
FTA के तहत यूरोपीय संघ को भारत में अधिकतम 50,000 टन सेब का कोटा निर्धारित किया गया है। – फोटो : AI Image
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भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) यानी मुक्त व्यापार समझौते के लागू होने के बाद यूरोपीय सेब भारत में सस्ते हो जाएंगे। साथ ही, घरेलू सेब उत्पादकों की रक्षा के लिए मजबूत सुरक्षा कवच भी रखा गया है। FTA के तहत यूरोपीय संघ को भारत में अधिकतम 50,000 टन सेब का कोटा निर्धारित किया गया है, जिसे 10 वर्षों में बढ़कर 1 लाख टन कर दिया जाएगा। यूरोप से आयात होने वाले सेब पर 20% शुल्क लगेगा, जो अभी 50 फीसदी है। साथ ही, न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) ₹80 प्रति किलो तय किया गया है। इससे सेब की प्रभावी लैंडेड लागत लगभग ₹96 प्रति किलो रहेगी। वाणिज्य मंत्रालय के सूत्रों ने कहा कि यह व्यवस्था घरेलू मूल्य स्थिरता बनाए रखेगी, किसानों की आय की रक्षा करेगी और स्थानीय सेबों की बाजार स्थिति को मजबूत रखेगी।आयात में कोई बड़ा उछाल नहीं
सूत्रों के अनुसार, 50,000 टन का कोटा वर्तमान आयात स्तर के अनुरूप है। इससे कुल सेब आयात में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं होगी और ज्यादातर आयात मौजूदा स्रोतों की जगह लेगा। वर्ष 2024 में भारत ने करीब 5 लाख मीट्रिक टन सेब आयात किए थे, जिसमें ईरान (1,33,447 टन, 25.7%), तुर्की (1,16,680 टन, 22.5%), अफगानिस्तान (42,716 टन, 8.2%) और EU (56,717 टन, 11.3%) प्रमुख स्रोत थे।
भारतीय सेब को EU में शून्य शुल्क
FTA के तहत भारतीय सेब को यूरोपीय बाजार में 5 से 7 वर्षों में शून्य शुल्क की सुविधा मिलेगी, जिससे देश के सेब उत्पादकों को प्रीमियम सेगमेंट में नए अवसर मिलेंगे। वाणिज्य मंत्रालय के सूत्रों ने इसे संतुलित और पारस्परिक व्यापार परिणाम बताया, जो किसानों की आजीविका की रक्षा के साथ नए अवसर भी खोलेगा।
सरकार का संतुलित रुख
जुलाई 2025 में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि वर्तमान में न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) ₹50, 50% आयात शुल्क और अन्य शुल्कों के कारण सेब ₹75-80 प्रति किलो पर आयात हो रहे हैं। लैंडिंग, मार्केटिंग, ब्रांडिंग, परिवहन और वितरण के बाद खुदरा मूल्य ₹125-150 प्रति किलो पहुंच जाता है। उन्होंने कहा कि सरकार किसानों की चिंताओं के साथ 140 करोड़ उपभोक्ताओं की मांग को संतुलित रखेगी।
महंगे सेब से मांग घट सकती है। भारत की कुल सेब उत्पादन मांग से कम है, इसलिए 4.5-5 लाख टन आयात जरूरी है। सरकार कोल्ड चेन विकसित कर कृषि निर्यात को बढ़ावा दे रही है।यह व्यवस्था किसानों की आय और मूल्य स्थिरता की रक्षा करते हुए उपभोक्ताओं को सस्ता विकल्प उपलब्ध कराने का संतुलित प्रयास है।




