
आधुनिक धान खेती की तकनीकों से मिट्टी की संरचना में आई गंभीर गिरावट की ओर विशेषज्ञों ने ध्यान देने की बात कही है। – फोटो : Ai
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कृषि विशेषज्ञों ने मिट्टी की गिरती गुणवत्ता और तेजी से घटते भूजल स्तर को देखते हुए धान की खेती के रकबे को कम करने और फसल विविधीकरण अपनाने की अपील की है। विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा कृषि पद्धतियां लंबे समय में प्राकृतिक संसाधनों के लिए गंभीर खतरा बन रही हैं।आधुनिक धान खेती से बिगड़ती मिट्टी
सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर (CSA) के सीईओ जी. वी. रामांजनेयुलु ने आधुनिक धान खेती की तकनीकों से मिट्टी की संरचना में आई गंभीर गिरावट की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने बताया कि बार-बार की जाने वाली पडलिंग प्रक्रिया से मिट्टी का टेक्सचर “बारीक आटे” जैसा हो गया है, जिससे जमीन की सतह के नीचे कंक्रीट जैसी सख्त परत बन गई है।
भूजल रिचार्ज पर बढ़ता संकट
रामांजनेयुलु ने कहा कि इस सख्त परत के कारण बारिश का पानी जमीन में नहीं जा पाता, जिससे भारी वर्षा के बावजूद भूजल का पुनर्भरण नहीं हो रहा है। मंगलवार को यहां तेलंगाना कृषि के भविष्य पर आयोजित कार्यशाला में उन्होंने चेतावनी दी कि यदि अगले पांच से छह वर्षों में सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो 2030 तक स्थिति सुधारने में मुश्किल हो सकती है।
‘तेलंगाना राइजिंग 2047’ और कृषि
यह चर्चा तेलंगाना सरकार, CSA और दक्कन डेवलपमेंट सोसायटी (DDS) द्वारा आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला का हिस्सा थी, जिसमें तेलंगाना राइजिंग 2047 विज़न डॉक्यूमेंट के लक्ष्यों पर मंथन हुआ। इस विज़न का उद्देश्य 2047 तक 3 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का निर्माण करना है।
भूजल संकट और किसानों की आय
रामांजनेयुलु ने बताया कि राज्य का लगभग 70 प्रतिशत भूजल पहले ही “क्रिटिकल ज़ोन” में पहुंच चुका है। उन्होंने कहा कि 2018 के बाद से किसानों की वास्तविक आय महंगाई और बढ़ती लागत के कारण स्थिर बनी हुई है, जबकि धान की खेती का क्षेत्र 42 प्रतिशत बढ़ गया है और यह राज्य के 62 प्रतिशत जल संसाधनों की खपत कर रही है।
फसल विविधीकरण को बताया गया अहम
श्री कोंडा लक्ष्मण तेलंगाना बागवानी विश्वविद्यालय के कुलपति दंडा राजी रेड्डी ने भी धान पर अत्यधिक निर्भरता को खतरनाक बताते हुए बागवानी और अन्य फसलों की ओर रुख करने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि राज्य के करीब 1.3 करोड़ एकड़ फसल क्षेत्र में से अधिकांश धान के अंतर्गत है।
महिलाओं और छोटे किसानों की भूमिका
वी. रुक्मिणी राव, निदेशक, ग्राम्य रिसोर्स सेंटर फॉर वुमेन, ने कहा कि कृषि कार्यबल में 60-70 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली महिलाओं को औपचारिक रूप से किसान का दर्जा मिलना चाहिए ताकि उन्हें संस्थागत ऋण और सरकारी लाभ मिल सकें। हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के सेवानिवृत्त अर्थशास्त्र प्रोफेसर डी. नरसिम्हा रेड्डी ने नीतियां बनाते समय छोटे और सीमांत किसानों को केंद्र में रखने पर ज़ोर दिया।




