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क्या भाग्य नहीं, कर्म से बदलता है भविष्य? भगवद्गीता और गरुड़ पुराण से समझिए


हिन्दू धर्म ग्रंथों में साफ तौर पर लिखा है कि व्यक्ति का कर्म ही उसका धर्म है। जो व्यक्ति अपने कर्म का पालन नहीं करता, वह अपने धर्म का भी पालन नहीं कर रहा होता। इसके विपरीत कई लोगों का मानना है कि व्यक्ति के भाग्य में जो पहले से लिखा है, वही होकर रहेगा यानी व्यक्ति किसी चीज को पाने के लिए कितनी भी मेहनत क्यों न करे, उसे जीवन में वही मिलेगा जो उसके भाग्य में लिखा है। इसी वजह से मन में यह सवाल उठता है कि जीवन कर्म से या भाग्य से बदलता है।

 

हिन्दू धर्म में भगवद्गीता और गरुड़ पुराण को बेहद महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। इनमें दिए गए उपदेशों और शिक्षाओं के आधार पर व्यक्ति अपने जीवन से जुड़े कई सवालों के उत्तर जान सकता है। इसी सिलसिले में कर्म और भाग्य को लेकर इन दोनों ग्रंथों में कई बातें बताई गई हैं, जिनके जरिए आप समझ सकते हैं कि व्यक्ति का भविष्य कर्म से बदलता है या किस्मत से। आइए जानते हैं कि भगवद्गीता और गरुड़ पुराण में क्या कहा गया है।

 

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 क्या है कर्म और भाग्य?

 

अक्सर जब व्यक्ति के साथ कुछ बुरा होता है, तो वह अपने कर्मों के बजाय भाग्य को दोषी ठहराता है। वह सोचता है कि यह चीज उसके भाग्य में नहीं लिखी थी, इसलिए उसे नहीं मिल पाई। लेकिन इस सोच के विपरीत भगवद्गीता में बताया गया है कि व्यक्ति कर्म करने के लिए बाध्य है, वह कभी भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता।

 

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने बताया है कि भाग्य कोई स्थायी नियति नहीं है। इसके बजाय व्यक्ति का भाग्य उसके पिछले जन्म के कर्मों के आधार पर बनता है। यानी इस जन्म का भाग्य, पिछले जन्म के कर्मों का फल है। इसी संदर्भ में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि व्यक्ति को अपने कर्म पर ध्यान देना चाहिए, न कि उसके फल की चिंता करनी चाहिए। यही बात इस श्लोक में कही गई है

 

‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।’

 

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इस श्लोक का अर्थ है कि व्यक्ति का अधिकार केवल कर्म करने पर है, फल पर नहीं। इसका गहरा अर्थ यह है कि हम वर्तमान में जो कर्म करते हैं, वही भविष्य में हमारा भाग्य बनाते हैं।

 

गरुड़ पुराण में क्या लिखा है?

 

गरुड़ पुराण हिन्दू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है। इसमें भी बताया गया है कि व्यक्ति के इस जन्म के कर्म ही अगले जन्म का भाग्य बनते हैं। यानी इस जन्म का भाग्य, पिछले जन्म के कर्मों का परिणाम है। इन्हीं कर्मों का फल व्यक्ति को मृत्यु के बाद भी भुगतना पड़ता है। इन्हीं कर्मों के आधार पर न केवल अगले जन्म का भाग्य तय होता है, बल्कि मृत्यु के बाद व्यक्ति को स्वर्ग या नरक की प्राप्ति भी होती है। अगर व्यक्ति के कर्म बुरे हैं, तो उसे अगले जन्म में उनके परिणाम भुगतने पड़ते हैं।

 

कर्म से बदलता है भविष्य?

हिन्दू धर्म के ग्रंथ भगवद्गीता और गरुड़ पुराण के अनुसार, व्यक्ति अपने कर्मों के आधार पर अपना भविष्य बदल सकता है क्योंकि भाग्य भी कर्मों के आधार पर ही बनता है। यदि व्यक्ति अच्छे कर्म नहीं करेगा, तो उसका भाग्य भी अच्छा नहीं होगा। इसलिए इन ग्रंथों में कर्म को भाग्य से अधिक महत्वपूर्ण माना गया है।

‘ट्रंप की मौत हुई तो फ्री बीयर पिलाऊंगा’, ऐसा एलान करने वाले का लाइसेंस कैंसल


अमेरिका के विस्कॉन्सिन राज्य की मनोक्वा ब्रूइंग कंपनी एक बार फिर विवादों में घिर गई है। कंपनी के मालिक किर्क बैंगस्टैड ने हाल ही में एलान किया था कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मौत होती है तो वह लोगों को मुफ्त बीयर देंगे। अब इस बयान के बाद उनकी कंपनी पर सरकारी कार्रवाई हुई है। राज्य सरकार ने ब्रुअरी का लाइसेंस रद्द करने का आदेश जारी कर दिया है। इस पर बैंगस्टैड का कहना है कि यह फैसला गलत है और वह इसके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे।

 

मिलवॉकी जर्नल सेंटिनल की रिपोर्ट के मुताबिक, विस्कॉन्सिन के राजस्व विभाग ने मिनोक्वा ब्रूइंग कंपनी की दो ब्रुअरी के बीयर बनाने के परमिट और एक शराब गोदाम का लाइसेंस रद्द कर दिया है। हालांकि, अगर कंपनी के मालिक किर्क बैंगस्टैड तय समय के अंदर इस फैसले को चुनौती देते हुए अपील करते हैं तो उस पर अंतिम फैसला आने तक उनकी ब्रुअरी पहले की तरह चलती रहेगी।

 

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यह पूरा विवाद कैसे शुरू हुआ?

