Oilmeal Export: 10 महीने में 4 लाख टन घटा खली निर्यात, किसानों और प्रोसेसिंग इंडस्ट्री की बढ़ी चिंता

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Oilmeal Export: 10 महीने में 4 लाख टन घटा खली निर्यात, किसानों और प्रोसेसिंग इंडस्ट्री की बढ़ी चिंता

सोयाबीन और सरसों खली निर्यात में तेज गिरावट – फोटो : गांव जंक्शन

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भारत के तिलहन प्रोसेसिंग और पशु आहार उद्योग के लिए जनवरी 2026 निराशाजनक रहा। Solvent Extractors’ Association of India (SEA) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी में देश के ऑयलमील यानी खली निर्यात में सालाना आधार पर 42% की तेज गिरावट दर्ज की गई। कुल निर्यात घटकर 2,60,123 टन रह गया, जबकि पिछले साल जनवरी में यह 4,52,352 टन था। गिरावट की मुख्य वजह सोयाबीन मील और सरसों (रेपसीड) मील की कमजोर शिपमेंट रही।

सोयाबीन और सरसों खली निर्यात में तेज गिरावट
जनवरी 2026 में सोयाबीन खली का निर्यात घटकर 1,32,440 टन रह गया, जो एक साल पहले 2,86,287 टन था। इसी तरह सरसों मील का निर्यात 1,31,641 टन से गिरकर 64,782 टन पर आ गया। मूंगफली खली का निर्यात भी 2,636 टन से घटकर सिर्फ 1,067 टन रह गया।

10 महीने में 4 लाख टन कम हुआ कुल निर्यात
अप्रैल से जनवरी 2025-26 के दौरान कुल ऑयलमील निर्यात 36 लाख टन से घटकर 32 लाख टन रह गया, यानी 10 महीनों में 4 लाख टन की गिरावट दर्ज हुई।
ऑयलमील मुख्य रूप से पशु आहार में इस्तेमाल होता है, इसलिए निर्यात में कमी प्रोसेसिंग उद्योग और किसानों दोनों के लिए चिंता का संकेत है।

क्रशिंग धीमी, नई फसल का इंतजार
SEA के मुताबिक, सरसों मील निर्यात में गिरावट की बड़ी वजह घरेलू स्तर पर पेराई (क्रशिंग) गतिविधियों का सुस्त रहना है। कई प्रोसेसर फरवरी-मार्च में आने वाली नई फसल का इंतजार कर रहे हैं। कांडला पोर्ट पर सरसों मील की कीमत जनवरी में 20,300 रुपये प्रति टन रही, जो नवंबर-दिसंबर 2025 के 18,500 रुपये प्रति टन से अधिक, लेकिन जनवरी के उच्च स्तर 21,617 रुपये से कम रही।

अंतरराष्ट्रीय कीमतों से मिली सीमित बढ़त
डॉलर के लिहाज से कांडला पर भारतीय सरसों खली 235 डॉलर प्रति टन रही, जबकि हैम्बर्ग में यूरोपीय संघ की मील कीमत 276 डॉलर प्रति टन रही। कीमतों का अंतर भारतीय निर्यातकों को कुछ प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त देता है, लेकिन कमजोर मांग का असर बना रहा।

राइसब्रान खली ने दिखाया बेहतर प्रदर्शन
जहां ज्यादातर ऑयलमील में गिरावट रही, वहीं राइसब्रान एक्सट्रैक्शन मील का निर्यात जनवरी में बढ़कर 35,367 टन पहुंच गया, जबकि पिछले साल यह सिर्फ 63 टन था।
भारतीय ऑयलमील के प्रमुख खरीदारों में चीन, दक्षिण कोरिया, बांग्लादेश और जर्मनी शामिल हैं।