187; चना के लिए राधे, अवरोधी, गौरव, पूसा काबुली बीजी-1003; मटर के लिए अर्किल, पी-10; और सरसों के लिए गिरिराज, रुक्मिणी, आरएच-0749 जैसी किस्में चुनें। ये बीज सूखा प्रतिरोधी हैं और कम पानी में अच्छी पैदावार देती हैं।
  7. अपनाएं सही और स्मार्ट तकनीक : मौसम पूर्वानुमान, मंडी भाव, उर्वरक खपत और सिंचाई के लिए मोबाइल एप्स का उपयोग करें। किसान सुविधा एप और एग्री एप जैसे मोबाइल एप्स सही निर्णय लेने में मदद कर सकते हैं। वहीं, ड्रोन से फसलों पर छिड़काव और निगरानी आसानी से कर सकते हैं। 

निजी दुकानों से मिलेंगी सिर्फ 5 बोरी यूरिया – फोटो : सोशल मीडिया

नीम लेपित यूरिया से पाएं अधिक पैदावार

  • रबी सीजन में किसान खेती की बढ़ती लागत को ध्यान में रखते हुए नीम लेपित यूरिया का इस्तेमाल कर सकते हैं। सामान्य यूरिया की तुलना में यह अधिक प्रभावी और किफायती विकल्प है। 
  • नीम लेपित यूरिया के दानों पर नीम के तेल की पतली परत चढ़ाई जाती है, जो नाइट्रीफिकेशन को धीमा करती है। इससे यूरिया मिट्टी में धीरे-धीरे घुलता है और पौधों को नाइट्रोजन मिलती है। 
  • नीम लेपित यूरिया से न केवल 10% तक यूरिया की बचत होती है, बल्कि फसल की पैदावार में 10-15% तक वृद्धि भी संभव है। जहां पहले किसान 50 किलो यूरिया का इस्तेमाल करते थे, अब 45 किलो नीम लेपित यूरिया पर्याप्त रहेगा।

 

राइजोबियम, एजोटोबैक्टर, फॉस्फेट सॉल्युबिलाइजिंग बैक्टीरिया जैसे बायो-फर्टिलाइजर प्रयोग करें। – फोटो : Ai

बाढ़ग्रस्त खेतों को फिर से बनाएं उपजाऊ 

  • खेतों में 2 से 5 सेमी तक जमा गाद को गहरी जुताई या रोटावेटर से मिट्टी में मिला दें। 6 इंच या अधिक गाद हो तो ट्रैक्टर, जेसीबी या लेजर लेवलर से इसे हटाकर खेत में कुछ दिन धूप लगने दें।
  • खेत में हरी खाद डालें। मूंग, ढैंचा, सन, उर्द जैसी फसलें बोकर 40–45 दिन बाद खेत में पलट दें। इससे मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ेगी। खेत में गोबर खाद या कम्पोस्ट 8-10 टन प्रति एकड़ की दर से डालें। छोटे खेतों में केंचुआ खाद उपयोग करें। 
  • राइजोबियम, एजोटोबैक्टर, फॉस्फेट सॉल्युबिलाइजिंग बैक्टीरिया जैसे बायो-फर्टिलाइजर प्रयोग करें। मायकोराइजा कवक डालें। जीवामृत, पंचगव्य, नीम घोल जैसे जैविक उत्पाद भी मिट्टी को स्वस्थ बनाते हैं। 

दीमक – फोटो : सोशल मीडिया

फसल में दीमक के हमले पर रखें नजर 

  • दीमक का प्रकोप फसलों को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। खेत में दीमक दिखाई दें तो किसान क्लोरपाइरीफॉस 20 ई.सी. दवा 4.0 मि.ली. प्रति लीटर पानी की दर से सिंचाई जल के साथ दें।
  • फसलों और सब्जियों की फसल में सफेद मक्खी और चूसक कीट दिखाई दें तो किसान इमिडाक्लोप्रिड 1.0 मि.ली. 3 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। यह छिड़काव आसमान साफ होने पर ही करें ताकि दवा का असर ठीक से हो सके।
  • मिर्च, बैंगन में छेदक कीटों तथा फूलगोभी व पत्तागोभी में डायमंड बैक मोथ की निगरानी के लिए 4-6 फेरोमोन ट्रैप प्रति एकड़ में लगाएं। अधिक प्रकोप होने पर स्पिनोसेड 1.0 मि.ली. 4 लीटर पानी में मिलाकर छिड़कें।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना कराएं किसान। – फोटो : गांव जंक्शन

