
खेती-बाड़ी के कचरे से किसान ने प्राकृतिक मल्चिंग का अनोखा मॉडल तैयार किया। – फोटो : गांव जंक्शन
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आमतौर पर किसान पराली और खेती-बाड़ी के कचरे को जलाने को आसानी समझते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के किसान ने इसी कचरे को काम में लाने का काम किया है। बीजापार गांव के किसान नवरत्न तिवारी ने प्राकृतिक मल्चिंग का एक ऐसा अनोखा मॉडल तैयार किया है, जो खेत की लागत को शून्य करने के साथ मिट्टी को भी फायदा पहुंचा रहा है।
खेत नहीं, बिस्तर बिछाते हैं
नवरत्न तिवारी अपने खेतों में प्लास्टिक की मल्चिंग पर पैसा खर्च करने की बजाए खेती-बाड़ी के कचरे का इस्तेमाल करते हैं। वह मशरूम की खेती के बाद बचे वेस्ट, पराली, सूखी पत्तियों और खेत के खरपतवार को मिलाकर 4 से 6 इंच मोटी एक परत खेत में बिछा देते हैं। वह इसे “मिट्टी के लिए गद्दा” कहते हैं। उनका मानना है कि जैसे हम बिस्तर पर गद्दा बिछाते हैं, वैसे ही यह परत भू-माता के लिए वस्त्र का काम करती है।
न निराई, न दवाई, मल्चिंग ही बन जाती है खाद
इस प्राकृतिक गद्दे के कई फायदे हैं। 4-6 इंच मोटी परत के नीचे खरपतवार अपने आप उगना बंद हो जाते हैं, जिससे निराई का खर्च और मेहनत पूरी तरह बच जाती है। यह मल्चिंग की परत 4-5 महीनों में धीरे-धीरे गलकर मिट्टी में मिल जाती है और यूरिया-डीएपी जैसी रासायनिक खादों की सारी जरूरतें पूरी कर देती है। इस प्रक्रिया से खेत में कार्बनिक कार्बन की मात्रा तेजी से बढ़ती है। नवरत्न बताते हैं कि जहां ज्यादातर खेतों में कार्बन का स्तर शून्य के करीब है, वहीं उनके खेत में यह बढ़कर 2 के करीब पहुंच गया है। यह परत मिट्टी को ठंडा रखती है और नमी को उड़ने से रोकती है, जिससे सिंचाई की जरूरत भी कम हो जाती है।
6 एकड़ में सहजन, केला और मसालों का मॉडल
नवरत्न तिवारी ने अपनी 6 एकड़ जमीन पर सिर्फ मल्चिंग ही नहीं, बल्कि एक पूरा इकोसिस्टम तैयार किया है। उन्होंने खेत में 250 सहजन के पेड़, 2000 केले के पौधे और बीच-बीच में मसालों की खेती की है। सहजन के पेड़ फसलों को हल्की छाया देते हैं और उनकी पत्तियां साल भर झड़कर प्राकृतिक खाद का काम करती हैं।
देसी बीज और गोमूत्र का जादू
उनकी प्राकृतिक खेती का मॉडल यहीं खत्म नहीं होता। वह बीजों को बाजार से खरीदने या फंगीसाइड से उपचारित करने की बजाय देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से खुद उपचारित करते हैं। इस तरीके से वह फंगस के डर के बिना 32 तरह की देसी सब्जियों के बीज तैयार कर रहे हैं। नवरत्न तिवारी का यह मॉडल उन हजारों किसानों के लिए एक प्रेरणा है जो खेती की बढ़ती लागत और खराब होती मिट्टी से परेशान हैं। वह साबित कर रहे हैं कि खेत से निकला कचरा बोझ नहीं, बल्कि एक खजाना है, जिसे सही तरीके से इस्तेमाल कर टिकाऊ और लाभदायक खेती की जा सकती है।




