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कोलंबिया में पुल से गुजर रही बस को उड़ाया, 13 लोगों की मौत, 38 घायल


दक्षिण अमेरिकी का एक देश है कोलंबिया। कोलंबिया में शनिवार को एक बस में भीषण विस्फोट हो गया, जिसमें 13 लोगों की मौत हो गई और 38 लोग घायल हो गए। विस्फोट दक्षिण-पश्चिमी कोलंबिया में हुआ। यह विस्फोट बस में सफर कर रहे लोगों को निशाना बनाकर किया गया है। देश के सेना प्रमुख ने इसे आतंकी हमला बताया है।

 

कोलंबिया सरकार ने बताया कि जहां बस में विस्फोट हुआ है, वह क्षेत्र में मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़ा हुआ है। इस क्षेत्र में लगातार हिंसा बढ़ रही है।

 

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हाईवे के ऊपर हुआ हादसा

 

काउका क्षेत्र के गवर्नर ऑक्टावियो गुजमान ने बताया कि यह विस्फोट काजिबियो नगर पालिका में पैन अमेरिकन हाईवे पर बस के गुजरने के दौरान किया गया। काउका की स्वास्थ्य सचिव कैरोलिना कामार्गो ने बताया कि घायलों में पांच बच्चे भी शामिल हैं।

 

वहीं, कोलंबिया सशस्त्र बलों के कमांडर जनरल ह्यूगो लोपेज ने एक जानकारी देते हुए कहा कि यह आतंकी कृत्य है। साथ ही इसके लिए इवान मोर्दिस्को नाम के कुख्यात अपराधी के गिरोह और जैमी मार्टिनेज गुट को जिम्मेदार ठहराया। 

 

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सेना का असंतुष्ट धड़े सक्रिय

 

दोनों गुट अब भंग हो चुके कोलंबिया के रिवॉल्यूशनरी आर्म्ड फोर्सेज के असंतुष्ट धड़े हैं। ये असंतुष्ट धड़े अब भी इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन गुटों ने 2016 में सरकार के साथ हुए शांति समझौते को नहीं माना था। कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो ने हमले की निंदा करते हुए कहा कि कई आदिवासी लोगों समेत निर्दोष नागरिकों को मारने वाले लोग आतंकवादी, फासीवादी और मादक पदार्थ के तस्कर हैं।

 

यह हाल के दिनों में सार्वजनिक ढांचे को निशाना बनाकर किए गए कई विस्फोटों की कड़ी में ताजा हमला है। पिछले दो दिनों में दक्षिण-पश्चिमी कोलंबिया में कम से कम 26 हिंसक घटनाएं हुई हैं।

AAP कार्यकर्ताओं ने बागी सांसदों के घर के बाहर लिख दिया ’गद्दार’, जलाया पुतला


लुधियाना में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने शनिवार को राज्यसभा सांसद राजिंदर गुप्ता के घर के बाहर प्रदर्शन किया। कार्यकर्ताओं ने गुस्सा जताते हुए स्प्रे पेंट से दीवारों पर पंजाबी में नारे लिखे। उनमें ‘गद्दार’ जैसे शब्द भी लिखे गए। उन्होंने राजिंदर गुप्ता का पुतला भी जलाया।

 

यह सब इसलिए हुआ क्योंकि शुक्रवार को राजिंदर गुप्ता समेत राघव चड्ढा और आम आदमी पार्टी (आप) के दो-तिहाई राज्यसभा सांसदों ने बीजेपी में विलय कर लिया।

 

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राघव चड्ढा ने क्या कहा?

राघव चड्ढा ने पार्टी छोड़ते हुए कहा कि आप अपनी स्थापना के मूल सिद्धांतों से भटक गई है। उन्होंने कहा, ‘मैं उनकी गलतियों का हिस्सा नहीं बनना चाहता। मैं सही व्यक्ति गलत पार्टी में था।’

 

चड्ढा ने दावा किया कि आप के 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 ने इस फैसले का समर्थन किया। उन्होंने संविधान के प्रावधानों के तहत बीजेपी के साथ विलय के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए।

विवाद की वजह क्या थी?

कुछ दिनों से आम आदमी पार्टी में तनाव बढ़ रहा था। राघव चड्ढा को पार्टी के डिप्टी लीडर पद से हटा दिया गया था। आप के वरिष्ठ नेताओं ने उन पर आरोप लगाया कि वह पार्टी लाइन से अलग चल रहे थे, बीजेपी पर सीधा हमला नहीं कर रहे थे और ‘सॉफ्ट पीआर’ कर रहे थे।

 

चड्ढा ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया। उन्होंने कहा कि संसद में उनका फोकस आम लोगों की समस्याओं पर था, जैसे एयरपोर्ट पर महंगा खाना, मिडिल क्लास पर टैक्स, डिलीवरी वर्कर्स की हालत और टेलीकॉम की कीमतें। इन्हीं मुद्दों से युवाओं के बीच उनकी अच्छी छवि बनी थी।

 

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आप के लिए बड़ा झटका

यह घटनाक्रम आम आदमी पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। राघव चड्ढा के नेतृत्व में हुए इस विभाजन ने पार्टी को काफी नुकसान पहुंचाया है। लुधियाना और जालंधर जैसे शहरों में आप कार्यकर्ताओं ने ऐसे ही प्रदर्शन किए। उन्होंने सांसदों को ‘पंजाब दे गद्दार’ कहकर नारेबाजी की।

 

