चना और सरसों की सहफसली खेती – फोटो : सोशल मीडिया
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चना और सरसों दोनों ही रबी मौसम की महत्वपूर्ण फसलें हैं। चना दलहनी फसल होने के कारण मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाता है, जबकि सरसों तिलहनी फसल होने के कारण किसानों को अतिरिक्त आय देती है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि किसान चना और सरसों की सहफसली प्रणाली अपनाएं, तो उन्हें भूमि के बेहतर उपयोग के साथ अधिक उत्पादन और लाभ दोनों मिल सकते हैं।सहफसली प्रणाली में भूमि का अधिकतम उपयोग होता है और दोनों फसलों से औसतन 20-25 प्रतिशत अधिक आय प्राप्त होती है। चना मिट्टी में नाइट्रोजन जोड़ता है जिससे सरसों की वृद्धि बेहतर होती है, जबकि सरसों की गंध से कई कीटों का प्रकोप चने में कम होता है।
सहफसली खेती की वैज्ञानिक विधि
कृषि विज्ञान केंद्र हमीरपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. राजीव कुमार सिंह ने बताया कि किसान तीन या चार कतार चने की बुआई के बाद एक कतार सरसों की बुआई करें। इस व्यवस्था में सरसों को पर्याप्त धूप, हवा और स्थान मिलता है, जिससे उसका विकास तेजी से होता है। चना पौधा अपेक्षाकृत छोटा होता है, जिससे सरसों की वृद्धि पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। परिणामस्वरूप, दोनों फसलें अच्छी उपज देती हैं।
खेत की तैयारी और बुआई की विधि
चना और सरसों की सहफसली बुआई के लिए हल्की से मध्यम दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त रहती है। पहले खेत की गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें, फिर दो बार देशी हल या कल्टीवेटर चलाकर पाटा लगा दें। अगर किसान सीड ड्रिल मशीन का उपयोग करते हैं तो नौ कतार की सीट बेल्ट में पांचवीं कतार में सरसों की बुआई की जा सकती है। इसके लिए मशीन में बीच की कतार के स्थान पर स्टील का डिवाइडर लगाकर एक हिस्से में सरसों का बीज और बाकी हिस्सों में चना बोया जा सकता है।
बीज की मात्रा और बुआई का समय
चना की बुआई 1 से 15 नवम्बर तक की जाती है। छोटे दाने वाली प्रजातियों में 80 किलो और बड़े दाने वाली प्रजातियों में 100 किलो बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त है। सरसों के लिए 4 से 5 किलो बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है। चना की प्रमुख किस्में जेजी-36, आरवीजी-204, जेजी-14, आईपीसी 6-77, राधे हैं, जबकि सरसों की उपयुक्त किस्में पूसा बोल्ड, वरुणा, रोहिनी, सुरेखा, आजाद महक आदि हैं।
खाद और सिंचाई प्रबंधन
दलहनी और तिलहनी फसलों के संयोजन में डीएपी 100 किलो प्रति हेक्टेयर डालना चाहिए। यह नाइट्रोजन और फास्फोरस की जरूरत पूरी करता है। मिट्टी परीक्षण के अनुसार 30 किलो सल्फर भी खेत की तैयारी के समय देना चाहिए। चना और सरसों दोनों सूखा सहनशील फसलें हैं। हल्की मिट्टी में फूल आने से पहले एक सिंचाई लाभकारी होती है। भारी मिट्टी में सामान्य नमी पर्याप्त रहती है।
रोग और कीट प्रबंधन
चना में विल्ट (उकठा रोग) तथा फली छेदक कीट प्रमुख समस्या हैं। इसके लिए ट्राइकोडर्मा पाउडर 5 ग्राम प्रति किलो बीज से बीज शोधन आवश्यक है। सरसों में माहू कीट का प्रकोप होने पर इमिडाक्लोप्रिड का छिड़काव प्रभावी रहता है। किसानों को चाहिए कि दोनों फसलों की निगरानी नियमित रूप से करें और आवश्यकता पड़ने पर फेरोमोन ट्रैप का उपयोग करें।
खरपतवार नियंत्रण और सिंचाई
चना-सरसों की सहफसली खेती में शुरुआती 25-30 दिनों में खरपतवार तेजी से बढ़ते हैं, इसलिए खेत को साफ रखना जरूरी है। बुआई के तुरंत बाद पेंडिमेथालिन 30% ईसी (1 लीटर/हेक्टेयर) का छिड़काव करें ताकि खरपतवार न उगें।





