
सांकेतिक तस्वीर
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देशभर में किसान अब परंपरागत फसलों से आगे बढ़कर उन्नत और पोषणयुक्त किस्मों को अपना रहे हैं। झारखंड के रांची स्थित ICAR-रिसर्च कॉम्प्लेक्स द्वारा विकसित दो उन्नत किस्में सोयाबीन की ‘स्वर्णा वसुंधरा’ और स्नो मटर की ‘स्वर्णा त्रिप्ती’ तेजी से किसानों के बीच लोकप्रिय हो रही हैं। इन किस्मों को उनके बेहतरीन पोषण मूल्य, स्वाद और बेहतर आर्थिक लाभ के लिए जाना जा रहा है।
ICAR के प्लांडू केंद्र में हॉर्टिकल्चर और वेजिटेबल साइंस के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. आर.एस. पैन के अनुसार, “इन दोनों किस्मों को अब देशभर में पहचान मिल चुकी है और किसानों के बीच इनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है।” स्वर्णा वसुंधरा सोयाबीन को शुरुआत में झारखंड सहित 13 राज्यों में किसानों को पोषण और आजीविका सुरक्षा देने के उद्देश्य से शुरू किया गया था।
14 राज्यों में पहुंची ‘स्वर्णा वसुंधरा’ सोयाबीन
अब केंद्र सरकार की उप-समिति की सिफारिश के बाद इसे 14 राज्यों में आधिकारिक रूप से वितरित किया जा रहा है। इन राज्यों में आंध्र प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ शामिल हैं। किसानों की ओर से इस किस्म को जबरदस्त सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है।
सेहत के लिए बेहद लाभकारी
डॉ. पैन के अनुसार, स्वर्णा वसुंधरा सोयाबीन में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, लिपिड, आवश्यक फैटी एसिड, मिनरल्स और आइसोफ्लेवोन्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। यह कैंसर, हड्डियों की कमजोरी (ऑस्टियोपोरोसिस) और हृदयरोग जैसी बीमारियों से बचाव में भी मददगार है। इसका मूल जर्मप्लाज्म ताइवान के वर्ल्ड वेजिटेबल सेंटर से आयात किया गया था, जिसे रांची में चयन व सुधार के बाद उन्नत किया गया। खास बात यह है कि इसे -20 डिग्री सेल्सियस पर एक साल तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
किसानों को सीधा फायदा
पुणे और पश्चिम बंगाल में इसकी प्रोसेसिंग यूनिटों के जरिए इससे सोया दूध, दही, पनीर और अन्य वैल्यू-एडेड उत्पाद बनाए जा रहे हैं, जिससे किसानों को अतिरिक्त आमदनी मिल रही है। एक कृषि सलाहकार के अनुसार, “यह फसल 3 से 4 महीने में तैयार हो जाती है और उत्पादन बेहद अच्छा मिलता है। अगले साल हम इसे बड़े स्तर पर लगाएंगे।”
‘स्वर्णा त्रिप्ती’ स्नो मटर
‘स्वर्णा त्रिप्ती’ एक नरम फलियों वाली मटर की किस्म है, जिसे सलाद, सैंडविच या सब्जी के रूप में सीधे उपयोग किया जा सकता है। डॉ. पैन ने बताया कि इन दोनों किस्मों का पोषण परीक्षण हो चुका है और किसान अब इनके स्वास्थ्य लाभ और आर्थिक क्षमता को समझने लगे हैं। इस किस्म के उन्नत बीज ओडिशा के संबलपुर कृषि विज्ञान केंद्र और पूर्वोत्तर राज्यों अरुणाचल प्रदेश व मिजोरम में भी भेजे जा रहे हैं।




