
सरसों की खेती
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जो किसान खेती में कम लागत, कम जोखिम और ज्यादा मुनाफा कमाना चाहने हैं, उनके लिए सरसों की खेती बेहतर विकल्प है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सरसों की खेती न केवल सस्ती है, बल्कि इसे जानवरों से कोई नुकसान नहीं होता और बाजार में इसका भाव भी गेहूं से कहीं अधिक मिलता है।कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, एक बीघा खेत में गेहूं की औसत पैदावार 15 से 17 क्विंटल होती है, जबकि सरसों की पैदावार 8 से 10 क्विंटल तक पहुंच जाती है। सरसों की खासियत यह है कि इसमें केवल एक या दो सिंचाई की जरूरत होती है, जबकि गेहूं की फसल में बार-बार पानी देना पड़ता है। इससे पानी की बचत के साथ खेती की लागत भी घट जाती है।
एक्सपर्ट कहते हैं कि जहां गेहूं की खेती में प्रति बीघा लगभग ₹17,000 का खर्च आता है और आमदनी अधिकतम ₹25,000 तक होती है। इसके मुकाबले सरसों की खेती में सिर्फ ₹10,000 की लागत पर किसान ₹40,000 तक की आय प्राप्त कर सकते हैं, यानी लगभग 6 से 8 गुना मुनाफा। यही कारण है कि विंध्य क्षेत्र समेत राज्य के कई इलाकों में किसान सरसों को लाभकारी विकल्प के रूप में देख रहे हैं।
सरसों की एक और बड़ी खूबी यह है कि इसे नीलगाय या सूअर जैसे छुट्टा जानवर नहीं खाते, जबकि गेहूं और चने की फसलें अक्सर इनसे बर्बाद हो जाती हैं। इसके अलावा सरसों की फसल में न तो बड़ी बीमारियाँ लगती हैं और न ही अधिक खाद या छिड़काव की जरूरत पड़ती है। एक बार की देखभाल से यह फसल पूरी तरह तैयार हो जाती है।
वर्तमान में सरसों का बाजार भाव ₹6,000 से ₹7,000 प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है, जिससे किसानों को बेहतर लाभ मिल रहा है। कम मेहनत और अधिक आमदनी के चलते सरसों अब किसानों की “सोने की फसल” बन गई है।




