किसान के काम की बात : फरवरी में टमाटर की खेती के 2 स्मार्ट तरीके, गर्मियों में होगी जबरदस्त कमाई

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टमाटर की खेती – फोटो : सोशल मीडिया

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फरवरी में तैयार की गई टमाटर की फसल मई-जून तक बाजार में पहुंचने लगती है, जब आपूर्ति कम और मांग ज्यादा होती है। यही वजह है कि इस दौर में किसानों को फसल का कई गुना बेहतर दाम मिल सकता है। खास बात यह है कि टमाटर की खेती ज्यादा जटिल नहीं है और सीमित जमीन में भी अच्छा उत्पादन दिया जा सकता है।

नर्सरी से करें शुरुआत
खेती की शुरुआत नर्सरी से होती है, जहां बीज बोने के करीब एक महीने बाद पौधे रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं। आजकल किसान हाइब्रिड किस्मों की ओर ज्यादा रुझान दिखा रहे हैं, क्योंकि इनसे पैदावार ज्यादा और रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होती है। अच्छी मिट्टी, समय पर सिंचाई और संतुलित खाद प्रबंधन से फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों में बढ़ोतरी होती है।

फरवरी में करें तैयारी
अच्छी पैदावार के लिए फरवरी में नर्सरी तैयार कर 25-30 दिन में पौधों की रोपाई कर देनी चाहिए। बीज बोने के 2-3 महीने बाद उत्पादन शुरू हो जाता है। पारंपरिक किस्मों के बजाय हाइब्रिड टमाटर चुनने से पैदावार और गुणवत्ता दोनों बेहतर मिलती हैं।

खेत की तैयारी कैसे करें?
टमाटर के लिए समतल और उपजाऊ खेत जरूरी है। रोपाई से पहले 3-4 बार जुताई कर मिट्टी भुरभुरी बनाएं। अंतिम जुताई में गोबर की खाद या कम्पोस्ट मिलाएं, ताकि पौधों को भरपूर पोषण मिले और फल बड़े, चमकदार हों।

टमाटर की खेती के दो प्रभावी तरीके
खेती की पद्धति के अनुसार मुनाफा भी बदलता है। जहां पारंपरिक तरीके से टमाटर उगाने पर फसल एक साथ मिलती है, वहीं बेल या झालर विधि अपनाने से कई महीनों तक लगातार तुड़ाई संभव होती है। इससे किसान एक ही खेत से लंबे समय तक आमदनी ले सकते हैं।

  • 1- साधारण (टर्मिनेट) विधि : पौधे सीधे खेत में लगाए जाते हैं। 3–4 महीने में एक साथ फल मिलते हैं।
  • 2- झालर/बेल (इंटर्मिनेट) विधि : बांस और तार के सहारे पौधे ऊपर चढ़ाए जाते हैं। 6 महीने या उससे अधिक समय तक लगातार तुड़ाई मिलती है, जिससे कुल उत्पादन और कमाई बढ़ती है।

लागत-मुनाफा और सरकारी मदद
साधारण विधि से एक बीघे में लगभग ₹12-15 हजार की लागत आती है। झालर विधि या नेट/पॉली हाउस में खर्च अधिक होता है, लेकिन ऑफ-सीजन बिक्री से लाखों रुपये प्रति बीघा तक की कमाई संभव है। ऑफ-सीजन उत्पादन के लिए नेट हाउस, पॉली हाउस और ग्रीन हाउस तकनीक तेजी से अपनाई जा रही है। इन पर कृषि विभाग की ओर से अनुदान भी मिलता है।