डिजिटल डेस्क,चेन्नई। मद्रास उच्च न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर ताजा टिप्पणी की है। उन्होंने अपनी टिप्पणी में कहा कि किसी मौजूदा जज पर हमला करने के लिए अभद्र, अपमानजनक या जाति-आधारित भाषा का इस्तेमाल करना फ्री स्पीच के दायरे में नहीं आता है।
मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि किसी कानूनी फैसले की आलोचना करने और उस फैसले को देने वाले जज पर हमला करने के बीच एक कानूनी अंतर साफ है।
पुलिस को दिया सख्त आदेश
अदालत ने तमिलनाडु पुलिस को यह भी निर्देश दिया कि वे किसी ऐसी सार्वजनिक सभा या मार्च को अनुमति न दें, जिसका मकसद किसी मौजूदा जज को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाना, बदनाम करना या डराना-धमकाना हो।
जनहित याचिका पर कोर्ट ने जारी किया आदेश
मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की बेंच ने ये आदेश जारी किया है। ये सुनवाई आर. कार्तिकेयन की ओर से दायर एक पीआइएल पर की जा रही थी। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि ‘तमिलनाडु तौहीद जमात’ और ‘तमिलनाडु मुस्लिम मुनेत्र कझगम’ जैसे संगठनों को न्यायिक कार्यवाही से जुड़े प्रदर्शन करने और संवैधानिक अदालतों व मौजूदा जजों को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने से रोका जाए।
कार्यक्रम रोकने का आदेश
कोर्ट ने कहा कि अगर किसी प्रकार से अनुमति लेकर सभा को व्यक्तिगत हमले में बदला जाए तो संबंधित अधिकारियों को तुरंत उस कार्यक्रम को समाप्त करने का अधिकार है और उचित कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए।
क्या है विवाद
यह विवाद 25 जून को अदालत की मदुरै बेंच के एक फैसले से शुरू हुआ। इस फैसले में तमिलनाडु सरकार के 2024 के एक सरकारी आदेश को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया था। इस सरकारी आदेश के तहत, पिछड़े वर्गों, अति पिछड़े वर्गों, विमुक्त समुदायों या अनुसूचित जातियों से इस्लाम धर्म अपनाने वाले लोगों को ‘पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम)’ समुदायों के लिए राज्य के 3.5% आरक्षण का लाभ लेने की अनुमति दी गई थी।
मुस्लिम संगठनों ने जताया विरोध
इसी मामले पर याचिका दायर की गई थी। याचिकाकर्ता के अनुसार, इसके बाद राज्य भर में कई मुस्लिम संगठनों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए। शिकायतकर्ता ने कहा कि ये प्रदर्शन जल्द ही अपमानजनक अभियानों में बदल गए, जिनका निशाना डिवीजन बेंच के एक मौजूदा जज थे।