झालमुड़ी और माछ-भात ही नहीं, बंगाल की थाली में और भी बहुत कुछ है


देश के 4 राज्य और 1 केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव हो रहा है लेकिन पश्चिम बंगाल के माछभात और झालमुड़ी पर राष्ट्रीय मीडिया बहस कर रही है। कहीं झालमुड़ी खाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मीम बन रहे हैं, कहीं मछली खाते पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर की। भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी भी हाथों में मछली लेकर खूब घूम रहे हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का दावा है कि बीजेपी अगर बंगाल की सत्ता में आई तो बंगालियों का माछ-भात बंद हो जाएगा। बंगाल की छवि ऐसी इन दिनों बनी है कि जैसे बंगाल में झालमुड़ी और माछ-भात के अलावा, कोई और व्यंजन ही नहीं है। 

खान-पान का नाता भूगोल से है। दुनिया, यह बात समझने में अक्सर चूक जाती है। तभी तो अगर बिहार में नवरात्रि के दिनों में तेजस्वी यादव और मुकेश सहनी हेलीकॉप्टर में बैठकर मछली खा लेते हैं तो प्रधानमंत्री तक को यह बात खटक जाती है। दूसरी तरफ बंगाल में प्रत्याशी हाथ में मछली लेकर घूमते हैं, सार्वजनिक समारोहों में दिखा-दिखाकर खाते हैं, यह संदेश देने की कोशिश होती है कि भारतीय जनता पार्टी के लोग मांसाहार के विरोधी नहीं है। इन दिनों, ‘माछ-भात’ अखबारों से लेकर टीवी चैनलों तक में जगह घेर रहा है। 

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लोग यह साबित करने में जुट गए हैं कि वे कितने बड़े मांसाहारी हैं। ऐसा दिखाया जा रहा है कि कोलकाता आए और मछली नहीं खाए तो क्या खाए। अब अगर आप भी सोच रहे हैं कि बंगाल में सिर्फ नॉनवेज के डिश, मछली, पोर्क, बीफ ही है तो जनाब, आप ठीक-ठाक गलत हैं। बंगाल में इनके इतर, कई व्यंजन हैं जो लोगों को बेहद पसंद आते हैं-  

अनिमेष मुखर्जी, लेखक, इतिहास की थाली:-
बंगाल में मांसाहार को लेकर नजरिया, देश के दूसरे हिस्सों से बेहद अलग है। यहां मांसाहार को लेकर लोग सहज हैं। जैसे दूसरे राज्यों में नवरात्रि और सावन के दिनों में मांस की बिक्री थम जाती है, वहीं पश्चिम बंगाल में इन दिनों में खपत बढ़ जाती है। यहां एक ही होटल में शाकाहार और मांसाहार दोनों सहजता से परोसे जा सकते हैं, दूसरे राज्य में ऐसा कम देखने को मिलता है। 

बंगाल आएं तो क्या खाएं, आप खुद तय करें 

  • पुचका: खस्ता में, उत्तर बंगाल का सबसे फेमस व्यजन है पुचका। बंगाल का पुचका, पानी-पूरी या गोलगप्पा नहीं है। अनिमेष मुखर्जी बताते हैं, ‘यह यूपी या दिल्ली के गोलगप्पे या पानी पूरी से अलग है। इसका स्वाद जायकेदार है। मसालेदार आलू और खट्टा-मीठा पानी होता है। लोग मशीन से दिल्ली जैसी जगहों पर बनाते हैं, वहां हाथ से बनता है, उसका टेस्ट अलग होता है।’
  • कचौड़ी मटर: मटर की कचौड़ी भी कोलकाता में खूब बिकता है। मटर की कचौरी लोग खूब खाते हैं, कोलकाता का स्ट्रीट फूड है। ताजी मटर, अदरक, हरी मिर्च और मसालों की स्टफिंग के साथ मैदा या गेहूं के आटे से बन रही है। इसका टेस्ट अलग होता है। 

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अनिमेष मुखर्जी:-
बंगाल का खाना दो तरह का है। पूर्वी बंगाल का अलग, पश्चिमी बंगाल का अलग। कोलकाता में पश्चिमी संस्कृति है। यहां के खाने में जितनी जरूरी मछली है, वैसे ही आलू भी है है। आलू की खेती यहां अच्छी होती है। आलू के किसानों की स्थिति बेहतर है। अंग्रेज कॉलोनियां यहां थीं, पुर्तगाली यहां थे। यहां आलू की बेहतर समझ है। आलू के कई व्यंजन यहां कमाल के हैं।’

  • आलू-पोस्तो: अनिमेष बताते हैं आलू-पोस्तो, बंगाल के के व्यंजनों का खास हिस्सा है। लोग महीने में कई दिन इसे चाव से खाते हैं। पोस्तो का मतलब खसखस है। पोस्तो में अफीम का नशा नहीं होता है। रोज खाने से आदत लग सकती है। पोस्तो को उर्दू में खसखस भी कहते हैं। ये अफीम के पौधे के बीज होते हैं। इसकी सब्जी कई तरह से बनाई जाती है।
  • कलकत्ता बिरयानी: कोलकाता की बिरयानी में आलू भी पड़ता है। मांस के अलावा, आलू भी लोग खाना खूब पसंद करते हैं। इस तरह की बिरयानी उबले हुए आलू और नरम गोश्त के साथ तैयार की जाती है। यह भी कोलकाता के लोकप्रिय व्यंजनों में से एक है। 
  • सिंघाड़ा: कलकत्ता का सिंघाड़ा, दूसरे राज्यों के समोसे की तरह नहीं है। आकृति एक जैसी हो सकती है, लेकिन स्वाद काफी अलग है। दूसरी जगहों पर आलू को मसाले में मिक्स करके समोसे में ठूंसते हैं। सिंघाड़े में आलू को टुकड़ों में काटते हैं, जायकेदार मसालों से तैयार करते हैं। लोग वैसे तो मटर और पनीर जैसी चीजों को भी समोसे में डाल देते हैं, लेकिन सिंघाड़े में गोभी भी पड़ती है। 

