उत्तर प्रदेश की होली अपनी अलग तरह की होली के लिए दुनिया में प्रसिद्ध है। यहां होली केवल गुलाल उड़ाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह लोक संस्कृति के उन रंगो को देखने का नजरिया है जो सदियों से चले आ रहे हैं। प्रदेश की होली में कृष्ण और राधा के प्रेम, प्रहलाद की भक्ति और लोक गीतों की मिठास जुड़ी है। ब्रज की गलियों से लेकर अवध के दरबारों तक, होली के हर रंग में एक गहरा आध्यात्मिक और सामाजिक अर्थ छिपा होता है, जो इसे देश के अन्य हिस्सों से बिल्कुल अलग बनाता है।
इस प्रदेश में होली का उत्सव हफ्तों पहले शुरू हो जाता है। कहीं लाठियों से मार पड़ती है, तो कहीं फूलों की वर्षा होती है। उत्तर प्रदेश की होली में ‘फाग’ और ‘होरी’ जैसे लोक गीतों की गूंज सुनाई देती है। यहां की होली में हर कोई बस ‘होली है!’ के जयकारे के साथ एक-दूसरे के रंग में रंग जाता है।
मथुरा, वृंदावन और बरसाना की होली सबसे अनोखी है। बरसाना में लट्ठमार होली खेली जाती है, जहां नंदगांव के पुरुष बरसाना की महिलाओं के साथ होली खेलने आते हैं और महिलाएं प्रतीकात्मक रूप से उन पर लाठियां बरसाती हैं। वहीं, वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में फूलों की होली खेली जाती है, जो शुद्धता और प्रेम का प्रतीक है।
काशी की ‘मसान’ होली
वाराणसी में होली का एक अतरंगी रूप देखने को मिलता है। यहां महाश्मशान पर चिता भस्म से होली खेली जाती है। मान्यता है कि भगवान शिव अपने गणों के साथ यहां होली खेलते हैं। यह जीवन और मृत्यु के उत्सव को एक साथ दर्शाता है।
अवध की ‘होरी’
लखनऊ और अयोध्या जैसे जगहों में होली बड़े ही शांती और सांस्कृतिक ढंग से मनाई जाती है। यहां ‘फाग’ गाने की परंपरा है और नवाबों के समय से ही इसे हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में मनाया जाता रहा है।
हुरंगा और टेसू के फूल
ब्रज के दाऊजी मंदिर में ‘हुरंगा’ का आयोजन होता है, जो लट्ठमार होली का ही एक अधिक आक्रामक और आनंदमयी रूप है। इसके अलावा, पारंपरिक रूप से यूपी में टेसू यानी पलाश के फूलों से प्राकृतिक रंग बनाने की परंपरा रही है, जो स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद मानी जाती है।
प्रयागराज में होली सामान्य होली से काफी अलग और बहुत ज्यादा जोश‑भरी रहती है, खास तौर पर लोकनाथ, दारागंज, मुट्ठीगंज और चौक इलाकों में। यहां लोकनाथ से शुरू होकर चौक‑थेठेरी बाजार तक लोग जमकर कपड़े फाड़कर ‘कपड़ा‑फाड़ होली’ खेलते हैं। यूवा एक‑दूसरे के कपड़े फाड़ देते हैं और बिना शर्ट के रंगों और पानी में नाचते रहते हैं। होलिका दहन के बाद भी तीन‑चार दिन तक रंग‑खेल चलता है।
चौक और लोकनाथ के इलाकों में लोग नाकाबंदी करके रंगों वाले पानी से भरे टैंकर लगाकर भीड़ पर जमकर पानी डालते हैं, जो आम होली‑सेरेमनी से ज्यादा स्ट्रीट‑फेस्टिवल जैसा लगता है।