पूरा विवाद जून में शुरू हुआ था, जब राज्य के अधिकारियों ने कंपनी की डिब्बाबंद बीयर जब्त कर ली थी। अधिकारियों का आरोप है कि यह बीयर इलिनॉय से बिना जरूरी परमिट और टैक्स चुकाए विस्कॉन्सिन लाई गई थी। इसी नियम उल्लंघन को आधार बनाकर विभाग ने लाइसेंस रद्द करने का फैसला लिया। बैंगस्टैड ने अपने समर्थकों को भेजे गए न्यूजलेटर और सोशल मीडिया पोस्ट में सरकारी कर्रवाई को अत्यधिक कठोर बताते हुए कहा कि मामूली प्रशासनिक आरोपों के लिए इतनी बड़ी सजा देना उचित नहीं है।

 

किर्क बैंगस्टैड ने साफ कहा है कि वह किसी भी कीमत पर अपनी ब्रुअरी बंद नहीं होने देंगे। उन्होंने कहा, ‘मुझे मेरे टैपरूम से जबरन बाहर निकालना पड़ेगा तभी मैं बीयर बेचना बंद करूंगा।’ दूसरी ओर, विस्कॉन्सिन डिपार्टमेंट ऑफ रेवेन्यू का कहना है कि उसका दायित्व राज्य के शराब और कर संबंधी कानूनों का पालन सुनिश्चित कराना है। यदि कोई लाइसेंसधारी नियमों का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई करना विभाग की जिम्मेदारी है।

 

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पहले भी विवादों में रह चुके हैं बैंगस्टैड

मिनोक्वा ब्रूइंग कंपनी अपनी राजनितिक सक्रियता के लिए भी जानी जाती है। कंपनी बर्नी ब्रू, टैमी शैंडी और एओसी आईपीए जैसे राजनीतिक नामों वाली बीयर बेचती है। इसी वर्ष बैंगस्टैड ने विस्कॉन्सिन के गवर्नर पद का चुनाव लड़ने की कोशिश की थी लेकिन पर्याप्त वैध सिग्नेचर नहीं होने के कराण उनका नाम मतपत्र में शामिल नहीं हो सका। अप्रैल में भी वह उस समय विवादों में आ गए थे जब ट्रंप पर हुए हमले के बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर फ्री बीयर डे को लेकर विवादित टिप्पणी की थी। इस पोस्ट के बाद अमेरिकी FBI और सीक्रेट सर्विस ने उनसे पूछताछ की थी और उनकी टिप्पणी की आलोचना हुई थी।

बाबरी मस्जिद विध्वंस की जांच करने वाले जज का निधन, जानिए कौन थे एम.एस. लिब्रहान?


उत्तर प्रदेश के अयोध्या में हुए बाबरी विध्वंस की जांच करने के लिए बने आयोग की अध्यक्षता करने वाले पूर्व जस्टिस मनमोहन सिंह लिब्रहान का निधन हो गया है। रविवार को चंडीगढ़ में 87 साल की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली। सोमवार को उनका अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें परिवार से जुड़े लोग और उनके करीबी ही शामिल रहे। 

 

जस्टिस लिब्रहान का जन्म 11 नवंबर 1938 को चंडीगढ़ के पास हुआ था। उन्होंने 1962 में वकालत शुरू की और बाद में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में जज बने। इसके बाद उन्हें मद्रास हाई कोर्ट और फिर आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया। रिटायर्मेंट के बाद वह कई चर्चित आयोगों के अध्यक्ष के रूप में सेवा देते रहे। बाबरी मस्जिद के विध्वंस की जांच के लिए बने आयोग की अध्यक्षता भी उन्होंने ही की थी। 

 

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बाबरी विध्वंस की जांच 

जस्टिस लिब्रहान उस समय सबसे अधिक चर्चा में आए, जब उन्हें बाबरी मस्जिद के विध्वंश की जांच के लिए बने आयोग का अध्यक्ष बनाया गया। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के कुछ दिनों बाद तत्कालीन केंद्र सरकार ने 16 दिसंबर 1992 को इस पूरे घटनाक्रम की जांच के लिए एक सदस्यीय आयोग का गठन किया। इस आयोग की जिम्मेदारी जस्टिस एम.एस. लिब्रहान को सौंपी गई थी। आयोग को शुरुआत में तीन महीने के भीतर रिपोर्ट देनी थी, लेकिन जांच का दायरा बढ़ने के कारण इसका कार्यकाल कई बार बढ़ाया गया। पूरी दुनिया की नजरें इस आयोग की जांच पर टिकी हुई थीं।

17 साल तक चली जांच

इस विध्वंस की जांच के लिए बने आयोग को ‘लिब्रहान आयोग’ के नाम से जाना गया और यह भारत के सबसे लंबे समय तक चलने वाले जांच आयोगों में शामिल रहा। आयोग ने करीब 17 सालों तक सुनवाई की, सैकड़ों गवाहों के बयान दर्ज किए और लास्ट में 30 जून 2009 को अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी। रिपोर्ट तैयार करने में आयोग ने 399 से अधिक बैठकें कीं और इसे पूरा करने के लिए कई बार आयोग का समय बढ़ाया गया।

जांच रिपोर्ट में क्या बताया?

लिब्रहान आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना अचानक हुई घटना नहीं थी, बल्कि यह प्लान करके की गई कार्रवाई थी। आयोग ने कई राजनीतिक नेताओं और संगठनों की भूमिका पर सवाल उठाए थे। हालांकि, बाद के सालों में इस मामले की न्यायिक प्रक्रिया अलग दिशा में आगे बढ़ी, लेकिन जस्टिस लिब्रहान अपने निष्कर्षों पर अंत तक कायम रहे। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि उनके सामने आए सबूत एक सुनियोजित साजिश की ओर इशारा करते हैं।

 

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सबसे चर्चित आयोग

लिब्रहान आयोग भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित जांच आयोगों में गिना जाता है। आयोग की रिपोर्ट संसद में साल 2009 में पेश की गई थी और इसने बाबरी मस्जिद विध्वंस को लेकर लंबे समय तक राजनीतिक और कानूनी बहस को प्रभावित किया। जस्टिस एम.एस. लिब्रहान का नाम इसी आयोग के कारण देशभर में सबसे अधिक जाना गया। हालांकि, उन्होंने कई हाई कोर्ट्स में जज की भूमिका भी निभाई। अब 87 साल की उम्र में उनका निधन हो गया है। 

ऑफिस लंच के लिए 5 हेल्दी और टेस्टी रेसिपी, मिनटों में करें तैयार

आजकल की भागदौड़ भरी लाइफ में ऑफिस का काम, मीटिंग्स और डेडलाइन्स के बीच हम सबसे ज्यादा अपनी सेहत से ही समझौता करते हैं। सुबह-सुबह जल्दी में या तो हम टिफिन ले जाना भूल जाते हैं या फिर कैंटीन के समोसे, छोले-भटूरे और पकौड़े खाकर काम चलाते हैं। लगातार बाहर का यह अनहेल्दी खाना न सिर्फ हमारी जेब खाली करता है बल्कि पेट खराब, वजन बढ़ना और एसिडिटी जैसी बीमारियां भी फ्री में दे जाता है।

