सावन का हर दिन सोमवार जितना ही क्यों पवित्र है? समझिए क्या होता है ‘शिव वास’

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सनातन धर्म में सावन महीने को शिवभक्ति के लिए सबसे विशेष महीना माना जाता है। इस महीने लाखों भक्त न सिर्फ भगवान शिव की आराधना करते हैं, बल्कि सोमवार के दिन व्रत भी रखते हैं। कई लोगों का मानना है कि सावन के चार सोमवार बेहद खास होते हैं, जिस दिन भगवान शिव अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाते हैं। जबकि धार्मिक मान्यता के मुताबिक, सावन महीने का हर दिन बेहद खास और पवित्र होता है।

 

धार्मिक मान्यता के अनुसार, सावन महीने में भगवान शिव से जुड़ी ऐसी घटनाएं हुई थीं, जो इस महीने को बेहद विशेष और पवित्र बनाती हैं। इसी वजह से एक तरफ कई भक्त भगवान शिव की पूजा करते हैं, तो वहीं कई लोग महामृत्युंजय जाप, रुद्राभिषेक और कीर्तन भी करते हैं। अब सवाल उठता है कि सावन महीने का हर दिन अपने आप में खास और पवित्र क्यों है? साथ ही यह भी सवाल उठता है कि शिव वास क्या होता है?

 

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सावन महीने का हर दिन क्यों है पवित्र

 

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन महीने में भगवान शिव की कृपा सिर्फ सोमवार तक सीमित नहीं रहती। इस महीने भगवान शिव पृथ्वी लोक में निवास करते हैं, इसलिए इस महीने का हर दिन पवित्र माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी महीने भगवान शिव अपने ससुराल हरिद्वार आते हैं। जब भगवान शिव पृथ्वी लोक में रहते हैं, तब वे हर दिन अपने भक्तों पर कृपा बरसाते हैं। इसी वजह से सिर्फ सोमवार ही नहीं, बल्कि सावन का हर दिन विशेष माना जाता है। इसके अलावा माना जाता है कि सावन का हर सोमवार एक अलग महत्व को दर्शाता है। अब सवाल उठता है कि शिव वास का अर्थ क्या है? आइए जानते हैं।

शिव वास का अर्थ 

 

धार्मिक ग्रंथ शिव पुराण के अनुसार, शिव वास का अर्थ है भगवान शिव का निवास स्थान। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, भगवान शिव हर तिथि पर अलग-अलग स्थानों पर निवास करते हैं। माना जाता है कि इस दौरान भगवान शिव कभी कैलाश पर्वत पर विराजमान होते हैं, तो कभी नंदी भगवान पर सवार होते हैं।

 

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धार्मिक ग्रंथों मुताबिक, भगवान शिव अलग-अलग स्थानों पर निवास करते हैं। इसी आधार पर तय किया जाता है कि कोई तिथि कितनी शुभ है। शिव वास के आधार पर तिथि की गणना की जाती है। अगर गणना में दिन शुभ हो, तो उस दिन रुद्राभिषेक कराना बेहद फलदायी माना जाता है। इसी सिलसिले में नारद जी ने बताया है

 

कैलाशे लभते सौख्यं गौर्या च सुखसम्पदः।
वृषभेऽभीष्ट सिद्धिः सभायां संतापकारिणी।।
भोजने च भवेत् पीड़ा क्रीडायां कष्टमेव च।
श्मशाने मरणं ज्ञेयं फलमेवं विचारयेत्।।

 

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इस श्लोक का अर्थ है कि अगर भगवान शिव कैलाश पर्वत पर विराजमान हों, तो धार्मिक अनुष्ठान कराने से सुख-समृद्धि मिलती है। जब भगवान शिव माता गौरी के साथ विराजमान रहते हैं, तब धार्मिक कार्य करने पर संपत्ति और वैभव की प्राप्ति होती है। जब शिवजी नंदी भगवान पर सवार होते हैं, तब भक्तों को सिद्धि प्राप्त होती है। अगर भगवान शिव भोजन कर रहे हों, तब आराधना करना पीड़ादायक माना जाता है। वहीं जब शिवजी श्मशान में विराजमान हों, तब उस समय आराधना करना कष्टदायी माना गया है।

 

नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और गणनाओं पर आधारित है। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।

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