
झींगा पालन उत्तर भारत की खारी जमीन का समाधान हो सकता है। – फोटो : सोशल मीडिया
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उत्तर भारत में मिट्टी के खारेपन की समस्या से जुझ रहे किसानों के लिए झींगा पालन (Shrimp Farming) कमाई का मजबूत माध्यम बनकर उभर सकता है। झींगा पालन इसलिए भी अहम हो जाता है, क्योंकि खारी मिट्टी के कारण आम फसलों की उपज घट रही है। इसके अलावा हालिया शोध बताते हैं कि झींगा पालन से होने वाली कमाई पारंपरिक खेती के मुकाबले कई गुना अधिक है।हाल ही में जारी रिपोर्ट श्रींप फार्मिंग इन हरियाणा: लर्निंग्स फ्रॉम आंध्र प्रदेश और ब्लू रिवॉल्यूशन: एक्वाकल्चर टू ऑगमेंट फार्मर्स इनकम में यह बात सामने आई है कि हरियाणा जैसे राज्य में झींगा की खेती से एक हेक्टेयर में सालाना 6.3 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमाया जा सकता है।
गेहूं-धान से कई गुना ज्यादा रिटर्न
कृषि लागत और मूल्य आयोग के लागत अनुमानों के आधार पर की गई तुलना बेहद चौंकाने वाली है। रिपोर्ट के अनुसार, गेहूं-धान की पारंपरिक खेती से सालाना शुद्ध आय लगभग 1.74 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर है। गेहूं-कपास की खेती से यह आय करीब 1.32 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर है।
इसके उलट, झींगा की साल में केवल एक फसल लेने पर ही 6.3 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तक की कमाई हो सकती है।
खारी जमीन पर 5 गुना तक मुनाफे की उम्मीद
इक्रियर के शोधकर्ता राय दास, संचित गुप्ता और अशोक गुलाटी द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट में बताया गया है कि झींगा पालन से मिलने वाला रिटर्न पारंपरिक खेती के दो फसल चक्रों की तुलना में 3.6 से 4.7 गुना अधिक है। रिपोर्ट में कहा गया है कि खारी जमीनों पर यह अनुपात 4 से 5 गुना तक हो सकता है, क्योंकि ऐसी मिट्टी में सामान्य फसलों की उत्पादकता राज्य के औसत से बहुत कम होती है, जबकि झींगा पालन के लिए यह अनुकूल है।
मुनाफा बड़ा, लेकिन जोखिम भी कम नहीं
रिपोर्ट में मुनाफे के साथ-साथ इसमें छिपे जोखिमों को लेकर भी किसानों को आगाह किया गया है। झींगा पालन में लागत बहुत अधिक लगती है, जिससे यह उत्पादन जोखिमों के प्रति संवेदनशील हो जाता है। अध्ययन बताते हैं कि पांच साल के चक्र में अगर एक बार भी फसल खराब हो जाती है, तो किसान पर कर्ज का बोझ बढ़ सकता है और अनौपचारिक ऋण स्रोतों पर उसकी निर्भरता बढ़ जाती है, जिससे आर्थिक संकट पैदा हो सकता है।
आंध्र प्रदेश मॉडल से जोखिम घटाने के उपाय
जोखिम को कम करने और आय स्थिर रखने के लिए रिपोर्ट में देश के अग्रणी झींगा उत्पादक राज्य आंध्र प्रदेश से सीखने की सलाह दी गई है। वहां के सफल केस स्टडीज के आधार पर कुछ प्रमुख रणनीतियां सुझाई गई हैं, जैसे आंशिक कटाई कीमतों में उतार-चढ़ाव के जोखिम को कम किया जा सकता है। नर्सरी-आधारित बायोफ्लॉक सिस्टम से झींगों के जीवित रहने की दर बेहतर होती है।
मिश्रित खेती विविधता लाकर जोखिम बांटती है। बेस्ट मैनेजमेंट प्रैक्टिस बीमारियों के खतरे को कम करने के लिए सही प्रबंधन अपनाना।
उत्तर भारत में खारी मिट्टी की गंभीर स्थिति
रिपोर्ट में भारतीय मिट्टी में बढ़ते लवणता पर भी चिंता जताई गई है। आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल 6.74 मिलियन हेक्टेयर सबसॉइल (उप-मिट्टी) लवणता से प्रभावित है। इसमें से अकेले 1.2 मिलियन हेक्टेयर (करीब 18 प्रतिशत) हिस्सा उत्तर-पश्चिमी भारत में है, जहां झींगा पालन एक प्रभावी समाधान साबित हो सकता है।