 

अगर आप भी रोज-रोज ऑफिस में ये सोचकर परेशान हैं कि आज लंच में क्या खाया जाए तो अब टेंशन छोड़िए। हमने कुछ ऐसे टेस्टी और झटपट बनने वाले लंच बॉक्स आइडियाज तैयार किए हैं जो 15-20 मिनट में बन जाते हैं। ये रेसिपी जितनी बनने में आसान हैं उससे कहीं ज्यादा हेल्दी भी साबित होती हैं। इन फूड्स की मदद से न सिर्फ आपका पेट खुश रहेगा बल्कि आप दिनभर एनर्जेटिक भी महसूस करोगे।

 

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1. पनीर और वेजी रोल

अगर आपको दोपहर में बैठकर आराम से प्लेट लगाकर खाने का टाइम नहीं मिलता है तो यह रोल आपके लिए बिल्कुल परफेक्ट है। इसमें प्रोटीन और फाइबर बहुत ज्यादा होता है जिससे आपका पेट लंबे समय तक भरा रहता है और बार-बार कुछ उल्टा सीधा का मन नहीं करता है। इसे आप लैपटॉप पर काम करते करते भी आराम से खा सकते हैं।

कैसे बनाएं

इसे बनाना बहुत आसान है। नॉर्मल गेहूं या मल्टीग्रेन रोटी लें। उस पर थोड़ी सी घर की बनी हरी चटनी या दही लगा लें। अब एक पैन में थोड़ा सा तेल डालकर कद्दूकस किया हुआ पनीर या टोफू, बारीक कटी शिमला मिर्च, प्याज और टमाटर को 2 मिनट के लिए हल्का सा भून लें। इसमें नमक और थोड़ा सा चाट मसाला मिलाएं। अब इस स्टफिंग को रोटी के बीच में रखें, रोल बनाएं और फॉयल पेपर में लपेटकर टिफिन में पैक कर लें।

2. स्प्राउट्स और मूंग दाल चिल्ला 

 

यह लंच उन लोगों के लिए बेस्ट है जो वजन घटाना चाहते हैं या जिन्हें दोपहर में लंच करने के बाद बहुत ज्यादा आलस और नींद आती है। मूंग दाल पचने में बहुत हल्की होती है और शरीर को तुरंत एनर्जी देती है। इसे खाने के बाद आपका पेट तो भर जाएगा लेकिन भारीपन बिल्कुल महसूस नहीं होगा।

कैसे बनाएं 

इसके लिए आपको सुबह ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं है। बस रात को ही धुली मूंग दाल को भिगोकर पीस लें और फ्रिज में रख दें। सुबह इस घोल में थोड़ा सा नमक, हरी मिर्च, कटा हुआ धनिया और अपनी पसंद की सब्जियां मिला लें। तवे पर हल्का सा तेल या घी लगाकर डोसे की तरह फैलाएं और दोनों तरफ से सेक लें। साथ में थोड़े से उबले हुए चने या मूंग (Sprouts) रख लें।

3. वेजी पुलाव या क्विनोआ 

 

जब सुबह उठने में देर हो जाए और समझ न आए कि क्या बनाएं तब यह ‘वन-पॉट मील’ सबसे बड़ा सहारा बनता है। इसमें ढेर सारी सब्जियां होने की वजह से आपको भरपूर विटामिन्स मिलते हैं। अगर आप इसमें सोयाबीन या पनीर डाल देते हैं तो यह एक कम्पलीट न्यूट्रिशियस डाइट बन जाती है जो आपको दिनभर तरोताजा रखती है।

कैसे बनाएं 

कुकर में एक चम्मच तेल या घी गरम करें। उसमें थोड़ा सा जीरा, कटी हुई गाजर, मटर, बीन्स और सोयाबीन वड़ी (उबली हुई) डालें। अब इसमें धुले हुए चावल या क्विनोआ (Quinoa) डालें, स्वाद अनुसार नमक और हल्का सा गरम मसाला मिलाएं। जरूरत के हिसाब से पानी डालकर कुकर का ढक्कन बंद करें और एक सीटी लगा लें। 10 मिनट में आपका गरमा-गरम और टेस्टी लंच तैयार है।

 

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4. मिक्स वेज परांठा और गाढ़ा दही 

 

अगर आपको देसी खाना पसंद है और रोटी-सब्जी के बिना आपका पेट नहीं भरता तो परांठा और दही का कॉम्बिनेशन बेस्ट है। दही में गुड बैक्टीरिया होते हैं जो आपके डाइजेशन को सही रखते हैं और ऑफिस के स्ट्रेस की वजह से होने वाली एसिडिटी से बचाते हैं। यह खाना आपको पूरे दिन एनर्जी से भरपूर रखता है।

कैसे बनाएं 

इसके लिए आपको अलग से सब्जी पकाने की जरूरत नहीं है। रात की बची हुई सब्जी को आटे में मैश करके गूंद लें। अगर ताजा बनाना चाहें तो आटे में कद्दूकस की हुई लौकी, मेथी या पालक मिलाकर आटा गूंद लें। कम तेल या घी में परांठा सेकें। इसे अचार की जगह एक छोटे डिब्बे में ताजा, गाढ़ा दही रखकर उसके साथ पैक करें।

5. सिंपल तड़का दाल, चावल और खीरा

 

दाल-चावल को भारतीय खाने का ‘किंग’ माना जाता है। जब काम का बहुत ज्यादा प्रेशर हो तो यह सिंपल खाना दिमाग को बहुत सुकून देता है। मूंग या अरहर की दाल आसानी से पच जाती है और इसमें भरपूर प्रोटीन होता है। साथ में खीरा या सलाद खाने से शरीर में पानी की कमी नहीं होती।

कैसे बनाएं 

सुबह कुकर में मूंग या अरहर की दाल हल्दी और नमक डालकर उबाल लें। एक छोटे पैन में राई, जीरा, हींग और हरी मिर्च का सिंपल तड़का लगाएं और दाल में मिला दें। साथ में सादे चावल बना लें। टिफिन में एक तरफ दाल-चावल रखें और दूसरी तरफ खीरा, गाजर या टमाटर काट कर रख लें। अगर इंसुलेटेड टिफिन हो तो दोपहर में गर्म-गर्म दाल-चावल खाने का मजा ही अलग है।