यूपी में होली केवल मनोरंजन के लिए बल्कि प्रदेश की परंपराओं को जिंदा रखने का एक तरीका है। इसमें टेसू के फूल, फाग लोकगीत और गुजिया की मिठास का मेल रहता है। प्रदेश में कई तरीके के होली मनाए जाने के कारण यह बाकी देशों में मनाई जाने वाली होली से अलग है।
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की का कहना है कि सिर्फ सर्दी के तीन महीने में रूस ने 14,670 से ज्यादा गाइडेड बम, 738 मिसाइलें और करीब 19,000 अटैक ड्रोन से हमला किया। एक अनुमान के मुताबिक यूक्रेन को रोजाना 200 ड्रोन हमलों का सामना करना पड़ा।
इस बीच यूक्रेन ने लगभग 700 पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलों का उपयोग किया। वहीं ईरान युद्ध के सिर्फ तीन दिन में खाड़ी देशों ने 800 से अधिक PAC-3 पैट्रियट एयर डिफेंस मिसाइलों का इस्तेमाल किया, जबकि लॉकहीड मार्टिन ने पिछले साल 600 मिसाइलों का ही उत्पादन किया था।
आकंड़ा यह साबित करता है कि यूक्रेन अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम पर कम निर्भर है, जबकि खाड़ी देशों की निर्भरता अधिक है। ईरान के शाहेद ड्रोन का इलाज यूक्रेन ने घरेलू स्तर पर ही निकाला था।
चार साल के युद्ध ने यूक्रेन को इतना सीखा दिया है कि वह आज न केवल रूस के अटैक ड्रोन से निपट रहा है, बल्कि उसने इस क्षेत्र में काफी हद तक महारथ भी हासिल कर ली है। आज यूक्रेन दुनिया के अन्य देशों को अपनी ड्रोन रोधी तकनीक बेचने लगा है।
यूक्रेन के सैन्य विशेषज्ञों को पता है कि ईरानी शाहेद ड्रोन से कैसे निपटना है। दरअसल, 2022 से ही रूस की सेना यूक्रेन पर शाहेद-136 ड्रोन से हमला कर रही है। यह ड्रोन उसे ईरान से मिले थे। ईरानी सेना ने रूस को ड्रोन लॉन्च करने के अलावा बनाने की तकनीक भी दी थी। ईरान का शाहेद 136 ड्रोन आठ फुट चौड़ा और 11.5 फुट लंबा होता है। अधिकतम 185 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से उड़ान भर सकता है। 40 किमी गोला बारूद के साथ 1800 से 2400 किमी तक उड़ान भरने में सक्षम है।
अमेरिका-इजरायल हमले के बाद से ईरान संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कुवैत, कतर, बहरीन, ओमान, जॉर्डन और इराक पर सैकड़ों मिसाइल और शाहेद-136 ड्रोन से हमला कर चुका है। इन ड्रोनों को रोकने में खाड़ी देश बेबस हैं। एक सस्ते ड्रोन को रोकने में 27 करोड़ रुपये कीमत की मिसाइल दागनी पड़ती है। कई बार निशाना चुकने पर जमीन पर बड़ा नुकसान उठाना पड़ता है। यही कारण है कि अब खाड़ी देशों ने यूक्रेन से मदद मांगी है।
200 से अधिक सैन्य विशेषज्ञ तैनात
जेलेंस्की के मुताबिक 201 से अधिक यूक्रेनी ड्रोन विशेषज्ञ मध्य पूर्व में तैनात हैं। यह सभी ईरानी ड्रोन को रोकने में स्थानीय सरकारों की सहायता करने में जुटे हैं। जल्द ही 34 नए विशेषज्ञों को तैनात करने की योजना है। इन विशेषज्ञों की तैनाती कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और जॉर्डन में की गई। सभी देशों ने यूक्रेन के साथ समझौता किया है।
हालात से यूक्रेन ने क्या सीखा?
