Chhath Puja at Sitadwar Lake | सीताद्वार झील पर छठ पूजा: व्रतियों ने डूबते सूरज को दिया अर्घ्य, सुरक्षा के रहे पुख्ता इंतजाम – Ikauna News

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राज कुमार | इकौना3 मिनट पहले

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श्रावस्ती के लव-कुश की जन्मस्थली माने जाने वाले सीताद्वार झील पर सोमवार को छठ पूजा विधि-विधान के साथ संपन्न हुई। इस दौरान व्रती महिलाओं और पुरुषों ने पानी में खड़े होकर सूर्य भगवान को अर्घ्य अर्पित किया। लोक आस्था का यह पर्व क्षेत्र में पूरे उत्साह और श्रद्धाभाव के साथ मनाया गया।पूजा के लिए इकौना क्षेत्र के ग्रामीणों और नगरवासियों की भारी भीड़ उमड़ी। महिलाओं ने स्नान-पूजन के बाद ‘छठ मैया की जय’ के जयकारों के साथ प्रसाद चढ़ाया और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। घाटों पर प्रकाश व्यवस्था और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे।सीताद्वार झील में छठ पूजा की पौराणिक मान्यताएँ श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय रहीं। श्रद्धालु साक्षी वैश्य ने बताया कि जनमान्यता के अनुसार, माता सीता ने वनवास से लौटने के बाद रावण वध के पाप से मुक्ति और राम राज्य की स्थापना हेतु छठ का व्रत रखा था। वहीं, एक अन्य कथा के अनुसार, महाभारत काल में पांडवों के राजपाट हारने पर द्रौपदी ने छठ व्रत कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की थी, जिसके बाद उनकी मनोकामना पूर्ण हुई और पांडवों को पुनः राजपाट प्राप्त हुआ।छात्रा साक्षी ने यह भी बताया कि सूर्यपुत्र कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे और घंटों पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। इसी परंपरा के कारण आज भी छठ पूजा में जल में खड़े होकर अर्घ्य अर्पित करने की परंपरा निभाई जाती है। व्रती रेनू गुप्ता ने बताया कि भगवान श्रीराम और माता सीता जब 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे, तो ऋषि-मुनियों के कहने पर उन्होंने कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्य देव का पूजन कर पाप से मुक्ति की कामना की थी।स्थानीय छात्रा दिव्या ने जानकारी दी कि पूर्वांचल, बिहार और झारखंड में प्रारंभ हुआ यह पर्व अब उत्तर प्रदेश सहित देश के कई राज्यों में आस्था का प्रतीक बन चुका है। मान्यता है कि छठी मैया बच्चों की रक्षा करती हैं और उन्हें उत्तम स्वास्थ्य का आशीर्वाद देती हैं।दिव्या ने छठ पूजा के वैज्ञानिक महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सूर्य के ऊर्जा स्रोत होने के कारण इससे जीवन को हानिकारक प्रभावों से बचाने में सकारात्मक मदद मिलती है।