लवणीय मिट्टी से लड़ने वाली फसलें : ऊसर जमीन में कुछ पौधों के उगने की जिद से आकार ले रही है भविष्य की खेती

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लवणीय मिट्टी में कुछ पौधे जमीन चीरकर बाहर निकल रहे हैं, जो खेती के भविष्य को नया आकार दे सकते हैं।

लवणीय मिट्टी में कुछ पौधे जमीन चीरकर बाहर निकल रहे हैं, जो खेती के भविष्य को नया आकार दे सकते हैं।
– फोटो : गांव जंक्शन

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सुबह की धूप में खेत की जमीन पर कदम रखते ही वह चरमराने लगती है। देश-दुनिया के कई इलाकों में मिट्टी पर जमी सफेद नमक की परत से खेती मुश्किल हो गई है। तटीय इलाकों की जमीन पर तो सफेद लवणीय परत धूप पड़ने पर तेज चमकती है और कुछ ही मीटर दूर समुद्र की लहरें तटबंध से टकरा रही होती हैं। तटीय क्षेत्रों में तो हवा में भी समुद्र का खारापन महसूस होता है। ऐसे माहौल में फसल का उगना नामुमकिन माना जाता है। लेकिन, इसी लवणीय मिट्टी और खारे पानी के बीच कुछ पौधे जमीन चीरते हुए बाहर निकल रहे हैं।यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म का दृश्य नहीं है, बल्कि समुद्र तटीय क्षेत्रों के पास स्थित वो खेत हैं, जहां लवणीय पानी और मिट्टी में फसलें उगाने के लिए वैज्ञानिक परीक्षण में जुटे हुए हैं। यहां वैज्ञानिक एक शांत, लेकिन क्रांतिकारी प्रयोग कर रहे हैं – वे ऊसर और बंजर हो चुकी जमीन को फिर से खेती योग्य बनाने की कवायद में जुटे हैं। पानी को लवण-मुक्त करने के लिए यहां न तो कोई विशाल प्लांट है, न ही कोई चमत्कारी मशीन। सिर्फ बीज, धैर्य और खेती को देखने का बिल्कुल नया नजरिया खेती के नए भविष्य को आकार दे रहा है।

ऊसर या लवणीय क्षेत्रों में खेती का वैश्विक संकट
सैटेलाइट तस्वीरों में यह बदलाव साफ दिखता है। दुनिया के तटवर्ती इलाके धीरे-धीरे सिकुड़ रहे हैं। समुद्री पानी धान, गेहूं और सब्जियों के खेतों में घुस रहा है, जो कभी सुरक्षित माने जाते थे। किसानों के लिए यह जलवायु परिवर्तन का सैद्धांतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि वह दिन है, जब हमेशा उपज देने वाला खेत अचानक पीला और बंजर होने लगता है।

दुनियाभर के तटीय क्षेत्रों में लाखों हेक्टेयर जमीन धीरे-धीरे लवणता से प्रभावित हो रही है। कभी ऊंचा ज्वार, कभी सूखा साल, कभी सिंचाई का ऐसा पानी, जो हर बार थोड़ा-सा नमक छोड़ जाता है। फिर एक दिन किसान बीज बोता है, फसल उगती तो है, लेकिन वह बढ़ नहीं पाती है। पैदावार घटती जाती है और मिट्टी पर नमक की सफेद लकीरें उभर आती हैं।

भारत, नीदरलैंड, बांग्लादेश, चीन, ऑस्ट्रेलिया समेत अनेक देशों की मिट्टी के लवणग्रस्त होने और उसके असर की कहानियां अलग-अलग हैं, लेकिन इसका पैटर्न एक जैसा ही है। पहले कहा जाता था कि जब मिट्टी लवणता से ग्रस्त हो जाए, तो जमीन छोड़ दो। लेकिन, अब नजरिया बदल रहा है, वैज्ञानिक सवाल भी बदल रहे हैं – अगर फसल ही नमक सहने लगे तो ऊसर जमीन में खेती का भविष्य कैसे बदल सकता है?

नीदरलैंड का ‘ऊसर खेत’
नीदरलैंड के फ्रिसलैंड प्रांत में, एक आलू किसान मार्क वान राइसलबर्गे ने अपने नुकसान को प्रयोगशाला में बदल दिया। एक तूफानी लहर ने उनके खेतों को लवणग्रस्त और ऊसर बना दिया। इसके बाद उन्होंने वैज्ञानिकों के साथ मिलकर ऐसे आलू उगाने शुरू किए, जो लवणता को सिर्फ सहन ही नहीं करते, बल्कि थोड़ा पसंद भी करते हैं।

उनके “सॉल्ट फार्म” में ऐसे आलू लगाए जाते हैं, जिन्हें ऐसा पानी दिया जाता है, जो आम फसलों को कुछ ही दिनों में मार सकता है। फसलों की कई किस्में सूख जाती हैं, तो कुछ मुश्किल से बचती हैं, लेकिन कुछ पौधे इन विपरीत परिस्थितियों में भी टिक जाते हैं। उन्हीं को चुनकर हर मौसम में फिर बोया जाता है। आज ऐसी किस्में तैयार हो चुकी हैं, जो समुद्री पानी की आधी लवणता में भी उग सकती हैं। पैदावार भले कम हो, लेकिन वास्तविक है। ये “खारे आलू” अब बाजार में भी बिकने लगे हैं।

दुनिया भर में उभरती उम्मीद
ऐसे प्रयोग अब पाकिस्तान के ऊसर मैदानों से लेकर चीन के बोहाई तट तक हो रहे हैं। चीन में खारे चावल की खेती से उन जमीनों पर भी फसल पैदा हो रही है, जिन्हें बरसों पहले छोड़ दिया गया था। बांग्लादेश में किसान लवणीय तत्वों से भरे नालों के पास लवणता को सहन करने में सक्षम टमाटर और जौ उगा रहे हैं। फिलहाल ये प्रयोग छोटे पैमाने पर हो रहे हैं – कहीं कुछ हेक्टेयर, कहीं एक परीक्षण क्षेत्र तक इनका दायरा सीमित है। लेकिन, हर बार फसलों की कटाई यह धारणा तोड़ रही है कि लवणीय या ऊसर मिट्टी में खेती संभव नहीं है।

पौधों की जिद और विज्ञान की समझ
खारापन पौधों का सबसे बड़ा दुश्मन है। यह पौधों की कोशिकाओं से पानी खींच लेता है, जैसे सूखा स्पंज गीले कपड़े से नमी सोख लेता है। ज्यादातर फसलें इस तनाव में मुरझा जाती हैं, पोषक तत्व नहीं ले पातीं और बीमारियों का शिकार बनती हैं। इसीलिए, वैज्ञानिक अब उन जंगली पौधों से सीख रहे हैं, जो सदियों से खारे दलदलों और समुद्री किनारों पर उगते आए हैं। उनके जीन, उनकी बनावट और उनकी सहनशीलता को समझकर नई फसलें तैयार की जा रही हैं – ऐसी फसलें, जो जलवायु परिवर्तनी की मार झेल रही बदलती दुनिया में टिक सकें।

खेती का भविष्य कहां है?
भविष्य की खेती शायद वहीं नहीं होगी, जहां हम आज उसे देखते हैं। वह उन ऊसर जमीनों पर भी पनप सकती है, जिन्हें हमने खोया हुआ मान लिया था। वह दिन दूर नहीं, जब समुद्र के किनारे, लवणग्रस्त मैदानों में, और नमक से चमकती मिट्टी पर भी पौधे उगते हुए दिखाई देंगे।