‘समोसे की एक बात जो आपको जाननी चाहिए’

अनिमेष मुखर्जी, लेखक, इतिहास की थाली:-
समोसा, यायावरों का खाना था। जिन्हें ठंडे प्रदेशों से लंबी यात्राएं करनी होती थीं, उनके लिए यह आसान स्नैक्स था। पहले इसे कीमा डालकर तैयार किया जाता था। मंगोल लड़ाके भी समोसे के शौकीन थे। समोसे का ईरान और पश्चिम एशिया से भी रिश्ता है। आलू समोसे का हिस्सा, बहुत बाद में बना।

कब आया है समोसा?

समोसा, 12वीं से 14वीं शताब्दी के बीच भारत आया है। यह ईरान और पश्चिम एशिया से भारत आया है। मध्य एशिया के व्यापारी और मुस्लिम सुल्तान भारत लेकर आए थे। दिल्ली सल्तनत के दौरान यह शाही दरबारों का हिस्सा बना। भारत ने अपने हिसाब से समोसे का स्वाद बदल लिया। पहले जो कीमा और मेवा भरा जाता था, भारत में आकर आलू और चटपटे मसालों ने समोसे के भीतर जगह बना ली। 

  • मिठाई: बंगाल में छेने की मिठाइयां लोकप्रिय हैं। राजभोग, मलाई चमचम जैसी मिठाइयां लोग खूब खाते हैं। कोलकाता का संदेश भी काफी लोकप्रिय है। अनिमेष बताते हैं कि बंगाल में ही 25 से 30 तरह का संदेश यहां होता है। यहां एक मिठाई है ‘खीर कदम’, कमाल की मिठाई है। खोए और छेने से इसे तैयार किया जाता है।  
  • कलकत्ता का चाइनीज खाना: कोलकाता में चाइनीज मूल के लोग आज भी चाइना टाउन में रहते हैं। 1962 के बाद संख्या कम जरूर हुई है। अनिमेष बताते हैं कि हक्का नूडल, जिसे लोग चाव से खाते हैं, उसकी शुरुआत भी यहीं से हुई। चीन के लोग, 1800 के आसपास यहां स्थापित हो गए थे। मोमोज, तिब्बत से आया। कोलकाता में इंडो चाइनीज खाने का इतिहास 100 साल से भी पुराना है। चाइना टाउन से ही गार्लिक चिकन, चिली फिश और नूडल्स जैसे व्यंजन लोकप्रिय हुए। यहां के रेस्टोरेंट में गोल्डन जॉय, बिग बॉस, किम लिंग और बीजिंग भी खासे प्रसिद्ध हैं। हॉन्ग किचन भी चाइना टाउन में ही सबसे पहले आया था। यह टंगरा के पास मौजूद है। 

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‘जो खाना सहजता से मौजूद है, उसी की सामाजिक स्वीकार्यता है’

अब कोई अगर उम्मीद करे कि केन्या और तंजानिया में रहने वाली मसाई जनजाति, दाल-भात और साग खाकर जिंदा रहे तो यह कितनी अजीब बात है। मसाई, दसानेक, बुशमैन जैसी जनजातियों को सिर्फ शाकाहारी खाना वैसे ही चौंका सकता है, जैसे यहां के लोगों का बंदर, मगरमच्छ, लंगूर और सियार जैसे जानवरों को भुनकर खा जाना। जिसकी उपलब्धता, जहां सहजता से है, वही उसका भोजन है। जहां अनाज आसानी से मिलता है, वहां शाकाहारी लोग ज्यादा हैं, जहां तालाब, नदियां और सागर, वहां मांसाहारी। बंगाल में ही नहीं, मिथिला में भी लोग मांस खूब चाव से खाते हैं। कुछ जगहें इनका अपवाद भी सकती हैं। 

मांसाहार को लेकर जो सहजता बंगाल में है, वैसी दूसरी जगहों पर कम है

ज्यादातर होटल, शाकाहारी और मांसाहारी की बाइनरी में बंटे होते हैं। कई होटलों के नाम के आगे बड़े अक्षरों में लगा होता है कि शाकहारी होटल, वैष्णव होटल। पश्चिम बंगाल में ऐसे होटल थोड़े कम नजर आते हैं। अंजन दत्ता वैष्णव हैं लेकिन मांसाहार से उन्हें परहेज नहीं है। नवरात्रि के दिनों में वर्जित समझे वाली मछली, बंगाल में खूब बिकती है। सावन में लोग प्याज खाने से परहेज करते हैं, बंगाल में इसका भी खूब चलन देखने को मिलता है। धार्मिक स्थानों के आसपास उत्तर भारतीय राज्यों में मछली-मांस की दुकानें बद करने की बात होती है, पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं है। मछली और मांस संस्कृति का हिस्सा है। जन्मोत्सव, मुंडन से लेकर विवाह समारोहों तक, मछली खूब चाव से खाई और खिलाई जाती है, लेकिन यह भी सच है कि सिर्फ मछली और मांस ही पश्चिम बंगाल का खाना नहीं है। पश्चिम बंगाल, जायकेदार है। 

