महाकाल की भस्म आरती के समय महिलाओं को क्यों करना पड़ता है घूंघट? जानें वजह

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उज्जैन में महाकाल की भस्म आरती दुनिया भर में मान्यता प्राप्त है। महाशिवरात्रि हो या सावन का महीना साल के प्रत्येक दिन महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती होती है। यह परंपरा कभी नहीं टूटती लेकिन क्या आपको पता है भस्म आरती के दौरान एक समय ऐसा आता है जब महिलाओं को अपने चेहरे पर घूंघट करना पड़ता है।  आइए जानते हैं कि ऐसा क्यों किया जाता है। 

 

दरअसल, आरती के एक विशेष चरण में भगवान शिव का ‘शृंगार’ उतार दिया जाता है और उन्हें ताजी भस्म अर्पित की जाती है। इस समय महादेव अपने दिगंबर स्वरूप में होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, महिलाओं के लिए भगवान के इस रूप के दर्शन करना वर्जित माना जाता है। 

 

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क्या है इसके पीछे की मान्यता?

महिलाओं को भगवान के दिगंबर रूप के दर्शन के अलावा एक और मान्यता है। एक अन्य तर्क यह भी है कि भस्म आरती एक तांत्रिक क्रिया है। इसमें श्मशान की भस्म का उपयोग होता है और कड़े नियमों का पालन किया जाता है। 

माना जाता है कि इस ऊर्जावान प्रक्रिया के दौरान कुछ विशेष क्षणों में केवल पुरुष पंडित ही पूजा संपन्न करते हैं और स्त्री शक्ति की सौम्यता को बनाए रखने के लिए उन्हें उस समय सीधे दर्शन से रोका जाता है।

 

भस्म आरती में घूंघट और ड्रेस कोड

महादेव का दिगंबर स्वरूप

भस्म चढ़ाने से पूर्व भगवान शिव के शरीर से सभी वस्त्र और आभूषण हटा दिए जाते हैं। ‘दिगंबर’ का अर्थ है जिसकी दिशाएं ही वस्त्र हों। भारतीय संस्कृति और वैराग्य के नियमों के अनुसार, भगवान के इस अत्यंत वैराग्यपूर्ण और निरावरण स्वरूप को देखना महिलाओं के लिए उचित नहीं माना जाता।

तांत्रिक अनुष्ठान की मर्यादा

भस्म आरती कोई सामान्य आरती नहीं बल्कि एक कठिन अनुष्ठान है। इस दौरान जो मंत्रोच्चार और भस्म अर्पण की विधि होती है, वह अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली होती है। घूंघट करना उस आध्यात्मिक ऊर्जा और मर्यादा के प्रति सम्मान प्रकट करने का एक तरीका है।

 

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परंपरागत वेशभूषा का नियम

केवल घूंघट ही नहीं बल्कि भस्म आरती में शामिल होने के लिए महिलाओं और पुरुषों के लिए विशिष्ट ड्रेस कोड भी अनिवार्य है- 

 

महिलाओं के लिए: केवल साड़ी पहनकर ही गर्भगृह या नंदी हॉल में बैठने की अनुमति होती है।

पुरुषों के लिए: पुरुषों को केवल सूती धोती पहननी पड़ती है, सिली हुई शर्ट या पैंट वर्जित है।

 

नोट: इस खबर में लिखी गई बातें धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।

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