IRRI के अध्ययन में खुलासा : जल संकट और जलवायु दबाव के बीच DSR तकनीक से संवर सकती है धान की खेती

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IRRI के अध्ययन में खुलासा : जल संकट और जलवायु दबाव के बीच DSR तकनीक से संवर सकती है धान की खेती

डीएसआर मशीन से धान की सीधी बुवाई।
– फोटो : गांव जंक्शन

विस्तार


भारत में धान की खेती बढ़ते जल संकट, कृषि मजदूरी की बढ़ती लागत और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से जूझ रही है। पारंपरिक रोपाई आधारित धान प्रणाली (TPR) अत्यधिक पानी और श्रम पर निर्भर है, जबकि सूखी डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) एक व्यवहारिक और टिकाऊ विकल्प के रूप में उभर रही है।DSR पर लक्षित निवेश क्यों जरूरी
अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान (IRRI) द्वारा भारतीय अनुसंधान संस्थानों के सहयोग से किए गए अध्ययन में बताया गया है कि DSR अनुसंधान में लक्षित निवेश से पानी की कमी और श्रम लागत जैसी चुनौतियों का समाधान संभव है। इस शोध को जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) का समर्थन प्राप्त है, जो भारत की जलवायु-सहिष्णु कृषि के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

किस्मों की विश्वसनीयता बनी बड़ी चुनौती
IRRI की धान प्रजनक पल्लवी सिन्हा के अनुसार, अब तक DSR को सीमित अपनाने का मुख्य कारण यह रहा है कि लोकप्रिय धान किस्में सीधे बुवाई के लिए विकसित नहीं की गई थीं। उन्होंने कहा कि किसान तभी DSR अपनाएंगे, जब यह हर साल भरोसेमंद परिणाम दे सके।

नई किस्मों पर शोध और बेहतर नतीजे
नए शोध में व्यापक रूप से उगाई जाने वाली धान किस्मों को DSR के अनुकूल बनाने पर जोर दिया गया है, ताकि वे तेजी से अंकुरित हों, मजबूत वृद्धि करें और कीट व रोगों के प्रति सहनशील रहें। कई मौसमों में किए गए खेत परीक्षणों में DSR पद्धति से उगाई गई शीर्ष किस्मों ने लगभग 15 प्रतिशत अधिक उपज दी, साथ ही पारंपरिक रोपाई में भी अच्छा प्रदर्शन किया।

किसानों को लचीलापन और सुरक्षा
IRRI के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय प्रजनन प्रमुख विकास के. सिंह ने कहा कि किसानों को नई प्रणाली अपनाने के लिए मजबूर किए बिना, उनकी भरोसेमंद किस्मों को DSR के अनुकूल बनाना जरूरी है। इससे किसान कम पानी और श्रम में अधिक उत्पादन हासिल कर सकेंगे।

जलवायु लक्ष्यों से सीधा जुड़ाव
वैज्ञानिकों के अनुसार, DSR का विस्तार भारत की वैश्विक जलवायु प्रतिबद्धताओं, जैसे उत्सर्जन तीव्रता घटाने और जल उपयोग दक्षता बढ़ाने, से सीधे जुड़ा है। DBT के वैज्ञानिक संजय कालिया ने कहा कि DSR तकनीक धान की खेती की सोच को बदलेगी और भविष्य में धान को गेहूं की तरह उगाने की दिशा में ले जाएगी।

खेती का टिकाऊ भविष्य
विशेषज्ञों का मानना है कि DSR के लिए तैयार किस्मों को बड़े पैमाने पर अपनाने से सिंचाई की जरूरत कम होगी, किसानों की आय बढ़ेगी और धान खेती का कार्बन फुटप्रिंट घटेगा। चूंकि कई नई किस्में राष्ट्रीय परीक्षण चरण में पहुंच चुकी हैं, इसलिए इसके लाभ जल्द ही किसानों के खेतों में दिख सकते हैं।