


चेरी पेपर के उत्पादन के साथ सरिता मांगर का एफपीओ 200 मीट्रिक टन दालों की खरीद और विपणन भी कर रहा है। – फोटो : गांव जंक्शन
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पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी और दूरदराज के गांवों में, जहां कभी खेती केवल पारंपरिक जीवनयापन का जरिया हुआ करती थी, वहां अब यह आर्थिक समृद्धि और उद्यमशीलता का माध्यम बन रही है। यहां के किसान खेती-बाड़ी को व्यापार के रूप में अपना रहे हैं। नागालैंड, मणिपुर, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश जैसे पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में किसान क्लस्टर बनाकर खेती कर रहे हैं। इससे गांवों में फसल उत्पादन बढ़ा है, अब कई फसलें निर्यात की जा रही हैं और किसानों की कमाई में भी ईजाफा हुआ है। सिक्किम के जैविक उत्पादों की धमक
दक्षिण सिक्किम के नामची गांव की रहने वाली सरिता मंगर की कहानी आज पूरे राज्य के लिए प्रेरणा बन चुकी है। जैविक राज्य होने के कारण सिक्किम के उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मांग रहती है। सरिता मांगर ने वर्ष 2017 में केवल 10 किसानों के साथ एक एफपीओ (कृषक उत्पादक संगठन) की शुरुआत की, जो अब 500 किसानों का सशक्त समूह बन चुका है। सरिता बताती हैं, ‘हमारे यहां की चेरी पेपर बहुत प्रसिद्ध है, यह दुनिया की सबसे तीखी मिर्च में शुमार की जाती है। हमने इसे बड़े पैमाने पर उगाना शुरू किया और अब इसकी प्रोसेसिंग भी शुरू कर दी है। अब इससे चिली फ्लेक्स बनाते हैं। सात किलो मिर्च से करीब 1 किलो फ्लेक्स तैयार होते हैं। बाजार में चिली फ्लेक्स की अच्छी कीमत मिलती है।’
10-20 मीट्रिक टन चेरी पेपर के वार्षिक उत्पादन के साथ-साथ सरिता मांगर का एफपीओ 200 मीट्रिक टन दालों की खरीद और विपणन भी कर रहा है। तकनीकी विधियों, जैसे – मल्चिंग पेपर, बेड निर्माण और बीज उत्पादन से एक तरफ खेती लागत घटी है तो दूसरी ओर मुनाफा बढ़ गया है। इसी खेती की कमाई से सरिता ने अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा के लिए आंध्र प्रदेश और चंडीगढ़ भेजा है और अपने परिवार को खुशहाल बनाया है।
हुमा सूमी बताते हैं कि नागालैंड में अब खेती बदल रही है। – फोटो : गांव जंक्शन
नागालैंड के गांवों में खेती की धारणा पिछले कुछ वर्षों में पूरी तरह बदल गई है। यहां के जो किसान पहले सिर्फ अपने उपभोग के लिए खेती करते थे, वो अब समूह बनाकर 100 से 200 मीट्रिक टन तक उत्पादन कर रहे हैं। यह बदलाव मुख्य रूप से केंद्र सरकार की ‘मिशन ऑर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट फॉर नॉर्थ ईस्ट रीजन’ योजना के कारण आया है। हुका सूमी एक स्थानीय किसान उत्पादक संगठन के प्रतिनिधि हैं, जो एफपीओ के गठन और उसके संचालन का काम करती है। हुका सूमी बताते हैं, ‘पहले यहां के सीमांत किसान सिर्फ अपने खाने के लिए खेती करते थे। अपनी खपत से जो कुछ बच जाता, उसे रिश्तेदारों, करीबियों और परिचितों में बांट दिया जाता था। परिवार के बाकी खर्च चलाने के लिए घर का कोई सदस्य मजदूरी करता, तो कोई लकड़ी काटने का काम करता। अब यहां परिस्थितियां बदल रही हैं। यहां के किसान फसलों को व्यावसायिक दृष्टिकोण से देखने लगे हैं और उसी के अनुसार खेती करते हैं।
