डीजीपी ने कहा ये
डीजीपी ने कहा कि माघ मेला के दौरान भीड़ प्रबंधन, गंगा और यमुना में डूबने की घटनाओं की रोकथाम, शीत लहर के प्रभाव तथा अग्नि दुर्घटनाओं जैसे बहुआयामी खतरे सामने आते हैं। ऐसे में अब हमारी रणनीति केवल घटना के बाद की प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं रह सकती। आवश्यकता इस बात की है कि जोखिम-आकलन और पूर्वानुमान आधारित योजना को केंद्र में रखकर कार्य किया जाए, ताकि किसी भी आपात स्थिति को उत्पन्न होने से पहले ही नियंत्रित किया जा सके।
उन्होंने मानव संसाधन के क्षमता-वर्धन, नियमित प्रशिक्षण, आधुनिक तकनीक के उपयोग और स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOP) पर विशेष बल दिया। डीजीपी के अनुसार, प्रशिक्षित बल और समयबद्ध प्रतिक्रिया प्रणाली ही आपात परिस्थितियों में जन-धन की क्षति को न्यूनतम कर सकती है।
डीजीपी राजीव कृष्ण ने यह भी रेखांकित किया कि विभिन्न विभागों—पुलिस, प्रशासन, स्वास्थ्य, अग्निशमन, आपदा प्रबंधन तथा स्वयंसेवी संगठनों—की तैयारियों को एकीकृत कमांड सिस्टम के अंतर्गत लाकर प्रभावी संचार और समन्वित कार्रवाई सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है। जब सभी एजेंसियाँ एक साझा उद्देश्य के साथ कार्य करेंगी, तभी व्यवस्थाएँ धरातल पर प्रभावी रूप से लागू होंगी।
सभी का है सामूहिक दायित्व
अंत में उन्होंने कहा कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुविधा और विश्वास बनाए रखना ही प्रशासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। माघ मेला केवल आस्था का पर्व नहीं, बल्कि प्रशासनिक दक्षता, समन्वय और सेवा-भाव का भी प्रतीक है, जिसे सुरक्षित और सफल बनाना हम सभी का सामूहिक दायित्व है।