14 या 15 अगस्त कब है? मुहूर्त और व्रत नियम जानें


सनातन धर्म में Hariyali Teej को बेहद खास पर्व माना जाता है। इस पर्व में लाखों महिलाएं अपने पति और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए व्रत रखती हैं। इसके साथ ही महिलाएं अपने पति के साथ मिलकर महादेव की पूजा करती हैं। वहीं, अविवाहित लड़कियां भी व्रत रखती हैं ताकि उन्हें एक अच्छा पति मिले। धार्मिक परंपरा के अनुसार, इस पर्व पर शादीशुदा महिलाएं सोलह शृंगार करती हैं, साथ ही हरी चूड़ियां पहनती हैं।

 

हरियाली तीज में सिर्फ सुखी जीवन और समृद्धि की कामना नहीं की जाती, बल्कि इस पर्व में मानसून के आगमन की खुशी भी मनाई जाती है। इसी वजह से कई सुहागन महिलाएं सोलह शृंगार करने के बाद झूला झूलती हैं। साथ ही कई महिलाएं अपनी लोकभाषा में गीत भी गाती हैं। अब सवाल उठता है कि इस साल हरियाली तीज कब मनाई जाएगी? आइए जानते हैं।

 

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Hariyali Teej 2026 Date: कब है हरियाली तीज?

हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल 14 अगस्त की शाम 6 बजकर 46 मिनट पर हरियाली तीज की तिथि शुरू हो रही है, जो 15 अगस्त की शाम 5 बजकर 28 मिनट पर खत्म होगी। इस पर्व की उदया तिथि 15 अगस्त है। इसी वजह से 15 अगस्त को ही हरियाली तीज मनाना चाहिए। हरियाली तीज का ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04:50 से 05:35 तक रहेगा। इस समय जागकर भक्तों को पूजा-पाठ करनी चाहिए।

पूजा की विधि

इस पर्व में विशेष रूप से भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा की जाती है। साथ ही भक्तों को भगवान शिव के पूरे परिवार की भी पूजा करनी चाहिए। पूजा के दौरान भक्तों को शिवलिंग पर जलाभिषेक करना चाहिए। यह जलाभिषेक सिर्फ जल और कच्चे दूध से ही नहीं, बल्कि गंगाजल से भी करना चाहिए।

 

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पूजा के दौरान भगवान शिव और मां पार्वती को वस्त्र अर्पित करें। साथ ही मां पार्वती को सोलह शृंगार का सामान चढ़ाएं। इसके साथ मिठाई और फल भी अर्पित करें। पूजा के अंत में हरियाली तीज की व्रत कथा का पाठ करें। इसके बाद प्रेम भाव से आरती करें।

हरियाली तीज के व्रत के नियम

  1. हरियाली तीज के पर्व पर निर्जला व्रत रखें। हालांकि, आप अपने स्वास्थ्य के अनुसार फलाहारी व्रत भी रख सकते हैं।
  2. जो व्यक्ति व्रत रखता है, उसे सुबह पूजा करने से पहले व्रत का संकल्प लेना चाहिए, वरना व्रत अधूरा माना जाता है।
  3. व्रत रखने वाले भक्तों को व्रत कथा पढ़नी या सुननी चाहिए, वरना व्रत अधूरा माना जाता है।
  4. इस दिन सुहागन महिलाओं को सोलह शृंगार करना चाहिए। खासतौर पर हरे रंग की चूड़ियां पहनें और हरे रंग की साड़ी या सूट धारण करें।
  5. हरियाली तीज का व्रत रखने वाली महिलाओं को रात के समय सोना नहीं चाहिए। साथ ही रात में जागरण करना चाहिए।

 

नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और गणनाओं पर आधारित है। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।

 

डोनाल्ड ट्रंप का गाजा प्लान, विवाद सुलझाने की जगह इजरायल को उलझा क्यों रहा है?


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक एलान, इजरायल के लिए मुसीबत बनता नजर आ रहा है। उन्होंने कुछ दिनों पहले दावा किया था कि हमास और गाजा के सभी सशस्त्र समूह पूरी तरह से हथियार छोड़ने के लिए तैयार हो गए हैं। उन्होंने दावा किया कि हथियार छोड़ने के साथ ही इजरायली सेना गाजा से पीछे हटेगी और एक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बल नई फिलिस्तीनी पुलिस के साथ गाजा की सुरक्षा संभालेगा।

डोनाल्ड ट्रंप ने इसे ऐतिहासिक समझौता बताया है लेकिन हमास ने साफ कहा है कि यह समझौता एक पैकेज है। हमास के वरिष्ठ नेता गाजी हमाद ने कई बार दोहराया है कि उनका संगठन, तब तक हथियार छोड़ने के लिए तैयार नहीं है, जब इजरायल ‘येलो लाइन’ से पीछे नहीं हटता है। 

येलो लाइन, गाजा पट्टी में इजरायली सेना (IDF) की ओर से बनाई गई एक नई सुरक्षा सीमा है।  यह इजरायल के कब्जे वाले इलाकों को बाकी गाजा से अलग करती है। अभी यह एक बफर जोन के तौर पर काम कर रही है, जिसे लेकर हमास ऐतराज जता रहा है।

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गाजी हमाद, सीनियर हमास नेता:-
हम हथियार तब तक नहीं छोड़ेंगे, जब तक इजरायल युद्ध रोक नहीं देता, अपने सैनिकों को ‘येलो लाइन’ तक पीछे नहीं खींच लेता, हत्याएं बंद नहीं करता और भरपूर मानवीय मदद नहीं आने देता।

क्यों ट्रंप का प्लान इजरायल को फंसा देगा?

हमास ने अमेरिका को साफ कह दिया है कि कोई भी भारी हथियार नष्ट नहीं होंगे, बल्कि उन्हें नेशनल कमेटी के अधीन रखा जाएगा। एक बार यह शर्त भी मान लिया जाए लेकिन हमास जोर दे रहा है कि एक आजाद फिलिस्तीनी राज्य भी बनना चाहिए। इजरायल को यह मंजूर नहीं है। इजरायल, हमास के साथ कोई भी समझौता नहीं चाहता है।

इजरायल को फंसा रहे हैं ट्रप?

