
गेहूं की खेती
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विस्तार
गेहूं की खेती कर रहे किसानों के लिए ये काम की खबर है। किसानों की मेहनत को आसान और उनकी आय को दोगुना करने की दिशा में कृषि विभाग ने गेहूं की खेती में नई तकनीक का आगाज़ किया है। यह तकनीक न केवल किसानों की लागत और श्रम को घटाएगी, बल्कि पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण की समस्या से भी राहत दिलाएगी। दरअसल, ये तकनीक ‘सीधी बुवाई’ की है। यूपी के कई किसानों द्वारा इस वर्ष गेहूं की ‘सीधी बुवाई’ (लाइन सोइंग) तकनीक अपनाई जा रही है। इस पहल के तहत सरकार किसानों को ‘सुपर सीडर’ और ‘हैप्पी सीडर’ जैसी अत्याधुनिक मशीनों पर भारी सब्सिडी प्रदान कर रही है।‘सुपर सीडर’ तकनीक क्या है?
‘सुपर सीडर’ एक ऐसी आधुनिक मशीन है जिसे ट्रैक्टर से चलाया जाता है। यह मशीन एक ही बार में तीन बड़े कार्य करती है—
- खेत की जुताई,
- धान की पराली को काटकर मिट्टी में मिलाना,
- और साथ ही गेहूं के बीज की बुवाई।
इस प्रक्रिया से खेत तुरंत अगली फसल के लिए तैयार हो जाता है और पराली जलाने की जरूरत समाप्त हो जाती है। किसानों को होंगे ये प्रमुख लाभ….
1. समय और मेहनत की बचत
किसानों को खेत की बार-बार जुताई नहीं करनी पड़ेगी। एक ही बार में बीज बोने और पराली नष्ट करने से श्रम और समय दोनों की बचत होगी।
2. कम लागत, अधिक मुनाफा
इस तकनीक से बीज, खाद और पानी की खपत घट जाती है, जिससे खेती की लागत में करीब 50% तक की कमी आती है।
3. मिट्टी की उर्वरता में सुधार
धान की पराली मिट्टी में दबकर प्राकृतिक खाद का काम करती है। इससे मिट्टी की नमी बनी रहती है और उसकी सेहत बेहतर होती है।
4. प्रदूषण पर नियंत्रण
पराली जलाने की जरूरत खत्म होने से वायु प्रदूषण में भारी कमी आएगी। यह पहल दिल्ली-NCR और पूर्वी उत्तर प्रदेश में वायु गुणवत्ता सुधार की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है।
बंपर उपज की उम्मीद
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सीधी बुवाई तकनीक से गेहूं की पैदावार में 5% तक की बढ़ोतरी संभव है। वहीं बुवाई की लागत करीब आधी रह जाती है। इससे किसानों को शुद्ध मुनाफा बढ़ाने में मदद मिलेगी और वे कम संसाधनों में अधिक उत्पादन कर सकेंगे।
गोरखपुर में प्रयोग, पूरे यूपी में होगा विस्तार
कृषि विभाग ने फिलहाल 800 हेक्टेयर भूमि पर इस तकनीक का प्रदर्शन (डेमो प्लॉट) शुरू किया है, जबकि 11 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में सीधी बुवाई का लक्ष्य रखा गया है। अधिकारियों का कहना है कि यह प्रयोग सफल रहा तो अगले सीजन में इसे पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश में विस्तार दिया जाएगा।
कृषि और पर्यावरण, दोनों को फायदा
कृषि विभाग का यह प्रयास किसानों के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी तो है ही, साथ ही पर्यावरण के लिए भी बेहद उपयोगी साबित होगा। पराली जलाने पर नियंत्रण के साथ यह तकनीक मिट्टी की नमी, जैविक संरचना और जल संरक्षण में भी मददगार है।