हिंदू धर्म में कुछ लोगों को जलाने की जगह दफनाया क्यों जाता है? जानिए कारण


सनातन धर्म के अनुसार मृत्यु के बाद शरीर को जलाया जाता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक इंसान का शरीर पांच तत्वों जैसे अग्नि, जल, पृथ्वी, आकाश और वायु से मिलकर बना है।  माना जाता है कि मृत्यु के बाद शरीर को आत्मा से मुक्ति मिलनी चाहिए। इसके अलावा माना जाता है कि व्यक्ति के शव को जलाने से उसका शरीर पांचों तत्वों में मिल जाता है, जिससे वह फिर से प्रकृति का हिस्सा बन जाता है। इसी कारण मृत्यु के बाद लोगों का अग्नि संस्कार किया जाता है।हर व्यक्ति का अग्नि संस्कार कराना जरूरी नहीं है। कुछ विशेष परिस्थितियों में यह नियम बदल जाता है।

 

 हिंदू धर्म में भी कुछ लोगों का मृत्यु के बाद अग्नि संस्कार नहीं किया जाता। कई लोगों को लगता है कि हिंदू धर्म में केवल अग्नि संस्कार की ही मान्यता है, जबकि मुस्लिम धर्म में शव को दफनाया जाता है लेकिन हकीकत कुछ और है। शास्त्रों के अनुसार बच्चों, गर्भवती महिलाओं और साधु-संतों की मृत्यु के बाद शव को जलाने के बजाय दफनाया जाता है। इस नियम के पीछे का कारण क्या है, आइए जानते हैं।

 

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जलाने के बजाय दफनाने का रहस्य

 

सनातन धर्म में कुछ लोग जैसे बच्चे, साधु-संत और गर्भवती महिलाओं को दफनाया जाता है। इन सभी को दफनाने के कारण अलग-अलग हैं। आइए एक-एक करके समझते हैं।

 

बच्चों को दफनाने का कारण

 

धार्मिक शास्त्रों के मुताबिक जिन बच्चों की 14 साल से कम उम्र में मृत्यु होती है, उनका अग्नि संस्कार नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें दफनाया जाना चाहिए। दफनाने के पीछे की वजह यह बताई जाती है कि बच्चों का मन शुद्ध होता है। न उनका कोई बड़ा पाप होता है और न ही ज्यादा पुण्य। इस वजह से उनके अंतिम संस्कार में अग्नि की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि माना जाता है कि बच्चों की आत्मा मृत्यु के बाद सीधे स्वर्ग लोक चली जाती है, यानी उन्हें मोक्ष मिल जाता है।

 

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गर्भवती महिला को दफनाने की वजह

 

हिंदू धर्म में गर्भवती महिलाओं की मृत्यु के बाद उनके शव को जलाने के बजाय दफनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक इस दौरान महिला एक नए शिशु को जन्म देने वाली होती है, जो पूरी तरह पवित्र होता है।

 

 उसने न कोई बुरा कर्म किया होता है और न ही कोई अच्छा कर्म। इस वजह से माना जाता है कि इस अवस्था में महिलाएं बेहद पवित्र होती हैं। अगर उनकी इस अवस्था में मृत्यु हो जाती है, तो उनके शव को नहीं जलाना चाहिए। इसकी दूसरी वजह यह भी है कि शिशु के मरने के बाद उसे जलाया नहीं जाता, उसी प्रकार अजन्मे शिशु को अंतिम संस्कार में मां के साथ ही दफन किया जाता है।

 

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संतों को पहले ही मिलती है मुक्ति

 

धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक साधु-संतों और संन्यासियों का दाह संस्कार नहीं करना चाहिए। धार्मिक जानकारों का मानना है कि साधु-संत और संन्यासी पहले से ही पवित्र होते हैं, क्योंकि वे अपने जीवनकाल में ही मोह-माया से मुक्ति पा चुके होते हैं। इसी वजह से उन्हें मिट्टी में समाधि दी जाती है।


डिस्क्लेमर- यह खबर मान्यताओं पर आधारित है, हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।

 

अमेरिका से सीधे बात नहीं करेगा ईरान, अराघची इस्लामाबाद में मौजूद


ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची शुक्रवार देर रात अमेरिका-ईरान युद्धविराम पर बातचीत के लिए पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व के साथ चर्चा करने के लिए इस्लामाबाद पहुंचे। पाकिस्तान ईरान और अमेरिका के बीच दूसरे दौर की बातचीत करवा रहा है। इस बीच विदेश मंत्री अब्बास अराघची के पाकिस्तान दौरे के दौरान अमेरिकी अधिकारियों के साथ किसी भी तरह के सीधे संपर्क से इनकार कर दिया है। जबकि एक दिन पहले तक अराघची व्यापक तौर पर अमेरिकी अधिकारियों से कुटनीतिक वार्ता करने वाले थे।

 

अब्बास अराघची के इस्लामाबाद पहुंचने के तुरंत बाद, ईरान ने अपनी स्थिति साफ कर दी थी। ईरान ने एक बयान में कहा था कि इस बार दौरे के दौरान अमेरिकी प्रतिनिधियों के साथ कोई आमने-सामने बातचीत नहीं होगी।

 

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मीटिंग होने की योजना नहीं- ईरान

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता एस्माएल बाकेई ने X पर कहा कि ईरान और अेमरिका के बीच कोई मीटिंग होने की योजना नहीं है। अमेरिका से सीधे संपर्क के बजाय, उन्होंने कहा कि पाकिस्तान एक बिचौलिए के तौर पर काम करेगा, जिससे दोनों पक्षों के बीच बातचीत आसान होगी।

 

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पाकिस्तान की तारीफ की

बाकई ने पाकिस्तानी सरकार को अमेरिका के थोपे गए हमले को खत्म करने के लिए चल रही मध्यस्थता और अच्छे कामों के लिए धन्यवाद दिया। दरअसल, शुक्रवार को व्हाइट हाउस ने शुक्रवार को पहले संकेत दिया था कि अराघची की यात्रा के दौरान अमेरिकी राजदूत उनसे मिलने वाले हैं।

 

इस बीच, अब्बास अराघची के इस्लामाबाद पहुंचने के बाद उनका पाकिस्तान के डिप्टी PM और विदेश मंत्री मोहम्मद इशाक डार, चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ, फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने स्वागत किया। अराघची आज पाकिस्तान के सीनियर लीडरशिप के साथ बैठक करेंगे।

ट्रंप के घटिया बयान का वैसा जवाब मोदी सरकार क्यों नहीं देती, जैसा ईरान देता है?


डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में भारत और अमेरिका के रिश्ते बेहद शानदार थे। उम्मीद थी कि दूसरा कार्यकाल भी ऐसा ही होगा। 10 मई 2025 की दोपहर तक सबकुछ ठीक चल रहा था। तभी डोनाल्ड ट्रंप ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम करवाने का दावा कर दिया। शाम को विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने प्रेसवार्ता की और ट्रंप के दावे को खारिज कर दिया। रात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित किया। उन्होंने भी कहा कि पाकिस्तान की गुहार पर युद्धविराम का फैसला लिया गया है। किसी तीसरे देश का कोई दखल नहीं था।

 

माना जाता है कि यही से ट्रंप ने भारत के खिलाफ बयानबाजी तेज की। पहले ऑपरेशन सिंदूर पर अनाप-शनाप बातें कहीं। 40 से अधिक बार युद्धविराम करवाने का दावा किया। कई बार अलग-अलग संख्या का जिक्र करके यह भी बताने की कोशिश की कि कितने फाइटर जेट गिरे थे। डोनाल्ड ट्रंप को भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के बारे में बखूबी पता है। बावजूद इसके कई बार पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर की तारीफ करके भारत को असहज करने का कोई मौका नहीं छोड़ा।

ट्रंप ने भारत चीन को ‘नरक’ कहा

भारत के खिलाफ रुख अख्तियार करने में ट्रंप एक कदम और आगे निकल गए। उन्होंने अपने ट्रूथ सोशल पर ऐसी पोस्ट साझा की, जिसमें चीन और भारत को धरती पर ‘नरक’ कहा गया। यह टिप्पणी अमेरिका के रूढ़िवादी लेखक और रेडियो होस्ट माइकल सैवेज ने जन्मसिद्ध नागरिकता के मामले में की, जिसे बाद में ट्रंप ने शेयर किया तो दुनिया की नजर में उनकी घटिया सोच सामने आ गई।

विदेश मंत्रालय की ठंडी प्रतिक्रिया पर उठे सवाल

ट्रंप के बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी किया। अपनी साप्ताहिक प्रेसवार्ता में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, ‘हमने कुछ रिपोर्टें देखी हैं…बस इतना ही कहना चाहूंगा।’ 

 

ट्रंप की घटिया बयानबाजी के सामने विदेश मंत्रालय के चार शब्दों को जवाब कहना भी उचित नहीं होगा। ट्रंप जहां एक ओर लगातार भारत की मर्यादा और गरिमा के खिलाफ बयान देने में जुटे हैं तो वहीं मोदी सरकार की प्रतिक्रिया बेहद ठंडी है। ऐसे में सवाल उठा रहा है कि क्या भारत की ठंडी प्रतिक्रिया के कारण ट्रंप मनबढ़ हो रहे हैं?

जो जवाब सरकार को देना था, वह ईरान दे रहा

ट्रंप की आपत्तिजनक टिप्पणी पर दुनिया ने जो उम्मीद भारत से लगा रखी थी, उस पर ईरान खरा उतरा। हैदराबाद स्थित ईरानी कॉन्सुलेट ने अपनी एक पोस्ट में भारत का समर्थन किया और लिखा, ‘चीन और भारत सभ्यता के प्रमुख उद्गम स्थल रहे हैं। दरअसल नरक तो वो जगह है, जहां उसका युद्ध-अपराधी राष्ट्रपति ईरान की सभ्यता को मिटा देने की धमकी देता है।’

 

उधर, विपक्षी दलों ने भी मोदी सरकार की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाया। कांग्रेस ने कहा कि मोदी सरकार की तरफ से पूरा सन्नाटा है। शिवसेना (यूबीटी) नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने भी विदेश मंत्रालय के बयान को खामोशी भरा बताया और मुंबई स्थित ईरानी कॉन्सुलेट के जवाब की जमकर तारीफ की।

ट्रंप दोस्त या दुश्मन… सबसे बड़ा सवाल

टैरिफ मामले में भी ट्रंप ने भारत के साथ दोस्त कम, दुश्मन वाला रवैया ज्यादा अपनाया। दुनिया में सबसे अधिक टैरिफ भारत (50%) पर लगाया। बाद में रूसी तेल न खरीदने का दबाव बनाया। भारत ने काफी तक मॉस्को से तेल खरीदना कम भी किया। पिछले कार्यकाल में भारत ने 2019 से ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया था। अबकी बार युद्ध के बीच 30 दिनों की छूट मिली। मगर इसे बढ़ाने से अमेरिका ने मना कर दिया।

ट्रंप की वजह से चाबहार भी छोड़ना पड़ा

चाबहार बंदरगाह मामले में भारत को मिली छूट को भी ट्रंप प्रशासन ने आगे नहीं बढ़ाया। नतीजा यह हुआ कि भारत को अपने कदम पीछे खींचने पड़े। पिछले साल ही ट्रंप ने भारत के खिलाफ एक बड़ा बयान दिया और कहा कि उसकी अर्थव्यवस्था मरी हुई है। उन्होंने एच-1बी वीजा पर फीस बढ़ा दी। इसका असर सबसे अधिक भारतीयों पर पड़ा, क्योंकि करीब 70 फीसद एच-1बी वीजा धारक भारतीय हैं।