इजरायल की तरफ से अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू चुप हैं। लेकिन इजरायल के दक्षिणपंथी मंत्री इस समझौते का विरोध कर रहे हैं। इजरायली अधिकारियों का कहना है कि पहले हमास को पूरी तरह हथियार खत्म करने होंगे, उसके बाद ही कोई वापसी हो सकती है।

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इजरायल क्या अमेरिकी शर्त मानेगा?

इजरायल ने रफाह में मोरक्को और युगांडा के 200 सैनिकों वाले एक पायलट अंतरराष्ट्रीय बल को भेजने की मंजूरी दी है। अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि यह शर्तों पर आधारित समझौता है। एक चरण पूरा होगा, तभी अगले चरण पर बात होगी। विस्तृत योजना दो हफ्ते में जारी हो सकती है। गाजा के लोग उम्मीद और डर दोनों महसूस कर रहे हैं। बीते साल अक्टूबर में हुए सीजफायर के बाद भी हिंसा जारी रही और गाजा में स्थिति बेहद खराब है।  

अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई वाले समझौते भरोसे के काबिल कम होते हैं। ईरान के साथ उन्होंने संघर्ष विराम समझौता किया था, जिसे वह कब का तोड़ चुके हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज आज भी टकराव का केंद्र बना हुआ है। हर दिन किसी न किसी जहाज पर हमला हो रहा है। अब देखना होगा कि बार-बार अपने किए वादों से पलटने वाले डोनाल्ड ट्रंप, इस समझौते को लेकर कितने गंभीर हैं, यह नया समझौता कितना टिकता है। अगर इजरायल, अमेरिका की बात मानकर पीछे हटता गया तो एक बार फिर अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में ही इजरायली डिफेंस फोर्स घिर सकती है।

साइकिल खरीद में 90 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप, AAP ने दिल्ली सरकार को घेरा


आम आदमी पार्टी (AAP) ने दिल्ली सरकार पर स्कूली छात्राओं के लिए साइकिल खरीद में करीब 90 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप लगाया है। पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने दावा किया कि साइकिल खरीद के लिए जारी किए गए टेंडर की शर्तों में जानबूझकर बदलाव कर एक पहले से तय कंपनी को फायदा पहुंचाया गया। इन आरोपों के बाद दिल्ली की राजनीति में नया बवाल शुरू हो गया है। भारतीय जनता पार्टी ने इन आरोपों को खारिज कर दिया है।  

 

सौरभ भारद्वाज ने रविवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि हाल ही में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने विनोद नगर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में कक्षा 9 की छात्राओं को साइकिल बांटी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि इन्हीं साइकिलों की खरीद प्रक्रिया में बड़े स्तर पर अनियमितताएं हुई हैं और सरकार ने बाजार कीमत से काफी अधिक दाम पर साइकिलें खरीदीं। 

क्या आरोप लगाए?

सौरव भारद्वाज ने कहा, ‘दिल्ली सरकार के 650 करोड़ के स्वास्थ्य घोटाले के बाद एक और घोटाले का आरोप लग रहा है कि लड़कियों को बांटी गई साईकिलों में बड़ा घोटाला हुआ है। मुख्यमंत्री ने 2 दिन पहले विनोद नगर में साइकिल बांटी। उन साइकिलों की खरीद में बड़े घोटाले के आरोप लग रहे हैं। 650 करोड़ के घोटाले में ACB के आरोप थे कि टेंडर को टेलर किया गया। वही आरोप इन साइकिल खरीद में भी लगे हैं।’

 

सौरव भारद्वाज के मुताबिक, कई कंपनियों ने इस मामले में मुख्य सतर्कता आयोग (CVC), उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को लिखित शिकायत भेजी है। शिकायतों में कहा गया है कि टेंडर की शर्तें इस तरह बनाई गईं कि केवल चुनिंदा कंपनियां ही पात्र हो सकें। सौरभ भारद्वाज ने आरोप लगाया कि शिकायतों के बावजूद अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई। 

मंहगे दाम पर साइकिल खरीद का आरोप

सौरभ भारद्वाज ने दावा किया कि एसके बाइक्स सहित कुछ कंपनियों ने शिकायत में कहा है कि टेंडर में जिन स्पेसिफिकेशन वाली माउंटेन टेरेन (MTB) साइकिलों की मांग की गई है, वही साइकिल बाजार में करीब 4,100 रुपये में उपलब्ध है। उनका आरोप है कि इसके बावजूद टेंडर में प्रति साइकिल कीमत 6,923 रुपये तय की गई और बाद में लगभग 6,957 रुपये प्रति साइकिल की दर से खरीद की गई।

 

सौरभ भारद्वाज ने अपने दावों को मजबूत करने के लिए कंपनी के पिछले रिकॉर्ड को भी शेयर किया। उन्होंने कहा कि संबंधित कंपनी पहले से राजस्थान, मध्य प्रदेश और असम जैसे राज्यों में इसी प्रकार की साइकिलें लगभग 4,100 रुपये प्रति साइकिल की दर से उपलब्ध करा चुकी है। ऐसे में दिल्ली में कहीं अधिक कीमत पर खरीद किए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। 

शर्तों में बदलाव का आरोप

आम आदमी पार्टी का आरोप है कि दिल्ली सरकार ने 1.30 लाख साइकिलों की खरीद के लिए टेंडर जारी किया था। सौरभ भारद्वाज ने कहा कि यदि टेंडर का कुल मूल्य लगभग 90 करोड़ रुपये था, तो सामान्य नियमों के अनुसार इस प्रक्रिया में भाग लेने वाली कंपनियों के लिए टर्नओवर की सीमा करीब 180 करोड़ रुपये तक होनी चाहिए थी। लेकिन इसे बढ़ाकर 360 करोड़ रुपये कर दिया गया, जिससे कई कंपनियां अपने आप ही इस टेंडर प्रक्रिया से बाहर हो गईं। सरकार पर आरोप लगया गया है कि सरकार ने इस टेंडर के लिए प्री-बिड मीटिंग भी आयोजति नहीं की थी। आम आदमी पार्टी ने मामले की निष्पक्ष जांच कराने और पूरे टेंडर की प्रक्रिया सार्वजनिक करने की मांग की है। 

