बींस की खेती : किसान ने अपनाया वैज्ञानिक तरीका, बनाया सफल मॉडल, बढ़ गई आय

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बींस की खेती – फोटो : सोशल मीडिया

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उत्तर प्रदेश के सीतामढ़ी जिले के लगमा गांव में बींस की खेती के जरिए किसानों के लिए एक प्रेरक मॉडल सामने आया है। पिछले 10 वर्षों से इस फसल पर काम कर रहे राजू सहनी ने वैज्ञानिक पद्धति अपनाकर न केवल उच्च उत्पादन हासिल किया है, बल्कि इसे स्थायी आय का एक मजबूत स्रोत भी बना दिया है। उनका अनुभव यह साबित करता है कि यदि किसान सही समय और तकनीक का पालन करें, तो बींस जैसी सामान्य फसल भी लाभकारी हो सकती है।

बींस की बुवाई का सही समय और मिट्टी

राजू कहते हैं कि अक्टूबर से नवंबर का समय बींस की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त है। मिट्टी का चुनाव भी महत्वपूर्ण है, जिसमें मध्यम से हल्की दोमट मिट्टी आदर्श मानी जाती है। खेत की तैयारी के दौरान जैविक खाद, जैसे गोबर की सड़ी खाद या कंपोस्ट, डालने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और पौधों का विकास बेहतर होता है।

उत्पादन बढ़ाने की तकनीक

पौधों को सहारा देने की तकनीक बेहद जरूरी है। बढ़ते पौधों को बांस या अन्य उपलब्ध सामग्री से सहारा देना चाहिए, ताकि वे जमीन पर न फैलें और फल स्वस्थ रूप से विकसित हों। रोग नियंत्रण के लिए वे जैविक घोलों का उपयोग करते हैं, जैसे नीम खली या लहसुन-खीनी से बने मिश्रण। इससे पौधे मजबूत बने रहते हैं और रसायन रहित खेती से फसल सुरक्षित रहती है।

लाभ और कमाई

बींस की बाजार में लगातार मांग बनी रहती है। राजू सहनी का मॉडल छोटे और मध्यम किसानों के लिए आदर्श साबित हो रहा है। उनकी विधि से लागत कम आती है और मुनाफा अधिक होता है। एक बीघे में 40,000 से 50,000 रुपये तक की आमदनी संभव है, बशर्ते किसान नियमित देखभाल और वैज्ञानिक तकनीक अपनाएं।