फसल बीमा के लिए 31 दिसंबर तक प्रीमियम जमा करें 

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत अपनी फसल का बीमा कराएं, जो प्राकृतिक आपदाओं (सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि), कीट-रोग या उपज हानि से होने वाले आर्थिक नुकसान की भरपाई करती है। निकटतम बैंक, सीएससी या कृषि सहकारी समिति में जाएं; आधार कार्ड, खसरा-खतौनी, बोई गई फसल का विवरण और बैंक खाता देकर फसल बीमा करा सकते हैं। ऑनलाइन पोर्टल pmfby.gov.in या मोबाइल एप पर भी रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं। खरीफ फसलों के लिए 31 जुलाई और रबी के लिए 31 दिसंबर तक प्रीमियम जमा करें। 
 

किसान क्रेडिट कार्ड से लीजिए आसान ऋण – फोटो : AI

खेती के लिए नकदी की मुश्किल दूर करेगा किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) 

किसानों को खेती, पशुपालन, डेयरी, पोल्ट्री और मत्स्य पालन के लिए पैसों की चिंता करने की जरूरत नहीं है। किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) से आसान और सस्ता ऋण मिल रहा है। इससे खाद, बीज, कीटनाशक और कृषि मशीनरी भी खरीद सकते हैं। केसीसी पर मिलने वाले ऋण की ब्याज दर 7% है। समय पर भुगतान करने पर ब्याज में 3% की छूट मिलती है। बिना जमीन गिरवी रखे 2 लाख रुपये तक का ऋण मिल सकता है। जमीन की गारंटी पर 3 लाख रुपये तक का ऋण मिल सकता है। केसीसी बनवाने के लिए नजदीकी बैंक शाखा में आवेदन करना होगा।
  • पात्रता : भूमिधारक किसान, पट्टेदार व बंटाईदार और किसानों के संयुक्त देयता समूह केसीसी के लिए पात्र हैं।  
  • आवश्यक दस्तावेज :  आधार कार्ड, जमीन के कागजात, बैंक पासबुक, आवेदक का फोटो।

किसान कॉल सेंटर पर नकली खाद-बीज की करें शिकायत

नकली बीज, खाद और कीटनाशक फसल खराब कर देते हैं, उत्पादन घटाते हैं और किसानों को आर्थिक नुकसान पहुंचाते हैं। नकली कीटनाशक या खाद से मिट्टी की उर्वरता भी कम हो जाती है। हमेशा प्रमाणित विक्रेताओं या मान्यता प्राप्त एजेंसियों से बीज-खाद खरीदें। केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने नकली, बीज, खाद और कीटनाशकों से किसानों को सतर्क रहने के लिए एडवाइजरी जारी की है। किसान कॉल सेंटर के नंबर -18001801551 – पर सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक नकली खाद, बीज और कीटनाशकों की शिकायत कर सकते हैं।  

किसान यहां करें संपर्क
अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), आईसीएआर से संबद्ध संस्थान, कृषि विभाग या नजदीकी कृषि विश्वविद्यालय में किसान संपर्क कर सकते हैं। किसान कॉल सेंटर के टोल फ्री नंबर 1800-180-1551 पर फोन करके भी खेती-किसानी से संबंधित जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही, नकली खाद-बीज की शिकायत भी कर सकते हैं।  

(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के नवंबर 2025 अंक में प्रकाशित किया गया  है।)

इन्पुट्स: मोहम्मद आमिल