
चना की फसल में कई रोगों के प्रकोप का खतरा।
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देश की प्रमुख दलहनी फसल चने की खेती करने वाले किसानों के लिए यह समय बहुत सावधानी बरतने का है। विशेषज्ञों के अनुसार, चने की फसल में कई तरह के रोगों के संक्रमण का खतरा बना रहता है, जो पूरी मेहनत पर पानी फेर सकता है। चने की फसल में मिट्टी जनित रोगों के फैलने का सबसे बड़ा कारण फसल चक्र की अनदेखी करना है। अक्सर देखा गया है कि किसान एक ही खेत में लगातार चने की फसल लेते हैं, जिससे मिट्टी में मौजूद रोगों का प्रभाव बढ़ जाता है। इससे बचने के लिए खेती के जानकारों ने कुछ विशेष प्रबंधन और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने की सलाह दी है।फसल चक्र और गहरी जुताई से मिटेंगे रोगों के बीजाणु
मिट्टी जनित रोगों से निपटने के लिए सबसे कारगर तरीका खेत की तैयारी के समय ही शुरू हो जाता है। जानकारों का कहना है कि किसानों को गर्मियों के दौरान खेत की गहरी जुताई जरूर करनी चाहिए। ऐसा करने से पुरानी फसल के अवशेषों में छिपे कीट और फफूंद के बीजाणु सीधे सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आकर नष्ट हो जाते हैं। इसके साथ ही फसल को रोगों से बचाने के लिए फसल चक्र अपनाना बेहद जरूरी है। यदि किसान हर दूसरे साल चने की जगह अलग-अलग रबी फसलों की बुवाई करें, तो मिट्टी जनित रोगों के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
उकठा रोग के लिए ट्राइकोडर्मा और बीज उपचार का नुस्खा
चने की फसल में उकठा रोग का संक्रमण काफी घातक होता है। इसकी रोकथाम के लिए विशेषज्ञों ने जैविक और रासायनिक दोनों तरीकों के मेल का सुझाव दिया है। किसान सिंचाई से पहले 100 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद में 10 किलो ट्राइकोडर्मा मिलाकर एक हेक्टेयर खेत में समान रूप से फैला सकते हैं। इसके अलावा बीज उपचार को सुरक्षा कवच की तरह अपनाना चाहिए। बीजों को कार्बेन्डाजिम की 2 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करने पर मिट्टी जनित रोगों से सुरक्षा मिलती है। विशेषज्ञों ने ‘पूसा चना मानव’ जैसी प्रतिरोधी किस्में अपनाने पर जोर दिया है, जिसकी औसत उपज 2.5 टन प्रति हेक्टेयर तक होती है।
जड़ और तना गलन से बचाव के लिए प्रबंधन है जरूरी
चने में जड़ सड़न और तना गलन जैसे रोग भी पौधों को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। इन रोगों में पौधों की जड़ें गलने लगती हैं और पौधा सूख जाता है। जानकारों के अनुसार, तना गलन का खतरा अधिक नमी और ऊंचे तापमान में बढ़ जाता है। इससे बचाव के लिए खेत में फसल के अवशेष बिल्कुल न छोड़ें और संक्रमित पौधों को तुरंत उखाड़कर खेत से बाहर जला दें। रासायनिक उपचार के तौर पर कार्बेन्डाजिम का 0.2% घोल बनाकर पौधों की जड़ों के पास छिड़काव करना प्रभावी रहता है। वहीं तना गलन के मामले में बुवाई के 50-60 दिन बाद कार्बेन्डाजिम और मैन्कोजेब का छिड़काव करने की सलाह दी गई है।
अंगमारी रोग और जल निकासी पर ध्यान दें
ठंडे इलाकों में अक्सर चने की फसल में अंगमारी रोग देखा जाता है, जो फफूंद के कारण फैलता है। इससे बचने के लिए किसान ‘पूसा 3022’ जैसी उन्नत प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव कर सकते हैं। बुवाई से पहले कार्बेन्डाजिम और मैन्कोजेब से बीज उपचारित करना और संक्रमण दिखने पर कार्बेन्डाजिम के घोल का छिड़काव करना फायदेमंद रहता है। अंत में, विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि खेती के दौरान मिट्टी में जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि खेत में जरूरत से ज्यादा नमी रोगों को न्योता देती है। इन सावधानियों को अपनाकर किसान अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं।




