हाथ भी जलेगा, घर भी…, ईरान में सेना भेजने से डर क्यों रहे ट्रंप? इनसाइड स्टोरी

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इजरायल, अमेरिका और ईरान की जंग के 18 दिन बीत चुके हैं। पश्चिम एशिया में भीषण तबाही मची है। सऊदी अरब, दुबई, कतर, बहरीन और साइप्रस जैसे देशों पर ईरान ने अमेरिकी ठिकानों पर इतने हमले किए हैं कि वहां अमेरिकी सैन्य बेस, अपने सबसे बुरे दौर में पहुंच गए हैं। जंग के नतीजे कुछ ऐसे हैं कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, अपने घर में ही घिर गए हैं। अमेरिका के नेशनल काउंटरटेररिज्म सेंटर (NCTC) के प्रमुख जोसेफ केंट ने जंग की विभीषिका को देखते हुए पहले ही इस्तीफा दे दिया है। 

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप से नाराजगी की कई वाजिब वजहें भी हैं। जून 2025 में जब अमेरिका ने ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों पर हवाई हमले किए थे, तब उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने दावा किया था कि वह ईरान के साथ लंबे संघर्ष में नहीं जाना जाना चाहते। उन्होंने कहा था कि वह ईरानी जमीनी पर अपने सैनिक नहीं भेजना चाहते हैं। अब पल-पल हालात बदल रहे हैं। 

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जमीनी हमले की चर्चा क्यों?

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने जून 2025 में कहा था, ‘हम किसी लंबे संघर्ष में नहीं जाना चाहते। हमें जमीन पर सैनिक भेजने में कोई दिलचस्पी नहीं है।’

अब जंग के हालात बदल रहे हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, अब जमीन पर सैनिकों को भेजने की संभावना से इनकार नहीं कर रहे हैं। जंग के शुरुआती हमलों में ही डोनाल्ड ट्रंप को एहसास हो गया है कि वह यह जंग, आसानी से जीत नहीं रहे हैं। अब कुछ रणनीतिक वजहों से छोटे स्तर पर सैन्य कार्रवाई करना एक विकल्प बन रहा है।

अमेरिकी लोग ईरान में सैन्य कार्रवाई पर क्या सोचते हैं?

CNN ने हाल ही में एक सर्वे कराया था। अमेरिकी, जमीनी स्तर पर ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के  पक्षधर हैं या नहीं। 60 फीसदी लोगों ने विरोध किया। 12 फीसदी लोगों ने हां में जवाब दिया। क्विनिपियक यूनिवर्सिटी के पोल में यह आंकड़ा और भी ज्यादा है मिला। 74 फीसदी लोगों ने विरोध किया, 20 फीसदी लोगों ने समर्थन में वोट दिया। रिपब्लिकन वोटर्स भी नहीं चाहते हैं कि यह जंग आगे बढ़े। CNN पोल में सिर्फ 27 फीसदी रिपब्लिकन्स ने जंग का समर्थन किया, वहीं क्विनिपियक में 37 फीसदी लोगों ने हां में जवाब दिया।

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ईरानियों का एक समूह, लोकतंत्र की मांग कर रहा है। Photo Credit: PTI

ट्रंप प्रशासन अब क्या कह रहा है?

डोनाल्ड ट्रंप ने न्यूयॉर्क पोस्ट के साथ हुई बातचीत में यह कहा था कि जमीनी स्तर पर सेना की जरूरत नहीं पड़ेगी। अब वह सेना को सुरक्षित विकल्प के तौर पर देख रहे हैं। जब ग्राउंड ऑपरेशन से जुड़े सवाल उनसे पूछे जा रहे हैं तो वह खीझ जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत माइक वाल्ट्ज ने फॉक्स न्यूज के साथ एक इंटरव्यू में दावा किया, ‘यह साल 2003 के इराक युद्ध जैसा नहीं होगा। कोई लाखों सैनिक शहरों में कब्जा नहीं करेंगे। सेना, ट्रंप को हर तरह के ऑप्शन्स दे रही है और सैनिक तैयार हैं।’

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अमेरिकी सेना। Photo Credit: US Army

जमीनी कार्रवाई की बात क्यों हो रही है?

ईरान, अमेरिका और ईरान की जंग अब सिर्फ हवाई हमलों पर सीमित नहीं है। अगर ईरान के परमाणु कार्यक्रमों को रोकना है, न्यूक्लियर मेटल को जब्त करना है तो बिना जमीन पर गए बात नहीं बनेगी। खार्ग आइलैंड पर कब्जा करना हो या होर्मुज स्ट्रेट पर सीधा कंट्रोल चाहिए तो ईरान में सेना भेजनी ही होगी। अगर ईरान से संवर्धित यूरेनियम हासिल करना है तो ज्यादा सैनिकों की जरूरत पड़ेगी।  

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अमेरिकी सेना। Photo Credit: US Army

अमेरिकी सैन्य गतिविधियों का हाल क्या है?