पाकिस्तान को अधिक महत्व

चुनाव से पहले तक भारत के लोग ट्रंप के प्रति बेहद आशावान थे। लोगों को भारत-अमेरिका संबंध में सकारात्मक बदलाव की उम्मीद थी। यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन के एक सर्वे के मुताबिक भारत की 75 प्रतिशत जनता ट्रंप समर्थक थी। पहले कार्यकाल में ट्रंप और पाकिस्तान के रिश्ते अच्छे नहीं थे, लेकिन दूसरे कार्यकाल में ट्रंप ने भारत की तुलना में पाकिस्तान को अधिक महत्व दिया और संबंधों में लगातार सुधार किया। जहां जरूरी था वहां भी और जहां जरूरी नहीं था… वहां भी, असीम मुनीर का न केवल जिक्र किया, बल्कि तारीफ भी की।

रूस के खिलाफ भारत पर बढ़ाया दवाब

ट्रंप प्रशासन ने रूस के खिलाफ दबाव के तौर पर भारत का हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। नई दिल्ली पर भारी दबाव डाला। ट्रंप और उनके मंत्रियों ने टीवी चैनलों और सार्वजनिक मंचों पर भारत पर युद्ध को फंडिंग करने और युद्ध मशीन का समर्थन करने का आरोप लगाया। ट्रंप के कदम और रवैए से संकेत मिलते हैं कि उन्हें नई दिल्ली की भावनाओं की कोई परवाह नहीं। उनके मनमाने व्यवहार के बावजूद मोदी सरकार ने बेहद संयमित और साधा रुख अपनाया। अनाप-शनाप दावों और बयान पर भी नई दिल्ली ने कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी। मगर सवाल उठ रहा है कि ऐसा क्यों? 

भारत के आगे क्या चुनौती?

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ट्रंप के व्यवहार का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। वह आगे क्या बोलेंगे और क्या करेंगे… यह किसी को नहीं पता है। अभी तक ट्रंप के तमाम आपत्तिजनक बयान पर भारत ने कोई कड़ा रुख नहीं अपनाया। मगर सबसे बड़ी परीक्षा यह है कि भारत कब तक संयम बरतेगा। ट्रंप के व्यवहार से साफ है कि वाशिंगटन पर हद से ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता है। 

इस वजह से नरम रुख अपना रहा भारत? 

भारत की निगाह 2048 पर टिकी है। मोदी सरकार ने अगले 22 साल में देश को विकसित भारत बनाने का लक्ष्य तय किया है। एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होगा। सरकार को उम्मीद है कि अगर सबकुछ सही चलता रहा तो दो दशक के भीतर भारत आर्थिक और सैन्य महाशक्ति होगा। यही कारण है कि भारत सरकार अभी संयम का परिचय दे रही है, ताकि आर्थिक विकास पर कोई बाधा न बन सके, क्योंकि भारत की प्रगति के पथ पर अमेरिका और चीन जैसी महाशक्तियां हैं। वह आसानी से नई दिल्ली को आगे निकलने नहीं देंगी। इसी साल मार्च में नई दिल्ली में आयोजित रायसीना डायलॉग में अमेरिका के उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडौ ने कहा था कि अमेरिका भारत के मामले में वैसी गलती नहीं करेगा जैसा कि 20 साल पहले उसने चीन के साथ की थी।

 

30 की उम्र में त्वचा का कैसे रखें ख्याल? झुर्रियां और फाइन लाइंस होगी कम


महिला हो या पुरुष हर कोई अपनी त्वचा को जवान और खूबसूरत बनाए रखने चाहता है। खूबसूरत त्वचा के लिए लोग तरह-तरह के उपाय करते हैं। जब हम 20s में होते हैं तो त्वचा प्राकृतिक रूप से खूबसूरत होती है लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है त्वचा में दाग-धब्बे, झाइयां और महीन रेखाएं दिखने लगती है। 

 

उम्र के इस पड़ाव में कोलेजन का उत्पादन कम हो जाता है, हाइड्रेशन कम हो जाता है जिससे त्वचा रूखी और बेजान हो जाती है। इसके अलावा धूप, प्रदूषण, तनाव और खराब लाइफस्टाइल का असर भी पड़ता है। इस उम्र के लोग अपने स्किन केयर रूटीन को सिंपल रखें ताकि त्वचा निखरी और ग्लोइंग नजर आए।

 

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30 की उम्र में कैसे करें स्किन केयर

सनस्क्रीन लगाएं- इस उम्र के लोगों को सनस्क्रीन जरूर लगाना चाहिए। ये आपकी त्वचा को सूरज की हानिकारक किरणों से बचाने का काम करता हैं।

त्वचा को एक्सफोलिएट करें- एक्सफोलिएशन करने से डेड स्किन हटाने में मदद मिलती है। साथ ही त्वचा में निखार आता है। हफ्ते में दो बार एक्सफोलिएशन जरूर करें।

एंटी एजिंग प्रोडक्ट्स लगाएं- अगर स्किन पर झुर्रियां या फाइन लाइंस दिख रही है तो एंटी एजिंग प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करें। इन प्रोडक्ट्स में रेटिनोल, विटामिन सी और पेप्टाइड्स मौजूद होता है जो एजिंग की समस्याओं को कम करने में मदद करता है। 

झुर्रियों से कैसे छुटकारा पाएं?

