क्या है भगवान जगन्नाथ की महास्नान परंपरा? देव स्नान पूर्णिमा के बारे में जानिए

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हिंदू पंचांग के अनुसार आज ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा है। इस दिन ओडिशा में बेहद अनोखे तरीके से ज्येष्ठ पूर्णिमा मनाई जाती है, जहां पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भगवान के महास्नान यात्रा की परंपरा निभाई जाती है। इसे ओडिशा में देव स्नान पूर्णिमा कहा जाता है। पुरी का महास्नान देखने के लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ओडिशा पहुंचे। लाखों लोग भगवान के दर्शन के लिए जगन्नाथ मंदिर पहुंचे। देव स्नान पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ के अलावा उनके भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा का भी स्नान कराया जाता है। साथ ही आज के दिन कई भक्त यात्रा के दौरान ढोल-नगाड़े बजाकर देव स्नान का उत्सव मना रहे हैं।


इस साल स्नान यात्रा की शुरुआत सुबह 5 बजकर 15 मिनट से हुई थी। यह यात्रा देवी-देवताओं की पारंपरिक पाहंडी यानी शोभायात्रा के साथ शुरू हुई, जिसके बाद सुबह 8 बजे तक यात्रा संपन्न हो गई। यात्रा के दौरान धर्मेंद्र प्रधान भी मौजूद थे। स्कंद पुराण के मुताबिक देव स्नान की परंपरा 12वीं शताब्दी में राजा इंद्रद्युम्न ने शुरू की थी। तभी से हर साल ज्येष्ठ महीने में देव स्नान की परंपरा चली आ रही है।

 

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108 कलशों से कराया जाता है स्नान

ज्येष्ठ पूर्णिमा पर 108 कलशों में जल भरकर भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा का स्नान कराया जाता है। इसमें 35 कलशों के जल से भगवान जगन्नाथ का स्नान कराया जाता है, जबकि 33 कलशों के जल से भगवान बलभद्र का स्नान कराया जाता है। इसके अलावा देवी सुभद्रा को 22 कलशों के जल से स्नान कराया जाता है। इसके बाद बचे हुए 18 कलशों के जल से सुदर्शन चक्र का स्नान कराया जाता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक जो भक्त महास्नान यात्रा में शामिल होता है, वह रोग और दुख से मुक्ति पाता है।


महास्नान के बाद देवी-देवताओं का एक खास प्रकार का श्रृंगार किया जाता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को गज वेश में सजाया जाता है। इसके बाद भक्त देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। महास्नान के बाद जगन्नाथ मंदिर का गर्भगृह बंद कर दिया जाता है, जिस दौरान कोई भी भक्त भगवान के दर्शन नहीं कर सकता।

 

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महास्नान के बाद क्यों बंद होता है गर्भगृह?

सनातन धार्मिक मान्यता के मुताबिक महास्नान के बाद भगवान जगन्नाथ की तबीयत खराब हो जाती है। इसलिए भगवान को आराम कराने के लिए गर्भगृह बंद कर दिया जाता है। इस दौरान कोई भी भक्त भगवान के दर्शन नहीं कर सकता। करीब दो सप्ताह बाद गर्भगृह के द्वार दोबारा खोले जाते हैं।

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