गाली देने वाला बॉस अच्छा लीडर होता है या नहीं? रिसर्च में हो गया खुलासा


कुछ लोगों की बातचीत में गाली गलौज आम बात होती है। वर्कप्लेस पर भी ऐसे लोग मिल जाते हैं और कई बार वे लीडर की भूमिका में होते हैं। क्या गाली देने वाला बॉस बेहतर टीम लीडर हो सकता है? सुनन में यह बात अजीब लग सकती है लेकिन एक नई स्टडी के मुताबिक इसका जवाब हर किसी के लिए एक जैसा नहीं है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि सामने वाला व्यक्ति और उसकी टीम उस भाषा को किस तरह लेती है।

 

शायद आपने भी ऐसे टीम लीडर या मैनेजर के साथ काम किया होगा जो कर्मचारियों का हौसला बढ़ाते समय बीच-बीच में गाली देने से परहेज नहीं करता हो या अपनी बात को स्पष्ट तरीके से रखने के लिए अक्सर अपशब्दों का सहारा लेते हैं। हालांकि, ऐसे व्यवहार पर सहकर्मियों की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं होती। कुछ लोगों को यह सहज और मजेदार लग सकता है, कुछ इसे नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि कई लोग इसे खराब नेतृत्व, गैर-पेशेवर रवैया और पूरी तरह अनावश्यक मानते हैं।

 

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क्या कहती है स्टडी?

हमारे अध्ययन से पता चलता है कि गाली देने वाले बॉस के प्रति लोगों की राय केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि उन्होंने क्या कहा, बल्कि इस पर भी निर्भर करता है कि सुनने वाला कौन है और वह किस देश या सामाजिक परिवेश में रहता है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि नेतृत्व करने का कोई एक ऐसा तरीका नहीं है, जिसे हर जगह सही माना जाए। फिर भी, कुल मिलाकर जिन कर्मचारियों के वरिष्ठ अधिकारी अक्सर गाली-गलौज करते थे, वे उनसे कम संतुष्ट पाए गए।

 

इसलिए यदि आप सोच रहे हैं कि बैठकों में गाली-गलौज करना एक प्रभावी प्रबंधन रणनीति हो सकती है, तो बेहतर होगा कि इससे बचा जाए। हालांकि, हमारे अध्ययन में शामिल 19 देशों के 5,660 कर्मचारियों में कुछ लोगों की राय बिल्कुल अलग थी। 

किन लोगों को पसंद है गाली देने वाला लीडर?

स्वयं में साइकोपैथिक और मैकियावेलियन (भावनाओं या सहानुभूति के बजाय अपने लाभ को प्राथमिकता देने वाले) व्यक्तित्व के अधिक लक्षण बताने वाले प्रतिभागियों ने बताया कि जैसे-जैसे उनके बॉस की भाषा में गाली-गलौज बढ़ती गई, वैसे-वैसे उनके प्रति उनकी संतुष्टि भी बढ़ी।  साइकोपैथिक और मैकियावेलियन व्यक्तित्व वाले लोग भावनात्मक रूप से अपेक्षाकृत कम जुड़ाव महसूस करते हैं और सामाजिक मानदंडों की परवाह भी कम करते हैं। इन मानदंडों में यह धारणा भी शामिल है कि बॉस को गाली नहीं देनी चाहिए। ऐसे लोगों को गाली देने वाला बॉस अधिक सच्चा, आत्मविश्वासी और औपचारिक नियमों से मुक्त व्यक्ति के रूप में दिखाई दे सकता है।

 

वहीं, जिन कर्मचारियों में ‘नार्सिसिस्टिक’ यानी आत्ममुग्धता के लक्षण अधिक थे, उनकी प्रतिक्रिया चौंकाने वाली रही। उन्हें न तो बॉस की गालियां विशेष रूप से पसंद आईं और न ही उनसे कोई खास आपत्ति हुई। उनके वरिष्ठ अधिकारी के प्रति संतुष्टि लगभग वैसी ही बनी रही। अध्ययन में यह भी स्पष्ट हुआ कि केवल व्यक्ति का स्वभाव ही नहीं, बल्कि वह किस समाज में रहता है, यह भी उसकी प्रतिक्रिया को प्रभावित करता है।

 

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आर्थिक असमानता का क्या प्रभाव पड़ता है?

जिन देशों में आय की समानता अपेक्षाकृत अधिक है, जैसे स्वीडन और ऑस्ट्रिया, वहां लोगों के व्यक्तित्व के आधार पर प्रतिक्रियाओं में स्पष्ट अंतर दिखाई दिया। यानी वही मैनेजर, वही भाषा और वही गाली- एक कर्मचारी को सहज और मिलनसार लग सकती है, जबकि दूसरे को वही व्यवहार गैर-पेशेवर प्रतीत हो सकता है।

 

इसके विपरीत, जिन देशों में आर्थिक असमानता अधिक है, जैसे दक्षिण अफ्रीका और मेक्सिको, वहां व्यक्तित्व का प्रभाव लगभग खत्म हो गया। ऐसे देशों में अधिकांश कर्मचारियों ने चाहे उनका व्यक्तित्व कैसा भी रहा हो, गाली देने वाले बॉस को नकारात्मक नजरिये से ही देखा। आखिर ऐसा क्यों होता है? आर्थिक असमानता पर हुए दूसरे अध्ययन बताते हैं कि जिन समाज में असमानता अधिक होती है, वहां लोग सामाजिक हैसियत और पद को लेकर अधिक सजग रहते हैं। ऐसे माहौल में पद की गरिमा बहुत महत्वपूर्ण होती है। इसलिए जब कोई वरिष्ठ अधिकारी गाली देता है तो कर्मचारी उसे दोस्ताना व्यवहार के रूप में नहीं बल्कि अपने अपमान के रूप में देखता है। यानी वहां निजी व्यक्तित्व से ज्यादा सामाजिक परिवेश लोगों की सोच को प्रभावित करता है।

रिसर्च में क्या निकला ?