झुर्रियों को कम करने के लिए अपने लाइफस्टाइल में बदलाव करें। इससे त्वचा की इलास्टिसिटी बेहतर होगी और ओवर ऑल लुक में निखार आएगा।

 

पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं– त्वचा में झुर्रियों और फाइन लाइंस को कम करने के लिए नियमित रूप से पानी पिएं। इससे त्वचा हाइड्रेटेड रहती है। पर्याप्त मात्रा में पीने से इलास्टिसिटी बनी रहती है।

 

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एंटी ऑक्सडेंट युक्त चीजें खाएं- एंटी ऑक्सीडेंट वाली चीजों को खाने से शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस कम होता है। बेरीज, डार्क चॉकलेट, नट्स खाएं।

 

पर्याप्त नींद लें- हर व्यक्ति को 7 से 8 घंटे की नींद लेनी चाहिए। पर्याप्त मात्रा में नींद नहीं लेने से त्वचा थकी थकी और डल नजर आती है।

मुश्किल हुई केदारनाथ यात्रा, कड़ाके की ठंड, अपनी सेहत कैसे ठीक रखें? तरीका जानिए


उत्तराखंड में चारधाम यात्रा की शुरुआत हो चुकी है। केदारनाथ धाम के कपाट 22 अप्रैल के दिन खोल दिए गए, जिस वजह से हजारों की तादाद में लोग केदारनाथ धाम जा रहे हैं। अप्रैल के महीने में केदारनाथ धाम के आसपास काफी ठंड हो रही है। हर दिन वहां का तापमान गिरता जा रहा है। ऐसे में तीर्थ यात्रियों को कुछ उपाय अपनाने चाहिए, जिससे वे ठंड से बच सकें।

 

इस दौरान कई हजार युवा से लेकर बुजुर्ग केदारनाथ धाम की यात्रा पर गए हैं। हर साल चारधाम यात्रा पर जाने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस साल भी हजारों लोग केदारनाथ धाम के दर्शन के लिए पहुंचे हैं। इस यात्रा के दौरान कई लोगों की तबीयत बिगड़ी है और एक युवा शख्स की तबीयत बिगड़ने के कारण मौत हो गई। लोगों को यात्रा पर जाने से पहले अपनी सेहत का खास ध्यान रखना चाहिए। यात्रा पर जाने से पहले लोगों को अपना हेल्थ टेस्ट कराना चाहिए। 

 

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यात्रा के दौरान युवा की हुई मौत


केदारनाथ धाम जाने से पहले लोगों को ट्रेकिंग करनी पड़ती है। जिन लोगों को ट्रेकिंग यानी ज्यादा समय तक पैदल चलने की आदत नहीं होती, उनके लिए यह यात्रा जोखिम भरी हो सकती है। इससे उनकी तबीयत बिगड़ सकती है और जान का खतरा भी हो सकता है। कुछ ऐसा ही केदारनाथ के कपाट खुलने के पहले दिन हुआ। गुजरात से आए एक युवा की ट्रेकिंग के दौरान मौत हो गई।

 

यात्रा से पहले कराएं ये हेल्थ टेस्ट

 

जिन लोगों को स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं होती हैं, उन्हें तीर्थयात्रा से पहले कुछ मेडिकल टेस्ट जरूर कराने चाहिए। अब सवाल उठता है कि ये टेस्ट कौन से हैं और क्यों जरूरी हैं।

 

ईसीजी (ECG) टेस्ट – इस टेस्ट के जरिए व्यक्ति के दिल की धड़कन की गति को जांचा जाता है, जिससे यह पता चलता है कि व्यक्ति को हार्ट अटैक का कितना खतरा हो सकता है। डॉक्टर यह टेस्ट तब कराने की सलाह देते हैं, जब मरीज को सांस फूलने की दिक्कत हो और दिल तेज धड़कता हो।

 

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टीएमटी (TMT) टेस्ट – इस टेस्ट की मदद से डॉक्टर यह देखते हैं कि तनाव (एक्सरसाइज) के दौरान मरीज का दिल कैसे काम कर रहा है। इसके अलावा इस टेस्ट से दिल की आर्टरी में ब्लॉकेज का भी पता लगाया जाता है। मेडिकल टेस्ट के अलावा लोगों को यात्रा के दौरान कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए।

 

ठंड से कैसे बचें?

 

पानी पिएं – यात्रा के दौरान कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है, इसलिए समय-समय पर पानी पीते रहें, ताकि शरीर में पानी की कमी न हो।


गर्म कपड़े पहनें -यात्रा के दौरान गर्म कपड़े पहनना जरूरी है, ताकि शरीर को ठंड से बचाया जा सके।

 

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स्किन केयर करें – ठंड में त्वचा फटने लगती है इसलिए लोशन या मॉइस्चराइजर का इस्तेमाल करें।


ट्रेकिंग के दौरान बीच-बीच में आराम करें – लगातार कई घंटों तक पैदल न चलें, बीच-बीच में रुककर आराम करें, ताकि शरीर को थकान से राहत मिल सके।

होर्मुज पार कर रहे जहाज पर ईरानी हमला, 21 भारतीय सवार थे; सरकार का आया बयान


होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान और अमेरिका आमने सामने हैं। अमेरिकी दावों के बीच ईरान होर्मुज पर अपना कब्जा बरकरार रखने के लिए यहां आने वाले जहाजों को लगातार निशाना बना रहा है। इसी बीच ईरान की नेवी ने पनामा के झंडे वाले एक कंटेनर कार्गो जहाज पर गोलीबारी की थी। इस जहाज में 21 भारतीय क्रू मेंबर सवार थे। हालांकि, हमले के बाद भी इसपर सवार सभी भारतीय सुरक्षित हैं और उन्हें किसी भी तरह का कोई नुकसान नहीं हुआ है। यह जानकारी खुद भारत के शिपिंग मंत्रालय ने दी है।

