Maize Types: एक फसल, अनेक रूप, मक्के की इन 6 किस्मों की पूरी कुंडली, जो हर किसान को जाननी चाहिए…

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Maize Types: एक फसल, अनेक रूप, मक्के की इन 6 किस्मों की पूरी कुंडली, जो हर किसान को जाननी चाहिए...

मक्के के 6 रूप। – फोटो : AI

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मक्का अलग-अलग किस्मों की शक्ल में खाद्य प्रसंकरण से इथेनॉल उत्पादन और पशु आहार उद्योग तक में अपनी जगह बना चुका है। बीते कुछ सालों में किसानों का रुझान तेजी से मक्के की ओर बढ़ा है। वहीं, बाजार भाव ने भी किसानों को इस फसल की ओर आकर्षित किया है। किसान बाजार के मिजाज और स्थानीय जलवायु का ध्यान में रखते हुए मक्के की 6 किस्मे उगा सकते हैं।

डेंट कॉर्न पोल्ट्री फीड और इथेनॉल उद्योग की पहली पसंद
हमारे देश के मक्का बाजार में डेंट कॉर्न का दबदबा है। उगाए जाने वाले कुल मक्के में इसका हिस्सा सबसे ज्यादा है।  डेंट कॉर्न भी कई तरह की होती है, हालांकि भारत में पीला डेंट मक्का का उपयोग इथेनॉल से लेकर पोल्ट्री दाने के उत्पादन तक में किया जाता है।
इसकी हाइब्रिड किस्में जैसे HQPM-1 प्रति हेक्टेयर 5 से 8 टन तक पैदावार दे सकती हैं।

स्वीट कॉर्न का शहरों में क्रेज
बीते कुछ सालों में शहरों में स्वीट कॉर्न की मांग काफी बढ़ी है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग से लेकर रेस्टोरेंट और ठेले पर स्वीट कार्न का उपयोग कई व्यंजनों को बनाने में होता है, जैसे पिज्जा, बर्गर आदि। इसके स्वास्थ्य से जुड़े फायदों को देखते हुए शहरों में स्वीट कॉर्न की खपत नास्ते के रूप में भी हो रही है। स्वीट कॉर्न महज 70 से 85 दिनों में तैयार हो जाता है। 

पॉपकॉर्न देता है कम समय में कमाई का मौका
स्नैक्स के बाजार में पॉपकॉर्न की भारी मांग है। इसके दानों की ऊपरी परत काफी सख्त होती है, जो गर्म करने पर अंदर की नमी के कारण फूल जाती है। VL पॉपकॉर्न जैसी किस्में खरीफ सीजन के लिए बेहतरीन हैं। यह फसल 70 से 90 दिनों में पक जाती है। इसकी औसत पैदावार 3 से 5 टन प्रति हेक्टेयर रहती है।

फ्लिंट कॉर्न पहाड़ी और जनजातीय क्षेत्रों तक सीमित
फ्लिंट कॉर्न का जुड़ाव पहाड़ी और जनजातीय क्षेत्रों से है। कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और राजस्थान संग इसकी खेती उत्तराखंड और सिक्किम जैसे इलाकों में होती है। इसके दाने काफी कठोर और चमकदार होते हैं। इसका अधिकतर उपयोग  भोजन, सजावट और पशु आहार में किया जाता है।

फ्लोर कॉर्न नरम स्टार्च और बेहतरीन रोटी
फ्लोर कॉर्न की खेती भारत में बहुत सीमित है। नागालैंड, मणिपुर और पहाड़ी इलाकों में यह उगाया जाता है। इसका उपयोग मुख्य रूप से रोटी और दलिया बनाने के लिए होता है।  इसके दाने काफी नरम हैं जो आसानी से बारीक आटे में बदल जाते हैं, जबकि डेंट या फ्लिंट जैसे सख्त दाने नहीं होते। यह पारंपरिक खाने के लिए बहुत पसंद किया जाता है।

पॉड कॉर्न का प्राचीन और सांस्कृतिक महत्व
मक्के की दुनिया में पॉड कॉर्न काफी दुर्लभ और प्राचीन किस्म है। इसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि इसके हर एक दाने पर एक अलग और सख्त छिलका होता है, जो इसे देखने में किसी सजावटी वस्तु जैसा बनाता है। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों, विशेषकर मणिपुर और नागालैंड के जनजातीय इलाकों में इसका गहरा महत्व है, जहां इसे त्योहारों और धार्मिक अनुष्ठानों में विशेष चढ़ावे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन, आम किसानों के लिए यह फसल व्यावसायिक रूप से फायदेमंद नहीं है, क्योंकि इसकी पैदावार प्रति हेक्टेयर 2 टन से भी कम होती है। दानों पर मौजूद सख्त छिलकों के कारण इसे न तो भोजन के रूप में खाया जा सकता है और न ही यह पशुओं के चारे के लिए उपयुक्त है। यही वजह है कि आज इसे केवल सजावट, जैव विविधता के संरक्षण और आनुवंशिक शोध के उद्देश्यों से ही सुरक्षित रखा जा रहा है।