प्रभावी संवाद केवल सही शब्द चुनने का नाम नहीं है। एक ही वाक्य किसी कर्मचारी को प्रेरित कर सकता है, दूसरे को नाराज कर सकता है और तीसरे पर उसका कोई असर ही नहीं पड़ सकता। यही वजह है कि नेतृत्व को लेकर दी जाने वाली सलाह कई बार विरोधाभासी लगती है। कोई विशेषज्ञ कहता है कि नेता को हमेशा ‘स्वाभाविक’ रहना चाहिए, जबकि दूसरा हर परिस्थिति में पेशेवर आचरण बनाए रखने की सलाह देता है।

 

असलियत यह है कि दोनों ही बातें सही हो सकती हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि सामने कौन है और वह किस सांस्कृतिक तथा सामाजिक वातावरण से आता है। तो क्या नेतृत्व की भूमिकाएं निभा रहे लोगों को गाली देना पूरी तरह छोड़ देना चाहिए? जरूरी नहीं। लेकिन उन्हें यह जरूर समझना चाहिए कि हर व्यक्ति अलग होता है, इसलिए संवाद करने का कोई एक तरीका ऐसा नहीं हो सकता जो सभी कर्मचारियों पर समान रूप से असर करे। अच्छा बॉस वही होता है जो अपनी टीम को समझे। एक प्रभावी बॉस के लिए यह जानना उतना ही जरूरी है कि उसकी टीम कैसी है, जितना कि यह तय करना कि किस परिस्थिति में कौन से शब्द बोलने चाहिए और किन से बचना चाहिए।

कांवड़ ले जा रहे हैं? भूलकर भी न करें ये 5 काम, खंडित हो जाएगी पूजा


इस साल 30 जुलाई से सावन महीने की शुरुआत हो चुकी है। इस महीने को शिव भक्ति के लिए सबसे पावन महीना माना जाता है। इसी वजह से कई भक्त इस महीने कांवड़ यात्रा पर निकलते हैं, जहां वे लाखों की संख्या में गंगा या किसी पवित्र नदी का जल लेकर आते हैं। इसी जल से शिवलिंग का जलाभिषेक किया जाता है। धार्मिक जानकारों के मुताबिक, कांवड़ यात्रा के दौरान भक्तों को कुछ नियमों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। तभी यात्रा सफल मानी जाती है।

 

इस साल सावन का महीना 30 जुलाई से लेकर 28 अगस्त तक चलने वाला है। इस दौरान कई भक्त सोमवार का व्रत रखते हैं, तो कई लोग रुद्राभिषेक कराते हैं। इसके अलावा कई लोग कांवड़ यात्रा पर भी जाते हैं। अब सवाल उठता है कि भक्तों को कांवड़ यात्रा के दौरान किन नियमों का पालन करना चाहिए? आइए जानते हैं कांवड़ यात्रा के 5 विशेष नियम।

 

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कांवड़ यात्रा के 5 नियम

1.जमीन पर कांवड़ न रखें – इस यात्रा के दौरान कांवड़ियों को अपनी कांवड़ जमीन पर नहीं रखनी चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जल से भरी कांवड़ को जमीन पर रखना उचित नहीं माना जाता। यदि किसी भक्त से गलती से कांवड़ जमीन पर रख दी जाए, तो उसे दोबारा जल भरकर लाना चाहिए। मान्यता है कि जमीन पर रखी गई कांवड़ के जल से जलाभिषेक करने पर शिवजी का आशीर्वाद नहीं मिलता और पूजा खंडित मानी जाती है।

 

2.पवित्र नदी का जल लें – कांवड़ यात्रियों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे बहती हुई पवित्र नदी का जल ही लेकर जाएं। कुएं या तालाब का जल कांवड़ के लिए नहीं लेना चाहिए।

 

3.तामसिक भोजन और नशे से दूर रहें – भक्तों को यात्रा के दौरान तामसिक भोजन यानी लहसुन, प्याज, मांस और मछली का सेवन नहीं करना चाहिए। साथ ही शराब, सिगरेट, गुटखा और अन्य नशे से भी पूरी तरह दूर रहना चाहिए।

 

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4.चमड़े की वस्तुओं का प्रयोग न करें – कांवड़ यात्रा के दौरान चमड़े से बनी वस्तुओं का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। यानी चमड़े के पर्स, बेल्ट और जूते आदि का प्रयोग करने से बचना चाहिए।

 

5.चप्पल न पहनें – इस यात्रा के दौरान भक्तों को न सिर्फ साफ-सुथरे कपड़े पहनने चाहिए, बल्कि धार्मिक मान्यता के अनुसार यथासंभव नंगे पैर यात्रा करनी चाहिए और चप्पल या जूते पहनने से बचना चाहिए।

 

नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और गणनाओं पर आधारित है। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।

 

क्या पाकिस्तान में तख्तापलट होने वाला है, गृह मंत्री के बयान से बहस क्यों छिड़ी?


पाकिस्तान में निरंकुशता लगातार बढ़ती जा रही है। सेना हर जगह अपना नियंत्रण चाहती है या बना लिया है। विरोध करने वालों को जेलों में डाला जाता है। सोशल मीडिया और यूट्यूब पर बगावती स्वर अपनाने वाले लोगों के चैनलों को ब्लॉक कर दिया जाता है। हाल ही में 27 यूट्यूब चैनल को ब्लॉक करने का आदेश भी दिया गया। 

 

पाकिस्तान की भाषा में इसे हाईब्रिड निजाम कहा जाता है। जहां मुखौटे के तौर पर नागरिक सरकार होती है, लेकिन असली सत्ता सेना चला रही होती है। आज पाकिस्तान की सत्ता पर आसिम मुनीर का पूरी तरह से कब्जा हो चुका है। वे टॉयलेट को छोड़कर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के साथ हर जगह मौजूद रहते हैं। दुनिया में विरला ही उदाहरण है, जहां सेना प्रमुख का अपने प्रधानमंत्री के साथ घूमना इतना आम है।

 

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क्या आसिम मुनीर एक मौके की तलाश में? 