हुका बताते हैं, ‘हमारी संस्था से सम्बद्ध नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मेघालय के एफपीओ से 7500 से अधिक किसान जुड़े हैं। यहां की मिट्टी की उर्वरता बहुत अधिक है। नागालैंड में राजमा की 20 से 25 वैरायटी, जीआई टैग वाला मीठा खीरा, अनानास, ट्री टोमैटो, अदरक, हल्दी आदि फसलों का उत्पादन कर रहे हैं। यहां का मीठा खीरा भरपूर पानी वाला होता है। फसल उत्पादन के साथ-साथ अब प्रसंस्करण और पैकेजिंग पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। नागालैंड के कृषि उत्पाद यूके और दुबई तक जा रहे हैं। उम्मीद है कि अगले दो-तीन साल में बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।’
सूमी बताते हैं, अगर किसी गांव में कम उत्पादन होता है तो बाजार खोजने में दिक्कत आती है। लेकिन, जब 500 किसान सामूहिक रूप से बड़े स्तर पर फसल तैयार करते हैं तो वह जगह खुद बाजार बन जाती है।
इम्फाल के सूरचंद्र वापस लौटे अपने गांव। – फोटो : गांव जंक्शन
मणिपुर में भी कई शिक्षित युवा शहरों की नौकरी छोड़कर वापस गांव लौटकर खेती कर रहे हैं। वेस्ट इम्फाल जिले के सूरचंद्र की कहानी कुछ ऐसी ही है। शहरी जीवन को छोड़कर सूरचंद्र गांव में खेती की नई अलख जगा रहे हैं। अहमदाबाद से पढ़ाई पूरी करने के बाद, 13 साल तक शिक्षक के रूप में काम कर चुके सूरचंद्र ने वर्ष 2017 में गांव लौटकर खेती शुरू कर दी। उन्होंने वर्ष 2024 में फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी (एफपीसी) का गठन भी कर लिया और कारवां चल निकला। सूरचंद्र बताते हैं, जब अकेले काम करते हैं तो सीमाएं और तमाम चुनौतियां होती हैं। इसीलिए, एफपीसी बनाया ताकि समूह मिलकर खेती और कृषि व्यवसाय कर सकें।
सूरचंद्र की संस्था से जुड़े 500 किसान 500 हेक्टेयर भूमि में जैविक तरीके से खेती कर रहे हैं। इनमें किंग चिली (जीआई टैग), ब्लैक राइस, अदरक, मिलेट्स और पैशन फ्रूट जैसी फसलें प्रमुखता से शामिल हैं। सूरचंद्र कहते हैं, ‘पहले लोग खेती को कमाई का साधन नहीं मानते थे, लेकिन अब एक हेक्टेयर में सिर्फ किंग चिली से ही 6 लाख रुपये तक शुद्ध आमदनी हो रही है।’ वह बताते हैं, हमारा फोकस निर्यात की तरफ बढ़ रहा है, जिससे किसानों को अधिक दाम मिल सकें। यह बदलाव न केवल किसानों की आमदनी बढ़ा रहा है, बल्कि उनके बच्चों को भी मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसी पढ़ाई के अवसर दे रहा है।
एपीडा ने दिलाया वैश्विक बाजार
खेती को व्यवसायिक रूप देने में केंद्र सरकार की योजनाओं और वाणिज्य मंत्रालय के तहत कार्यरत कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) की भूमिका अहम रही है। एपीडा के चेयरमैन अभिषेक देव बताते हैं, सरकार का उद्देश्य किसानों को ऑर्गेनिक खेती के लिए प्रोत्साहित करना और उनके उत्पादों की घरेलू व अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ब्रांडिंग और निर्यात को मजबूत करना है। विशेष रूप से पैशन फ्रूट और अनानास जैसे उत्पादों के लिए समुद्री शिपमेंट प्रोटोकॉल विकसित किए जा रहे हैं ताकि कृषि उत्पादों के निर्यात में तेजी लाई जा सके।
खेती से बढ़ी आत्मनिर्भरता और सम्मान
पूर्वोत्तर भारत की यह कहानी फसलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसानों के आत्मविश्वास, नवाचार व सामूहिक प्रयास की कहानी भी है। क्लस्टर आधारित खेती, एफपीओ / एफपीसी मॉडल, जैविक उत्पादन, तकनीकी हस्तक्षेप और सरकारी योजनाएं मिलकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बना रही हैं। जैसा कि सरिता मंगर कहती हैं – ‘खेती में ज्यादा कमाई होती है। मेरे बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और आत्मसम्मान – अब सब कुछ खेती से ही जुड़ गया है।’