अमेरिका ने मरीन एक्सपीडिशनरी यूनिट को पश्चिम एशिया के देशों में भेजा है। इस टुकड़ी में करीब ग 2,500 मरीन्स और नेवी के जवान हैं। अमेरिका के ‘USS ट्रिपोली’ जैसे जहाज सिंगापुर के पास देखे गए हैं। यह तेजी से खाड़ी के देशों की तरफ आ रहे हैं। क्यों आ रहे हैं, अमेरिका ने यह अभी तक साफ नहीं किया है। अचानक इतनी बड़ी संख्या आने की सबसे बड़ी वजह, जंग ही हो सकती है। 

अमेरिकी सेना। Photo Credit: US Army

ट्रंप की सनक से उनके अपने ही परेशान हैं

डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक और अमेरिकी संसद में रिपबल्किन के साथी भी जमीनी कार्रवाई के खिलाफ हैं। रिक स्कॉट, टिम बर्चेट, जोश हॉली और नैन्सी मेस जैसे लोग, इस तरह की कार्रवाई से बचने के लिए कह रहे हैं। सीनेटर जॉन केनेडी जैसे नेताओं ने भी ट्रंप को हिदायत दी है कि ऐसे कार्यक्रमों से अमेरिका को ही नुकसान पहुंचेगा। 

कई दक्षिणपंथी इन्फ्लुएंसर्स ने भी सरकार को चेताया है कि अगर ट्रंप ऐसा ही करते रहे तो उनका गठबंधन टूट सकता है। यह युद्ध अगर जमीनी स्तर पर लड़ा गया तो अमेरिका में राजनीतिक संकट के भी हालात पैदा हो सकते हैं। लोग लंबे युद्ध और सैनिकों की शहादत से डर रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप, जनता की राय के उलट फैसले लेते हैं। इस बार वह बुरी तरह फंसते नजर आ रहे हैं। 

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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। Photo Credit: PTI

ईरान में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई, घाटे का सौदा क्यों?

ईरान, इराक जितना छोटा देश नहीं है। जग्रोस से लेकर अल्बोर्ज पर्वत श्रृंखलाएं, ईरान के लिए अभेद्य किले की तरह काम करती हैं। न तो यहां अमेरिकी टैंक पहुंच पाएंगे, न ही अमेरिकी सेना, सीधे घुसपैठ कर पाएगी। ईरान न समंदर से, न आसमान से अमेरिकी जहाजों को उतरने दे सकता है। ईरान ने अपनी सेना का इतने हिस्सों में विघटन किया है कि कई देश अगर संयुक्त रूप से भी भिड़ें तो हर मोर्चे पर एक अलग तरह की सैन्य प्रणाली काम कर रही है। 

अगर सेंट्रल कमांड से भी न संपर्क हो तो ईरान की स्वायत्त सेनाएं, भिड़ती रहेंगी। ईरान छापेमार युद्ध के लिए जाना जाता है, जिसमें अमेरिकी सैनिकों को न के बराबर अनुभव है। 18 दिनों की जंग के बाद भी ईरान के पास मिसाइलों और ड्रोन का विशाल भंडार है। अमेरिका के करोड़ों रुपये वाले ड्रोन्स को ईरान कुछ हजार में बनने वाले ड्रोन से चुनौती दे रहा है। ईरान का ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ पर सीधा कंट्रेल है। अमेरिका की दाल यहां चाहकर भी नहीं गल रही है। सेना आने का सवाल ही नहीं बनता है। 

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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ईरान के नियंत्रण को चुनौती नहीं दे पा रही है इजरायल और अमेरिकी सेनाएं। Photo Credit: PTI

ईरान पहले ही होर्मुज बंद करके अमेरिका के मित्र देशों में तेल और गैस की सप्लाई ठप कर रहा है। अगर यह जंग ऐसे ही चली तो दुनिया में मंदी भी छा सकती है। जाहिर सी बात है कि अमेरिका पर दबाव बढ़ेगा। अमेरिका को जमीनी लड़ाई में कामयाबी मिलने से रही। लेबनॉन, यमन और इराक में मौजूद हिजबुल्लाह और हूती जैसे संगठन, कई मोर्चे पर जंग छेड़ सकते हैं। डोनाल्ड ट्रंप को इसका अहसास है, इसी वजह से वह जमीनी ऑपरेशन से भी कतरा रहे हैं। 

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