घर नहीं, स्कूल का खाना बन रहा है बच्चों के मोटापे की वजह?

0
6

अब स्कूलों में मिलने वाला मिड-डे मील और कैंटीन का खाना सिर्फ पेट भरने का जरिया नहीं होगा बल्कि यह बच्चों की सेहत सुधारने का बड़ा हथियार बनेगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने पहली बार स्कूलों में खाने-पीने की चीजों को लेकर नई वैश्विक गाइडलाइन जारी की है। इसका मकसद यह है कि स्कूल के अंदर बिकने वाली या मिलने वाली हर चीज, चाहे वह कैंटीन का समोसा हो या थाली का खाना, पूरी तरह से न्यूट्रिशनल हो और सुरक्षित हो।

 

आज के दौर में दुनिया दोहरी मार झेल रही है। एक तरफ जहां कई बच्चे अब भी कुपोषण का शिकार हैं  वहीं दूसरी तरफ जंक फूड की वजह से बच्चों में मोटापे की समस्या तेजी से बढ़ी है। साल 2025 के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया का हर दसवां बच्चा मोटापे की चपेट में है। पहली बार ऐसा हुआ है जब ज्यादा वजन वाले बच्चों की संख्या कुपोषित बच्चों से भी ऊपर निकल गई है। इसी खतरे को देखते हुए WHO ने कहा है कि स्कूल वह जगह हैं जहां से हम बच्चों के खान-पान की आदतों को जीवनभर के लिए बदल सकते हैं।

 

यह भी पढ़ें: प्रेग्नेंसी डाइट में लोबिया, क्यों है पनीर से ज्यादा फायदेमंद?

क्या कहती है नई गाइडलाइन?

गाइडलाइन के मुताबिक जंक फूड पर पूरी तरह से रोक लगाया जाना चाहिए। स्कूलों में ज्यादा चीनी, नमक और हानिकारक फैट वाली चीजों जैसे कोल्ड ड्रिंक्स और पैकेट बंद स्नैक्स की बिक्री और प्रचार को कम करने के लिए कड़े नियम बनाने का सुझाव दिया गया है।


स्कूल या घर में बनने वाला खाना जिसमें इस बात का विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए कि थाली में क्या होना जरूरी है। इस गाइडलाइन के हिसाब से खाने में साबुत अनाज, ताजे फल, दालें और सूखे मेवों की मात्रा बढ़ाने को कहा गया है ताकि बच्चों को सही न्यूट्रिशन मिल सके।

 

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अक्टूबर 2025 तक करीब 104 देशों में स्कूल डाइट को लेकर नीतियां  बनी हुई थीं लेकिन उनमें से आधे देशों ने भी जंक फूड के प्रचार पर रोक नहीं लगाई। WHO का कहना है कि सिर्फ कागज पर नियम बनाने से काम नहीं चलेगा। उनकी कड़ाई से निगरानी भी जरूरी है।

 

यह भी पढ़ें: बिना डॉक्टर की सलाह के विटामिन D लेने की गलती न करें, किडनी, लिवर को होगा नुकसान

स्थानीय प्रशासन की भूमिका जरूरी

WHO के महानिदेशक डॉ. टैड्रॉस अधानोम घेब्रेयेसस का मानना है कि स्कूल का माहौल बच्चों के सीखने और उनकी सेहत पर गहरा असर डालता है। इसलिए सिर्फ केंद्र सरकार ही नहीं बल्कि शहरों और स्थानीय प्रशासन को भी इसमें आगे आना होगा। अगर स्कूल परिसर के अंदर सेहतमंद विकल्प सस्ते और आसानी से उपलब्ध होंगे, तो बच्चे खुद-ब-खुद अच्छी आदतों की ओर बढ़ेंगे।

 

इस दिशा में भारत में भी सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट  (CSE) जैसी संस्थाएं लंबे समय से जंक फूड के खतरों के प्रति आगाह करती रही हैं। WHO की यह पहल अब इन कोशिशों को वैश्विक मजबूती देगी ताकि स्कूल सिर्फ किताबों तक सीमित न रहें, बल्कि एक हेल्दी समाज की नींव भी बनें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here