
इंडोनेशिया और भारत के बीच एक बड़ी रक्षा डील हुई है। डील के तहत इंडोनेशिया अब भारत से ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल और अस्त्र मिसाइल खरीदेगा। ऑपरेशन सिंदूर के पहले फिलीपींस ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने वाला इकलौता देश था, लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद ब्रह्मोस मिसाइल की लोकप्रियता में इजाफा हुआ है।
हाल ही में सयुंक्त अरब अमीरात, ग्रीस, साइप्रस, वियतनाम और आर्मेनिया ने ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है। पिछले साल पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में स्थित आतंकी ठिकानों पर सटीक हमलों के बाद दुनिया ने ब्रह्मोस का लोहा माना है।
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हालांकि इंडोनेशिया के साथ हुई डील में ब्रह्मोस से बड़ा सौदा अस्त्र मिसाइल का माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अस्त्र मिसाइल डील दुनियाभर में भारतीय हथियारों को स्थापित करने का सबसे बड़ा अवसर बनेगा। ऑपरेशन सिंदूर में अस्र मिसाइल की सटीक मारक क्षमता ने दुनिया का ध्यान खींचा। ऐसे में आइये समझते हैं कि अस्त्र मिसाइल डील को ब्रह्मोस से बड़ा क्यों माना जा रहा है?
इंडोनेशिया की डील से खुलेगी और राह
दरअसल, अस्त्र भारत की अपनी स्वदेशी तकनीक से बनी ‘बियॉन्ड विजुअल रेंज’ मिसाइल है। इंडोनेशिया इस मिसाइल को खरीदने वाला पहला देश है। इंडोनेशिया कोई छोटा-मोटा देश नहीं है। यह दुनिया का सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला मुल्क है। अगर इतने बड़े देश ने अस्त्र मिसाइल पर भरोसा जताया है तो जरूर इसके पीछे मिसाइल की कामयाबी बड़ी वजह होगी। माना जा रहा है कि इंडोनेशिया के इस कदम के बाद चीन की दादागिरी से परेशान अन्य देश भी न केवल ब्रह्मोस बल्कि अस्त्र मिसाइल पर दिलचस्पी दिखा सकते हैं।
भारत के हथियारों पर बढ़ेगा भरोसा
अस्त्र मिसाइल की रेंज 100 किमी से ज्यादा है। इसे डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) ने तैयार किया है। स्वदेशी तकनीक पर बनी यह भारत की अपनी मिसाइल है, जबकि ब्रह्मोस मिसाइल पूरी तरह से स्वदेशी नहीं है। इसे रूस के सहयोग से बनाया गया है। ब्रह्मोस मिसाइल को डीआरडीओ और रूस के गैर-लाभकारी संगठन मशीनोस्ट्रोयेनिया के संयुक्त उद्यम ब्रह्मोस एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड ने डिजाइन, विकसित और निर्मित किया है।
इस मिसाइल को बेचने में रूस की भी भूमिका होती है। रूस की सहमति के बाद ही किसी अन्य देशों को बेची जाती है, जबकि अस्त्र मिसाइल मेड इन इंडिया है। इसे किसे बेचना है, कितनी संख्या में बेचना है… यह सब तय करने का अधिकार भारत के पास है।
भारत के लिए अस्त्र डील इतनी अहम क्यों?
खास बात यह है कि भारत पहली बार अपनी स्वदेशी तकनीक से बनी किसी मिसाइल को अन्य देश को बेचेगा। यह सिर्फ एक डील नहीं है। यह भारत के रक्षा निर्यात के क्षेत्र में हुई सबसे बड़ी घटनाओं में से एक है। ठीक वैसे ही जैसे भारत ने आर्मेनिया को अपना स्वदेशी आकाश एयर डिफेंस सिस्टम बेचा था। आज संयुक्त अरब अमीरात समेत कई देश आकाश एयर डिफेंस सिस्टम खरीदना चाहते हैं।
अगर इंडोनेशिया में अस्त्र मिसाइल अपना जलवा दिखाती है तो भारतीय हथियारों के प्रति न केवल इंडोनेशिया, बल्कि दुनियाभर में दिलचस्पी बढे़गी, क्योंकि जिस कीमत में भारत उन्नत तकनीक वाले रक्षा साजोसामान उपलब्ध करा सकता है, उसी कीमत पर अमेरिका समेत पश्चिम देशों के लिए उपलब्ध कराना लगभग नामुकिन है।
किन विमानों में अस्त्र विमान तैनात करेगा इंडोनेशिया?
इंडोनेशिया की वायुसेना के पास सुखोई-30 और सुखोई-27 जैसे रूसी फाइटर जेट हैं। अस्त्र मिसाइल को इन्हीं विमानों में लगाया जाएगा। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने सुखाई-30 विमान पर ही अस्त्र मिसाइल को लगाया था। ऐसे में इंडोनेशियाई एयरफोर्स के लिए इन मिसाइलों को अपने विमानों के साथ इंटीग्रेटे करने में भी दिक्कत नहीं आएगी, क्योंकि भारत ने पहले से ही इन्हीं प्लेटफॉर्म के लिहाज से मिसाइल को तैयार की है।
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इंडोनेशिया ने अस्त्र मिसाइल में क्यों दिखाई दिलचस्पी?
अस्त्र मिसाइल की रेंज 80-110 किमी है। 20 किमी तक ऊंचाई में उड़ सकती है। मैक 4.5 की अधिकतम गति से यह मिसाइल महज 100 से 120 सेकंड में दुश्मन के विमान पर हमला करती है। पिछले साल पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर में अस्त्र मिसाइल ने घातक हमलों को अंजाम दिया था। इसी प्रदर्शन ने इंडोनेशिया को इसे खरीदने पर मजबूर किया।
दुनिया में बढ़ रहा ब्रह्मोस का दायरा
दक्षिणपूर्व एशिया में ब्रह्मोस मिसाइल अपनी मजबूत पकड़ बनाते जा रही है। सबसे पहले साल 2022 में फिलीपींस ने 375 मिलियन डॉलर में ब्रह्मोस मिसाइलें की खरीद की। उसके बाद वियतनाम और भारत के बीच 629 मिलियन डॉलर की समझौता अंतिम चरण में है। अब इंडोनेशिया ब्रह्मोस खरीदने वाला तीसरा देश बना है। उधर, संयुक्त अरब अमीरात और भारत के बीच बातचीत चल रही है। खबरों के मुताबिक यूएई ने ब्रह्मोस मिसाइल और आकाश एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने पर दिलचस्पी दिखाई है।