इथेनॉल का कमाल : किसानों की जेब में पहुंचे 1.36 लाख करोड़ रुपये, देश ने बचाई 1.55 लाख करोड़ की विदेशी मुद्रा

0
0
बीते एक दशक में इथेनॉल ने किसानों और पर्यावरण को फायदा पहुंचाया।

बीते एक दशक में इथेनॉल ने किसानों और पर्यावरण को फायदा पहुंचाया।
– फोटो : गांव जंक्शन

विस्तार


 

सरकार ने संसद में जैव ईंधन और इथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर बड़े आंकड़े पेश किए हैं। इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम के तहत बीते एक दशक में पर्यावरण को फायदा हुआ है, बल्कि किसानों की आय में भी जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।

सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2014-15 से लेकर अक्तूबर 2025 तक किसानों को 1,36,300 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया गया है। वहीं, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होने से देश को 1,55,000 करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा की बचत हुई है।

किसानों और पर्यावरण को बड़ा फायदा
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि इथेनॉल कार्यक्रम से करीब 260 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल का विकल्प तैयार हुआ है। पर्यावरण के मोर्चे पर भी बड़ी सफलता मिली है, जिससे लगभग 790 लाख मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी आई है।

पीएम जीवन योजना और नए बायोफ्यूल प्रोजेक्ट्स
सरकार ने देश में उन्नत बायोफ्यूल प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा देने के लिए साल 2019 में प्रधानमंत्री जीवन योजना शुरू की थी, जिसे 2024 में संशोधित किया गया है। इसका उद्देश्य कृषि अवशेषों (जैसे पराली) का उपयोग कर बायोफ्यूल बनाना और किसानों को उनकी बेकार फसल के अवशेषों का उचित मूल्य दिलाना है। इस योजना के तहत कई अहम प्रोजेक्ट स्थापित किए गए हैं। हरियाणा के पानीपत में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने धान की पराली पर आधारित कमर्शियल बायो-इथेनॉल प्रोजेक्ट स्थापित किया है, और रिफाइनरी ऑफ-गैस का उपयोग करके एक 3G इथेनॉल प्लांट भी लगाया गया है। असम के नुमालीगढ़ में बांस पर आधारित 2G बायो-रिफाइनरी प्रोजेक्ट स्थापित किया गया है, जो नुमालीगढ़ रिफाइनरी लिमिटेड और असम बायो-इथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड का संयुक्त उद्यम है।

चीनी और मक्का उत्पादन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी
खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग के आंकड़ों के अनुसार, चीनी सीजन 2024-25 में देश में चीनी का उत्पादन घरेलू मांग से ज्यादा रहा है। घरेलू मांग 281 लाख मीट्रिक टन थी, जबकि उपलब्धता 340 लाख मीट्रिक टन रही। इसमें से 34 लाख मीट्रिक टन चीनी को इथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट किया गया, जिससे चीनी के अतिरिक्त भंडार को संतुलित करने और किसानों के गन्ने का बकाया भुगतान समय पर करने में मदद मिली। वहीं मक्का उत्पादन में भी करीब 30 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है, जो 2021-22 के 337.30 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 2024-25 में 443 लाख मीट्रिक टन हो गया है।

फसलों में बदलाव और भविष्य की तैयारी
सरकार किसानों को पानी की अधिक खपत वाली फसलों की जगह इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्का जैसी टिकाऊ फसलों की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। रोडमैप फॉर इथेनॉल ब्लेंडिंग 2020-25 के तहत नई तकनीकों के उपयोग से डिस्टिलरीज अब जीरो लिक्विड डिस्चार्ज यूनिट्स में बदल गई हैं, जिससे प्रदूषण बेहद कम हो गया है। इसके साथ ही सरकार शहरी, औद्योगिक और कृषि कचरे से बायो-सीएनजी (CBG) प्रोजेक्ट्स लगाने को भी बढ़ावा दे रही है, और बायोमास इकट्ठा करने वाली मशीनों की खरीद पर आर्थिक सहायता दी जा रही है।

बायोफ्यूल पॉलिसी में क्या है खास?
2022 में संशोधित राष्ट्रीय बायोफ्यूल नीति के तहत, इथेनॉल उत्पादन के लिए टूटे अनाज (जैसे टूटा चावल), कृषि अवशेष (चावल की भूसी, कॉर्न कोब्स, गन्ने की खोई), साथ ही मक्का और गन्ने के रस/शिरा के उपयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है। वही, खाद्य फसलों का उपयोग उपलब्धता और बाजार की मांग को ध्यान में रखते हुए सावधानीपूर्वक किया जाता है, ताकि घरेलू खाद्य आपूर्ति पर कोई नकारात्मक असर न पड़े।