
चना की फसल – फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें
चना की खेती में एक प्रमुख समस्या फसल का मुरझाना या सूखना है। इसे उकठा रोग (Wilt Disease) कहा जाता है, जो किसानों के लिए चिंता का बड़ा कारण बनता है। यह रोग मुख्य रूप से संक्रमित मिट्टी, संक्रमित बीज और फसल में अत्यधिक नमी या अनियमित सिंचाई के कारण फैलता है। रोग से प्रभावित पौधों में पत्तियों का मुरझाना, उनके सूखना और जड़ों में लाल-काली धारियों का दिखना आम लक्षण हैं। यदि समय पर उचित कदम न उठाए जाएं तो यह पूरे खेत में तेजी से फैल सकता है और किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इस समस्या से बचाव के लिए कार्बेंडाजिम का उपयोग अत्यंत प्रभावी माना गया है। इसका उपयोग दो तरह से किया जा सकता है। पहला तरीका है कार्बेंडाजिम 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना। इससे पौधों पर सीधे असर पड़ता है और रोग के फैलाव को रोका जा सकता है। दूसरा तरीका है 500 ग्राम कार्बेंडाजिम को 2-3 परात बजरी में मिलाकर प्रति बीघा खेत में भुरकाव करना। इस विधि से मिट्टी में मौजूद रोगाणु नष्ट होते हैं और फसल स्वस्थ रहती है।
इसके अलावा, सिंचाई का उचित प्रबंधन भी आवश्यक है। चना की फसल को अत्यधिक नमी या पानी में भीगने से बचाना चाहिए। खेत में पानी का संतुलित वितरण और ड्रेनेज की व्यवस्था सुनिश्चित करना रोग के फैलाव को कम करता है। संक्रमित बीज के स्थान पर प्रमाणित स्वस्थ बीज का प्रयोग करना और खेत की सफाई बनाए रखना भी फसल सुरक्षा में मदद करता है।
इस प्रकार, समय पर उचित रासायनिक छिड़काव, संतुलित सिंचाई और बीज का सही चयन चना की फसल को उकठा रोग से बचाने में कारगर साबित होते हैं। ये उपाय अपनाकर किसान अपनी फसल को स्वस्थ रख सकते हैं और उच्च उत्पादन सुनिश्चित कर सकते हैं।