बलूचिस्तान, खैबर खख्तूनख्वा और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में जनता की नाराजगी व सेना के खिलाफ बढ़ती नफरत से आसिम मुनीर परेशान है। यही वजह है कि पाकिस्तान में एक बड़े व्यवस्था परिवर्तन की सुगबुगाहट चल रही है। कुछ पत्रकारों और जानकारों का आरोप है कि सेना सत्ता पर कब्जा करने फिराक में है। अगर कुछ बड़ा उथल-पुथल होता है तो आसिम मुनीर को अपनी पकड़ मजबूत करने का मौका मिल जाएगा। मुनीर अब उसी मौके की तलाश में है। इस बात को तब और बल मिला जब पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने व्यवस्था परिवर्तन की बात कह दी। पाकिस्तान की जनता, पत्रकार, छात्र और नागरिक संगठन अलग-अलग तरह से मोहसिन नकवी के बयान के मायने निकालने में जुटे हैं।

 

 

 

‘रेडलाइन क्रॉस नहीं करना चाहता’

पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने हाल में अपने एक बयान में कहा, ‘अल्लाह ने आपको एक इनायत (कृपा) दी है। एक बंदा (आसिम मुनीर) आपके लिए इतने बड़े-बड़े अवसर लेकर आ रहा है। सबसे बड़ा क्रेडिट उस शख्स को यह जाता है कि वह कोई रेडलाइन है, जो क्रॉस नहीं करना चाहता है। वो कहता है कि नहीं… इसी सिस्टम में ही और ठीक करना है।’ 

 

मोहसिन नकवी के इस बयान ने नई आशंका पैदा कर दी है। लोग पूछ रहे हैं कि नकवी कौन सी रेडलाइन की बात कर रहे हैं। क्या आसिम मुनीर तख्तापलट करना चाहते है? क्या रेडलाइन उन्हें ऐसा करने से रोक रही है।

कॉकरोच का जिक्र, व्यवस्था बदलने की बात

अपने बयान में मोहसिन नकवी ने कॉकरोच आंदोलन का जिक्र किया और कहा, ‘वे (युवा) सिर्फ एक चीज मांगते हैं कि अपना निजाम ठीक कर लें। हमें इंसाफ और मेरिट मिल जाए। नौकरी मिले। सबकुछ जायज तरीके से मिले। नौजवान जो चाहते हैं, वह हम नहीं दे पा रहे हैं। अब उन्हें नौजवान कहें या कॉकरोच कहें, लेकिन एक चीज मैं सबको बताऊंगा कि ये कॉकरोच अगर इकट्ठा हो गया तो ये हर चीज को उलट सकते हैं। इसके लिए जरूरी यह है कि वह जो मांगें, उसे दिया जाए।’

क्या ढह गया पाकिस्तान की सिस्टम?

मोहसिन नकवी के बयान का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह था कि उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की व्यवस्था ढह गई है। ‘जिस सिस्टम में हम जी रहे हैं, वह ढह गया है। आप मानें या न मानें। इसे 70 वर्षों से घसीटते आ रहे हैं।’

 

पाकिस्तान में अब जनता उनके बयान के पीछे की मंशा पर शक जता रही है। लोगों का सवाल है कि आसिम मुनीर के बेहद खास मोहसिन नकवी अचानक व्यवस्था ढह जाने की बात क्यों करने लगे हैं, क्या सेना के स्तर पर कुछ बड़ी प्लानिंग चल रही है, क्या उससे पहले मोहसिन नकवी दिमागी तौर पर जनता को तैयार करने में जुटे हैं।

 

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लोकतंत्र की तारीफ और बुराई भी

मोहसिन नकवी ने आगे व्यवस्था बदलने तक की बात कही। उन्होंने कहा, ‘लोकतंत्र हम सब चाहते हैं। मैं उसका सबसे बड़ा समर्थक हूं और रहूंगा, लेकिन लोकतंत्र के अंदर ही चार-पांच तरह के निजाम है। मगर हम कहते हैं नहीं, जो मर्जी हो जाए, हमने इसी को घसीटना और चलाना है।’ 

 

मोहसिन नकवी के बयान से उन आशंकाओं को बल मिलता है, जिनमें दावा किया जा रहा है कि सेना सत्ता पर काबिज होना चाहती है, क्योंकि नकवी एक तरफ खुद को लोकतंत्र का पहरेदार बताने में जुटे हैं, जबकि दूसरी तरफ इस व्यवस्था की खामियां भी गिनाने में जुटे हैं। 

आसिम मुनीर को राष्ट्रपति बनाने का प्लान!

पाकिस्तान के पत्रकार अफताब इकबाल ने मोहसिन नकवी के बयान पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यह एक ध्यान भटकना है। अगर सदारती निजाम (अध्यक्षीय शासन प्रणाली) ही लाना है। फील्ड मार्शल को पाकिस्तान का राष्ट्रपति बनाना है, उसे चुनाव जितवाना है, सूबों का आकार छोटा करना है तो यह घी तो सीधी अंगुली से भी निकल सकता है। इस पर आपको इतनी हिंसा क्यों थोपनी पड़ी? असल बात कुछ और है। वह है, पूरी तरह से नियंत्रण। 

आयूब, मुशर्रफ की राह पर मुनीर

अफताब इकबाल ने आयूब खान का उदाहरण दिया और कहा कि 1958 में उसने भी पूरा कंट्रोल करने के बाद ही पहला मार्शल लॉ लगाया था। वे आगे कहते हैं कि जियाउल हक ने भी पहले पावर को कंट्रोल किया। उसके जकड़ में मुकम्मल सबकुछ आ गया तो तब उसने इस्लामी निजाम का ढकोसला देकर 11 साल तक शासन किया। परवेज मुशर्रफ ने भी निजाम को अजगर की तरह जकड़ने के बाद सफर का आगाज किया था। 

 

अफताब इकबाल का कहना है कि आयूब खान और आज का दौर बिल्कुल अलग है। अगर आज आसिम मुनीर से कहा जाए कि आप अपनी कमान किसी और दे दें। फील्ड मार्शल बने, इलेक्शन जीते और इलेक्शन जीतना आपके बाएं हाथ का खेल है। आप आम चुनाव जीत चुके हैं तो रिफरेंडम और सदारती इलेक्शन जीतना का मसला ही कोई नहीं है। आप चाहे तो यह काम कर सकते हैं।

किसकी स्क्रिप्ट पर काम कर रहे आसिम मुनीर?

अफताब इकबाल आगे कहते हैं कि आसिम मुनीर कमान किसी और के हाथ में देने की कल्पना ही नहीं कर सकते। वह तो थोड़ी-बहुत बची कमान को भी काबू करने की कोशिश में है, क्योंकि हालात और वक्त ऐसा है कि किसी पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। अगर वे इलेक्शन जीत भी गए तो कौन भरोसा करेगा। फॉर्म 47 के रिजल्ट कोई मानेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि आसिम मुनीर आयूब खान और जियाउल हक की स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हैं। मगर अबकी बार के हालात पहले से अलग हैं।