कृषक दुर्घटना कल्याण योजना पर कोर्ट का फैसला: किसान की पहचान खेती, कल्याण योजनाओं में जमीन के कागज नहीं कसौटी

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जमीन के कागज नहीं, बल्कि खेती से किसान की पहचान। – फोटो : एआई

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किसानों के हित में बड़ा फैसला सुनाया है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना से जुड़े एक फैसले की सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि योजना के लाभ के लिए मृतक किसान की मुख्य आय खेती से होनी चाहिए, कृषि भूमि उसके नाम पर दर्ज होना अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने एक विधवा की याचिका पर दावा अस्वीकार करने के फैसले को रद्द कर दोबारा विचार करने का आदेश दिया है।  

क्या है मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना?
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 2020 में शुरू की गई ‘मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना’ का मुख्य उद्देश्य दुर्घटना में मारे जाने वाले किसानों के परिवारों को वित्तीय सहायता प्रदान करना है। इस योजना के तहत, किसान की मौत होने पर उसके आश्रितों को सरकार की ओर से आर्थिक सहायता मिलती है।

यह योजना ग्रामीण भारत के आर्थिक रूप से कमजोर किसान समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा जाल का काम करती है। इस योजना की शर्तों में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख नहीं है कि कृषि भूमि केवल मृतक के नाम पर ही होनी चाहिए, बल्कि फोकस किसान की मुख्य आजीविका पर है। 

प्रशासनिक व्याख्या में अक्सर बरती जाती है सख्ती
यह योजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास है, जहां अधिकांश किसान संयुक्त परिवारों में रहते हैं और भूमि अक्सर परिवार के वरिष्ठ सदस्य के नाम पर दर्ज रहती है। इस योजना की शुरुआत से अब तक हजारों परिवारों को इसका लाभ मिल चुका है, लेकिन प्रशासनिक व्याख्या में अक्सर सख्ती बरती जाती है, जिससे वास्तविक लाभार्थी वंचित हो जाते हैं। इसी तरह का मामला एक विधवा याचिकाकर्ता का है, जिनके पति की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। मृतक अपने दादा के नाम पर दर्ज खेत में काम करता था और उसकी मुख्य आजीविका कृषि थी। उसके परिवार में पिता, पत्नी और तीन नाबालिग बच्चे थे। 

हालांकि, जिला स्तर की समिति ने प्रार्थी की आर्थिक सहायता का दावा इसलिए अस्वीकार कर दिया क्योंकि कथित तौर पर मृतक एक सामान्य दुकान या चूड़ी की दुकान चलाता था, जिसे उसकी मुख्य आय का स्रोत माना गया, और भूमि उसके नाम पर नहीं थी। याचिकाकर्ता ने सबूत पेश किए कि दुकान उसके देवर द्वारा चलाई जाती थी, लेकिन अधिकारियों ने इसे बिना सोचे-समझे खारिज कर दिया। दरअसल, ग्रामीण क्षेत्रों में किसान अक्सर छोटे-मोटे कामों से अतिरिक्त आय कमाते हैं, लेकिन यह उनकी कृषि-आधारित पहचान को प्रभावित नहीं करता। 

कोर्ट का तर्क और किसानों के हित में फैसला
कोर्ट ने इस मामले को ग्रामीण वास्तविकताओं का उदाहरण माना, जहां संयुक्त परिवार प्रणाली में भूमि एक एक व्यक्ति के नाम पर रहना सामान्य है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिविजन बेंच, जिसमें जस्टिस अजित कुमार और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी शामिल थे, ने फैसला सुनाया कि योजना के लाभ के लिए रेवेन्यू रिकॉर्ड से ज्यादा महत्वपूर्ण मृतक की मुख्य आजीविका है। 

कोर्ट ने कहा, “ग्रामीण व्यवस्था में भूमि परिवार के वरिष्ठ सदस्य के नाम पर रहना आम है, जबकि अन्य सदस्य संयुक्त रूप से कृषि कार्य करते हैं।” कोर्ट ने यह भी नोट किया कि मृतक के दुकान चलाने का कोई ठोस सबूत नहीं था, और याचिकाकर्ता के सबूतों को बिना विचार किए खारिज करना अनुचित था। 

कल्याण योजनाओं की व्याख्या उदार होनी चाहिए, इस सिद्धांत पर जोर देते हुए कोर्ट ने याचिका स्वीकार की और अधिकारियों को याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर देकर दावा दोबारा विचार करने का निर्देश दिया। 

क्या होगा अदालत के फैसले का असर 
यह फैसला प्रशासनिक कठोरता पर न केवल अंकुश लगाता है, बल्कि किसानों की वास्तविक चुनौतियों को मान्यता देता है, जैसे भूमि रिकॉर्ड की जटिलताएं और अतिरिक्त आय के स्रोत। यह फैसला ग्रामीण भारत के लाखों किसानों के लिए एक मिसाल बन सकता है, जहां भूमि स्वामित्व की औपचारिकताएं अक्सर कल्याण योजनाओं में बाधा बनती हैं। 

इस योजना के तहत उन भूमिहीन किसानों को भी लाभ मिल सकता है जो शेयरक्रॉपिंग या किराए पर खेती करते हैं। ग्रामीण गरीबी कम करने में ऐसी योजनाएं सहायक हैं, क्योंकि दुर्घटनाएं किसान परिवारों को आर्थिक रूप से तबाह कर देती हैं। हालांकि, प्रमाण जमा करने की प्रक्रिया को आसान बनाने के साथ ही अधिकारियों की ट्रेनिंग भी जरूरी है।  

भविष्य में, सरकार को योजना की गाइडलाइंस को और स्पष्ट करने की जरूरत है ताकि ऐसे विवाद कम हों। यह फैसला न्यायिक सक्रियता का उदाहरण है, जो राज्य की कल्याणकारी नीतियों को अधिक समावेशी बनाता है। 

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला उत्तर प्रदेश के किसान परिवारों के लिए न्याय और राहत का प्रतीक माना जाएगा, जो ग्रामीण वास्तविकताओं को प्राथमिकता देता है। इससे योजना के कार्यान्वयन में सुधार की उम्मीद है, और अन्य राज्यों की इसके जैसी अन्य योजनाओं पर भी प्रभाव पड़ सकता है।