 

पनामा के झंडे वाले कंटेनर कार्गो का नाम यूफोरिया है। यूफोरिया उन तीन जहाजों में से एक है, जिनपर बुधवार को इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने हमला किया था। यह हमला तब हुआ जब ईरान ने होर्मुज पर अमेरिकी रोक का विरोध कर रही है। ईरान होर्मुज पर अपना कंट्रोल बनाए रखना चाहता है। ईरान ने जिन पनामा के जहाज के अलावा जिन जहाजों के ऊपर हमला किया है, उनमें लाइबेरिया का जहाज शामिल है। यह जहाज भारत के मुंद्रा पोर्ट की ओर आ रहा था।

 

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21 भारतीय नाविक सवार थे- मंत्रालय

शिपिंग मंत्रालय के अपर सचिव मुकेश मंगल ने जानकारी देते हुए कहा, ‘यूफोरिया नाम के जहाज पर 21 भारतीय नाविक सवार थे और वे सभी सुरक्षित हैं।’ उन्होंने आगे कहा कि विदेशी झंडे वाले जहाजों पर हुई फायरिंग में कोई भी भारतीय नाविक घायल नहीं हुआ है।

ईरानी ने क्या कहा?

वहीं, ईरानी मीडिया ने हवाले से कहा गया है कि फ्रांसेस्का जहाज को बंदर अब्बास पोर्ट पर एपामिनोंडास के साथ हिरासत में लिया गया है, उसमें कोई भारतीय क्रू मेंबर नहीं था। ईरानी मीडिया ने बताया था कि हमले के बाद यूफोरिया ईरानी तट पर फंसा हुआ था।

 

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शिपिंग मंत्रालय का बयान

इस बीच, शिपिंग मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि गिलब्राल्टर के झंडे वाला बल्क कैरियर फ्रोसो K, 55,000 मीट्रिक टन सल्फर लेकर बुधवार को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरा और अब भारत के पारादीप पोर्ट के लिए रवाना हो रहा है। फ्रोसो K को फारस की खाड़ी से निकालने के लिए भारत सरकार कड़ी नजर रख रही है। इसके अलावा देश गरिमा नाम का जहाज क्रूड ऑयल टैंकर लेकर 18 अप्रैल को होर्मुज से रवाना हुआ था, जो बुधवार को मुंबई पहुंच गया।

जिन जहाजों को ईरान ने पकड़ा, उनमें 22 भारतीय सवार; सरकार ने क्या कहा?


ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पार करने वाले जहाजों पर एक्शन ले रहा है। हाल ही में दो भारतीय जहाजों पर फायरिंग के बाद दो विदेशी जहाजों को जब्त भी किया है। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर की नौसेना ने इन जहाजों पर समुद्री नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया। इस बीच भारत सरकार ने भी एक बयान जारी कर स्पष्ट किया है कि किसी भी भारतीय जहाज पर कोई गोलीबारी नहीं हुई है। हालांकि विदेशी झंडे वाले दो जहाजों पर 22 भारतीय नागरिक सवार हैं। सभी सुरक्षित हैं।

भारत सरकार ने क्या कहा?

बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव मुकेश मंगल ने बताया, ‘पिछले 24 घंटों में विदेशी झंडे वाले जहाजों पर गोलीबारी की कुछ घटनाएं हुई हैं। हालांकि किसी भी भारतीय जहाज पर फायरिंग नहीं हुई है। मगर हम इन जहाजों पर मौजूद भारतीय नाविकों को लेकर चिंतित हैं। विदेशी झंडे वाले जहाजों पर हुई गोलीबारी में कोई भी भारतीय नाविक घायल नहीं हुआ है। एक जहाज ‘यूफोरिया’ पर 21 भारतीय सवार हैं। यह सभी सुरक्षित हैं। वहीं ‘एपामिनोंडास’ पर एक भारतीय नागरिक सवार है। वह भी सुरक्षित है।’

 

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आईआरजीसी ने जहाजों को क्यों जब्त किया?

आईआरजीसी ने दोनों जहाजों पर समुद्री नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया। उसका कहना है कि इन जहाजों ने अपने ट्रैकिंग सिस्टम में हेरफेर किया और नौवहन को खतरे में डाला। इन जहाजों को हिरासत में लेने के बाद ईरान तट पर ले जाया गया है। 

 

बता दें कि सबसे पहले यूनाइटेड किंगडम मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (UKMTO) ने बुधवार को जहाजों पर गोलीबारी की जानकारी सार्वजनिक की। उसने बताया कि ओमान के उत्तर-पूर्व में एक कंटेनर जहाज ने बताया कि आईआरजीसी की एक गनबोट उसके नजदीक आई और बिना रेडियो संपर्क के फायरिंग शुरू कर दी। हमले में जहाज के पुल को भारी नुकसान पहुंचा है। हालांकि चालक दल पूरी तरह से सुरक्षित है।

 

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उधर, आईआरजीसी से जुड़ी फार्स न्यूज एजेंसी ने तीन जहाजों को निशाना बनाने की बात कही। उसका कहना है कि ‘यूफोरिया’, ‘एमएससी फ्रांसेस्का’ और ‘एपामिनोंडास’ पर कार्रवाई की गई है। बता दें कि अमेरिकी नाकेबंदी के विरोध में आईआरजीसी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में विदेशी जहाजों को निशाना बना रहा है। वहीं अमेरिकी नौसेना ईरानी जहाजों को बंदरगाहों से बाहर निकलने नहीं दे रही है।