चेहरे पर ब्यूटी फिलर्स का तड़का, कुदरती खूबसूरती के लिए कितना बड़ा खतरा?

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आजकल सोशल मीडिया पर हर कोई ‘परफेक्ट’ दिखना चाहता है। इसी चाहत ने भारत सहित पूरी दुनिया में ‘ब्यूटी फिलर्स’ के चलन को एक महामारी की तरह फैला दिया है। चेहरे की झुर्रियां मिटानी हों या होंठों को नया आकार देना हो, लोग अब घंटों मेकअप करने के बजाय 15 मिनट के इंजेक्शन को ज्यादा आसान मान रहे हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि आत्मविश्वास बढ़ाने के नाम पर चेहरे पर लगाया जा रहा यह ‘खूबसूरती का तड़का’ आपकी असली पहचान और सेहत को हमेशा के लिए बिगाड़ सकता है?

 

भारत में पहले इस तरह की कॉस्मेटिक सर्जरी सिर्फ बॉलीवुड के बड़े सितारों तक सीमित थी। लेकिन 2015 के बाद जब इंस्टाग्राम और स्नैपचैट जैसे ऐप्स ने ‘फिल्टर्स’ का जादू चलाया, तो आम जनता में भी वैसा ही दिखने की होड़ मच गई।

 

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अमेरिकन सोसाइटी ऑफ प्लास्टिक सर्जन्स (ASPS) की एक ताजा रिपोर्ट बताती है कि दुनिया भर में फिलर्स करवाने वालों की संख्या में 200% की भारी बढ़ोतरी हुई है। भारत के बड़े शहरों से लेकर छोटे शहरों में भी ‘लिप जॉब’ और ‘जॉलाइन शेपिंग’ एक स्टेटस सिंबल बन गया है। शादियों के सीजन में तो ‘इंस्टेंट ब्यूटी’ पाने के लिए युवा लड़के-लड़कियां बड़ी संख्या में क्लिनिक पहुंच रहे हैं। 

एक्सपर्ट्स के चौंकाने वाले खुलासे

इस चमक-धमक के पीछे के सच को लेकर बड़े डॉक्टरों ने कई चौंकाने रिपोटर्स दी हैं। ऑस्ट्रेलिया के प्रसिद्ध कॉस्मेटिक डॉक्टर गेविन चान ने एमआरआई (MRI) स्कैन के जरिए यह साबित किया है कि ब्यूटी फिलर्स कभी भी पूरी तरह खत्म नहीं होते। लोग अक्सर सोचते हैं कि 6-12 महीने में इसका असर खत्म हो जाएगा लेकिन असल में ये केमिकल चेहरे के अंदर ही पड़े रहते हैं और धीरे-धीरे अपनी जगह से खिसक कर चेहरे के दूसरे हिस्सों में चले जाते हैं।

 

वहीं, इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ एस्थेटिक प्लास्टिक सर्जरी (ISAPS)की रिपोर्ट के अनुसार, 20 से 25 साल के युवा अब अपनी उम्र से कहीं बड़े और ‘प्लास्टिक’ जैसे दिखने लगे हैं। अपने चेहरे की कुदरती मासूमियत को इंजेक्शन से बदल रहे हैं। 

क्या हैं इसके साइड इफेक्ट्स?

सुदंरता की यह चाहत शरीर के लिए जानलेवा भी हो सकती है। मेडिकल जर्नल ‘द लैंसेट’ और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इसके कई खतरनाक नतीजे के बारे में बताया है।

 

 

नसों का ब्लॉक होना: अगर इंजेक्शन गलती से किसी मुख्य चेहरे में लग गया, तो वहां खून का बहाव रुक जाता है। जिससे उस हिस्से की त्वचा गल के सड़ सकती है और आंखों के पास गड़बड़ी होने पर इंसान हमेशा के लिए अंधा भी हो सकता है।

 

पिलो फेस: ज्यादा फिलर्स के इस्तेमाल से चेहरा भारी और सूज जाता है कि वह स्वाभाविक नहीं बल्कि तकिये जैसा फूला हुआ दिखने लगता है।

 

गांठें और इन्फेक्शन: शरीर अक्सर इन बाहरी रसायनों का विरोध करता है, जिससे चेहरे पर सख्त और दर्दनाक गांठें बन जाती हैं, जिन्हें निकालना बेहद मुश्किल होता है।

 

चेहरे का खिसकना: फिलर्स अक्सर अपनी जगह छोड़कर नीचे की तरफ लटकने लगते हैं, जिससे चेहरा अजीब और टेढ़ा नजर आने लगता है।

 

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नेचुरल ब्यूटी की वापसी

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि फिलर्स के इस बढ़ते चलन ने समाज में ‘स्नैपचैट डिस्मॉर्फिया’ को जन्म दिया है। यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है जहां व्यक्ति को अपना असली चेहरा आईने में बुरा लगने लगता है। इसी वजह से आज कायली जेनर और कोर्टनी कार्दशियन जैसी ग्लोबल हस्तियां जिन्होंने इस ट्रेंड को मशहूर किया था।

 

अब वे अपने फिलर्स को हटवा रही हैं और मानती हैं कि जो सुकून और सूबसूरती नेचुरल लुक में है, वह किसी सुई में नहीं। हॉलीवुड के नामी सर्जन डॉ.राज कनोडिया का भी यही मानना है कि असली सुंदरता आपके स्वस्थ शरीर और आत्मविश्वास से आती है, न की फिलर्स के तड़के से।

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