
पिछले दो वर्षों में ब्राजील से कपास आयात में साल-दर-साल 1000% से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। – फोटो : सोशल मीडिया
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ब्राजील और अमेरिका से बढ़ते कपास आयात को लेकर संसद में सवाल उठाए गए हैं। कर्नाटक के रायचूर से सांसद कुमार नाइक ने बढ़ते कपास आयात का मुद्दा लोकसभा में उठाया है। नाइक ने कहा कि दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कपास उत्पादक देश होने के बावूजद भारत के किसान अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं।सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए नाइक ने कहा कि पिछले दो वर्षों में ब्राजील से कपास आयात में साल-दर-साल 1000% से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। जबकि, इसी अवधि में अमेरिका से आयात में 200% वृद्धि दर्ज की गई। नाइक ने कहा कि गिरती कीमतें, बढ़ती इनपुट लागत और नीतिगत अनिश्चितता किसानों की परेशानी बढ़ा रही है। उनका तर्क था कि अगर यह रुझान जारी रहा तो भारत आयात पर निर्भर हो सकता है, जिससे दीर्घकालिक कृषि सुरक्षा प्रभावित होगी।
सरकार ने कहा – किसानों को MSP और खरीद से सुरक्षा
टेक्सटाइल मंत्री गिरिराज सिंह ने जवाब में कहा कि केंद्र सरकार किसानों के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिशों के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय किया जाता है और किसानों को उत्पादन लागत का कम से कम 1.5 गुना मूल्य सुनिश्चित किया जाता है। वर्ष 2025-26 सीजन के लिए कपास का MSP गुणवत्ता के आधार पर 7,710 से 8,110 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है, जो पिछले वर्ष से 589 रुपये अधिक है।
सिंह ने यह भी जानकारी दी कि 11 कपास उत्पादक राज्यों के 149 जिलों में 571 खरीद केंद्र खोले गए हैं और अब तक 90.5 लाख गांठों की खरीद की जा चुकी है। आयात नीति पर उन्होंने कहा कि अगस्त से दिसंबर 2025 के बीच 11% ड्यूटी में छूट दी गई थी, जिसे जनवरी 2026 में फिर से लागू कर दिया गया।
US-बांग्लादेश ट्रेड डील का क्या होगा असर
अमेरिका और बांग्लादेश के बीच हुए ट्रेड समझौते ने भारतीय कपास बाजार में नई बहस छेड़ दी है। किसानों के हितों के प्रभावित नहीं होने के दावों के बावजूद किसान संगठनों की आशंका है कि यदि बांग्लादेश अमेरिकी कपास को प्राथमिकता देता है तो भारतीय निर्यात प्रभावित हो सकता है।
हालांकि, ऑल इंडिया कॉटन ब्रोकर्स एसोसिएशन के पदाधिकारी अनिल थानवी ने कहा कि इस डील से भारतीय कपास कीमतों पर असर नहीं पड़ेगा और CCI किसानों से अच्छे दाम पर खरीद कर रही है। उनका तर्क है कि यूरोप समेत अन्य बाजारों में भारत के लिए अवसर खुले हैं।
कपास उत्पादक क्षेत्रों पर प्रभाव
किसान नेता और कृषि अर्थशास्त्री विजय जावंधिया कहते हैं कि यदि बांग्लादेश से मांग घटती है तो इसका असर सीधे कपास उत्पादक क्षेत्रों और किसानों पर पड़ेगा। उन्होंने लागत बढ़ने और नई तकनीक की कमी को बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि किसान अब भी BG-2 जैसे बीजों पर निर्भर हैं। साथ ही, खेती में यांत्रिकीकरण की कमी से वैश्विक प्रतिस्पर्धा मुश्किल हो रही है।
एक्सपोर्ट पर इंडस्ट्री की राय
कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CAI) के अध्यक्ष विनय एन कोटक के अनुसार, भारत की भौगोलिक नजदीकी उसकी बड़ी ताकत है। जहां अमेरिका से बांग्लादेश तक सप्लाई में 45 दिन लगते हैं, वहीं भारत से यह आपूर्ति लगभग 8 दिन में हो जाती है। उन्होंने बताया कि बांग्लादेश के रेडीमेड गारमेंट्स निर्यात का 25% हिस्सा अमेरिका और 50% यूरोप को जाता है, जहां भारतीय कपास की मांग बनी हुई है।
CCI का कहना है बांग्लादेश की कुल मांग बढ़ती है तो भारत से आयात भी स्वाभाविक रूप से बढ़ सकता है। हालांकि, विशेषज्ञ अतुल गणात्रा ने आशंका जताई कि 18% टैरिफ छूट के चलते बांग्लादेश अमेरिकी और ब्राजीलियाई कपास की ओर झुक सकता है। ब्राजील से कपास 68-69 सेंट प्रति पाउंड की दर पर उपलब्ध है, जो भारतीय कीमतों से सस्ती है। उन्होंने यह भी कहा कि 2025-26 सीजन के लिए 15 लाख गांठ निर्यात अनुमान घटकर 10 लाख गांठ रह सकता है, जबकि जनवरी अंत तक 6 लाख गांठ ही निर्यात हो पाई है।
घरेलू सुरक्षा बनाम वैश्विक दबाव
कपास सेक्टर फिलहाल तीन मोर्चों पर दबाव झेल रहा है, जिसमें बढ़ता आयात, वैश्विक ट्रेड डील्स का असर, घरेलू लागत और तकनीकी पिछड़ापन शामिल है। वहीं, सरकार MSP और खरीद तंत्र के जरिए सुरक्षा का भरोसा दे रही है, जबकि उद्योग लॉजिस्टिक्स और बाजार विविधीकरण को ताकत मान रहा है।
दूसरी ओर, कुछ विशेषज्ञ सस्ते वैश्विक विकल्पों और निर्यात में संभावित गिरावट को लेकर चेतावनी दे रहे हैं। कुल मिलाकर, भारतीय कपास बाजार का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि घरेलू नीति समर्थन, निर्यात प्रतिस्पर्धा और वैश्विक व्यापार संतुलन के बीच कैसे तालमेल बैठाया जाता है।




