मटर की खेती : चूल्हे की राख से कीट नियंत्रण, इस पारंपरिक तकनीक से बढ़ेगी पैदावार

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मटर की खेती

मटर की खेती
– फोटो : सोशल मीडिया

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रबी सीजन में की जाने वाली मटर की खेती में किसान पारंपरिक तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। कई इलाकों में किसान खेतों में राख डालते हैं। किसनों का मानना है कि यह विधि केवल कीटों से बचाव ही नहीं करती, बल्कि फसल को प्राकृतिक और स्वास्थ्यवर्धक बनाने में भी मददगार साबित होती है। किसानों का कहना है कि इस तकनीक से उगाई गई मटर अधिक पौष्टिक और सुरक्षित होती है।कृषि विशेषज्ञ कहते हैं कि शीतलहर बढ़ने से मटर के पौधों पर इसका असर पड़ता है। इसके नुक्सान से बचने के लिए खेत में घर के चूल्हे या अलाव से बची राख को हल्के से छिड़क सकते हैं। राख के प्रयोग से मिट्टी में नमी नियंत्रित रहती है और कीट-पतंगों का प्रकोप लगभग समाप्त हो जाता है। विशेष रूप से वे कीड़े, जो मटर की पत्तियों को नुकसान पहुंचाते हैं, इस पद्धति से प्रभावी रूप से नियंत्रित होते हैं। 

कृषि विशेषज्ञ कहते हैं कि यह तकनीक दशकों से चली आ रही है। उस समय रासायनिक खाद और कीटनाशक उपलब्ध नहीं थे, फिर भी फसलें स्वस्थ और अच्छी पैदावार वाली होती थीं। वहीं, इसको लेकर किसानों का मानना है कि रासायनिक खाद से उगाई गई फसल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है, जबकि राख के इस्तेमाल से फसल अधिक सुरक्षित, प्राकृतिक और पौष्टिक होती है। राख से उगाई गई फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों में सुधार होता है।

इस पारंपरिक तकनीक को अपनाकर किसान अपनी फसलों को स्वस्थ और उपजाऊ बना सकते हैं, लागत कम कर सकते हैं और अपनी आमदनी भी बढ़ा सकते हैं। इस विधि से मटर की खेती न केवल पर्यावरण के अनुकूल होती है, बल्कि किसानों के लिए लाभकारी भी साबित होती है। आपको बता दें कि मटर की खेती के लिए सबसे पहले खेत की अच्छी तरह जुताई की जाती है। इसके बाद मिट्टी को भुरभुरी बनाकर समतल किया जाता है और हरे मटर के बीज बोए जाते हैं। जब पौधे कुछ बड़े हो जाते हैं और शीतलहर का असर बढ़ता है, तब खेत में घर के चूल्हे या अलाव से बची राख को हल्के से छिड़का जाता है।