
मटर की खेती
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रबी सीजन में बड़ी संख्या में किसान मटर की खेती कर रहे हैं। इस बीच कुछ इलाकों में मटर की फलियों में दाने पूरे नहीं बन पा रहे हैं। इसके अलावा स्वाद में भी पहले जैसी मिठास नहीं आ रही। किसान इस गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। इससे उन्हें फसलों के उत्पादन के साथ बाजार में मिलने वाले भाव में भी घाटा हो रहा है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, इस समस्या की मुख्य वजह खाद और पोषक तत्वों का असंतुलित उपयोग है।कृषि विशेषज्ञ कहते हैं कि कई किसान पहली तुड़ाई के बाद खाद देना बंद कर देते हैं, जबकि कुछ बुवाई के समय जरूरी उर्वरक नहीं डालते। नतीजतन पौधों को पूरा पोषण नहीं मिल पाता और फलियों में दाने सही ढंग से विकसित नहीं हो पाते।
खाद प्रबंधन में लापरवाही से घटता उत्पादन
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि मटर की अच्छी पैदावार के लिए संतुलित खाद प्रबंधन बेहद जरूरी है। खेत तैयार करते समय बेसल डोज के रूप में सड़ी हुई गोबर की खाद, डीएपी, पोटाश और जिंक का प्रयोग करना चाहिए। इससे पौधे मजबूत बनते हैं, फूल और फलियां अच्छी आती हैं तथा मटर की गुणवत्ता बेहतर रहती है।
मिठास बढ़ाने में माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की अहम भूमिका
कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि मटर में मिठास के लिए सल्फर, जिंक, बोरान और मोलिब्डेनम जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व जरूरी होते हैं। इनकी कमी होने पर मटर का स्वाद फीका रह जाता है और बाजार में उचित दाम नहीं मिल पाता।
छिड़काव का सही समय जरूरी
विशेषज्ञों के अनुसार पहला छिड़काव तब करें जब फलियां छोटी हों और दूसरा तब, जब दाने भरने लगें। इसके अलावा जिन खेतों में पहले धान या गन्ने की खेती हुई हो, वहां फूल आने से पहले ही माइक्रोन्यूट्रिएंट्स का छिड़काव करना लाभकारी रहता है। सही समय पर संतुलित खाद और पोषक तत्वों का इस्तेमाल करने से मटर की फलियों में दाने भरपूर बनते हैं, मिठास बढ़ती है और किसानों को बेहतर उत्पादन व मुनाफा मिलता है।




