रुपया गिरने से उर्वरक बाजार में हलचल: यूरिया-DAP के दाम नहीं बढ़ेंगे, लेकिन केंद्र पर सब्सिडी बोझ बढ़ने के आसार

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डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट से यूरिया और डीएपी का निर्यात और उत्पादन महंगा हो सकता है।

डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट से यूरिया और डीएपी का निर्यात और उत्पादन महंगा हो सकता है।
– फोटो : सोशल मीडिया

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डॉलर के मुकाबले रुपये में आई गिरावट का असर अब देश के उर्वरक सेक्टर पर दिखने लगा है। जानकारों का कहना है कि रुपये के कमजोर होने से भारत का खाद सब्सिडी बिल और बढ़ सकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो रुपये की कीमत गिरने से विदेशों से उर्वरकों का निर्यात और घरेलू उत्पादन, दोनों ही महंगा हो गया है। इसका सबसे ज्यादा असर यूरिया और डीएपी पर पड़ रहा है।कंपनियां नहीं बढ़ा सकतीं दाम, सरकार को देनी होगी ज्यादा सब्सिडी
यूरिया और डीएपी की खुदरा कीमतें (Retail Prices) सरकार तय करती हैं, ऐसे में  उर्वरक कंपनियां इस बढ़ी हुई लागत का बोझ किसानों पर नहीं डाल सकतीं। इंडस्ट्री का कहना है कि लागत में हुई इस बढ़ोतरी की भरपाई केवल सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी बढ़ाकर ही की जा सकती है। यानी किसानों को खाद पुरानी दरों पर ही मिलेगी, लेकिन सरकार के खजाने से ज्यादा पैसा खर्च होगा।

इस साल जमकर हुआ खाद का आयात
उघोग के ताजा आंकड़ों के अनुसार, बीते साल की तुलना में इस बार आयात काफी अधिक हुआ है। बीते अप्रैल से अक्तूबर महीने के दौरान यूरिया के आयात में 2024 के इन्हीं महीनों की तुलना में  137 फीसदी का उछाल आया है। इसी अवधि में डीएपी का आयात भी लगभग 69 फीसदी बढ़ा है। NP/NPKS खादों के आयात में भी करीब 81 फीसदी की बढ़ोत हुई है।

यूरिया बनाना भी हुआ महंगा
कमजोर रुपया न केवल तैयार खाद के आयात को महंगा करता है, बल्कि देश में बनने वाले यूरिया की लागत भी बढ़ा देता है। इसका कारण यह है कि यूरिया के उत्पादन लागत का 85 से 90 फीसदी हिस्सा आयातित गैस का होता है, जिसकी कीमत डॉलर में चुकानी पड़ती है। इसी तरह, डीएपी का उत्पादन भी महंगा हो जाएगा क्योंकि इसके मुख्य कच्चे माल – रॉक फॉस्फेट और फॉस्फोरिक एसिड पूरी तरह से बाहर से मंगाए जाते हैं।

रुपये में 3 रुपये की गिरावट से कितना बढ़ेगा खर्च?
जानकारों का अनुमान है कि अगर रुपया डॉलर के मुकाबले कम से कम 3 रुपये गिरता है, तो घरेलू यूरिया की उत्पादन लागत कम से कम 700 रुपये प्रति टन बढ़ जाएगी। वही, विदेश से आने वाले यूरिया का रेट 1,200 रुपये प्रति टन तक बढ़ सकता है। इसी तरह डीएपी पर 2,100 रुपये प्रति टन का अतिरिक्त बोझ आ सकता है। वर्तमान में डीएपी का आयातित भाव लगभग 730 डॉलर या 65,700 रुपये प्रति टन है)।

सब्सिडी बिल में 3,000 करोड़ तक की बढ़त संभव
विशेषज्ञों का अनुमान है कि खाद सब्सिडी पर कुल असर करीब 3,000 करोड़ रुपये तक हो सकता है। उघोग से जुड़े जानकारों का कहना है कि केवल यूरिया (घरेलू और आयातित दोनों) की बढ़ी कीमतों के कारण सब्सिडी में 1,000 से 1,500 करोड़ रुपये का इजाफा हो सकता है। ये अनुमान वित्तीय वर्ष 2026 के आखिरी चार महीनों के अनुमानों पर आधारित हैं।

बजट से ज्यादा खर्च हो रहा पैस
भारी मात्रा में आयात के कारण सरकार का खाद सब्सिडी का खर्च पहले ही पिछले साल से ज्यादा हो चुका है। इस साल के पहले सात महीनों में सरकार ने करीब 1,23,315.24 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। बीते साल इसी अवधि में यह खर्च 1,02,445.92 करोड़ रुपये था। सरकार ने चालू साल के लिए यूरिया और गैर-यूरिया खाद के लिए कुल 1,68,000 करोड़ रुपये का बजट रखा है, जिसके अब बढ़ने के आसार दिखाई दे रहे हैं।