खाड़ी के सभी देश के मुख्य रूप से अमेरिकी डिफेंस पर निर्भर थे। इन देशों ने ड्रोन और मिसाइलों से निपटने की खातिर अपना कोई तंत्र विकसित नहीं किया, जबकि चार साल की जंग में यूक्रेन ने परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढाला। ईरानी और रूसी ड्रोन की न केवल काट निकाली, बल्कि सस्ते फर्स्ट-पर्सन व्यू (एफपीवी) ड्रोन से रूस के भीतर हजारों किमी दूर भारी तबाही भी मचाई। यूक्रेन ने खुद समुद्री ड्रोनों को विकसित किया। काला सागर में आज यूक्रेन ड्रोन रूसी टैंकरों के सबसे बड़े काल बने हैं। इस बीच यूक्रेन ने खुद का ड्रोन इंटरसेप्टर विकसित किया। जेलेंस्की का दावा है कि यूक्रेन के पास रोजाना 2000 इंटरसेप्टर के उत्पादन की क्षमता है।
मोबाइल फायर यूनिट: यूक्रेन ने पिकअप ट्रकों पर मशीनगनों से लैस मोबाइल फायर टीमों को तैयार किया है। यह टीमें आसमान में उड़ने वाले ड्रोन और हवाई खतरे को मिसाइल की तुलना में बेहद कम लागत में रोकने में सक्षम हैं। जेलेंस्की के मुताबिक उसकी सेना ने रूस से आने वाले करीब 90 फीसद ड्रोनों को रोकने में सफलता हासिल की है।
सस्ते ड्रोन इंटरसेप्टर: चार साल के युद्ध ने यूक्रेन को ड्रोन से लड़ने की कला सीखा दी। उसने ‘लाइव टू किल’ इंटरसेप्टर ड्रोन विकसित किए हैं। यह छोटे इंटरसेप्टर होते हैं। जहां एक मिसाइल से एक ड्रोन को मारने में 27 करोड़ रुपये का खर्च आता है। वहीं इंटरसेप्टर ड्रोन महज साढ़े आठ लाख रुपये में ही ड्रोन को तबाह कर सकता है।
अधिक उत्पादन: सबसे कठिन यह है कि PAC-3 पैट्रियट एयर डिफेंस मिसाइलों को लॉकहिड मार्टिन जैसी कंपनी साल में 600 ही यूनिट बना सकती है। वहीं यूक्रेन अपने छोटे इंटरसेप्टर ड्रोन का प्रतिदिन 2000 से अधिक का उत्पादन कर सकता है। खास बात यह है कि इनमें से 50 फीसद इंटरसेप्टर को दूसरे देशों को बेचा जा सकता है।
सस्ते अवरोधक: यूक्रेन की वाइल्ड हॉर्नेट्स जैसी निजी कंपनियों ने काम कीमत वाले क्वाडकॉप्टर विकसित किए हैं। इन्हें ऐसे डिजाइन किया गया है कि यह बेहद तेज रफ्तार में आने वाले ड्रोन से जा भिड़ते हैं। इससे हवा में ही दुश्मन का ड्रोन तबाह हो जाता है।
सॉफ्टवेयर: यूक्रेन ने कई सॉफ्टवेयर प्रोगाम बनाए हैं। फील्ड कमांडरों को आईपैड के माध्यम से रियल टाइम अटैक को ट्रैक करने का डेटा भेजा जाता है।
स्टिंग इंटरसेप्टर यूर्केन का सबसे अहम हथियार है। 2025 में इसने तीन हजार से अधिक रूसी गेरान ड्रोनों को नष्ट किया है। एक ड्रोन की कीमत 2100 डॉलर है। ड्रोन को बुलेट के आकार में डिजाइन किया गया है। ड्रोन 340 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भर सकता है। खास बात यह है कि इसे कोई भी सैनिक एक हाथ से लॉन्च कर सकता है। यह ड्रोन थर्मल इमेजिंग का सहारा लेकर शाहेद 136 ड्रोन का पता लगाता है और उसे तबाह कर देता है।
खाड़ी देशों की मदद क्यों कर रहा यूक्रेन?
कुछ दिन पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कहा था कि उन्हें ईरानी ड्रोन को रोकने की खातिर यूक्रेनी सहायता की जरूरत नहीं है। बाद में उन्होंने कहा कि अगर कोई देश इच्छुक है तो उसका स्वागत है। अब सवाल उठा रहा है कि यूक्रेन खाड़ी देशों की मदद क्यों कर रहा है? इसके पीछे कई वजह हैं। सबसे पहले यह है कि इस रणनीति से खाड़ी देशों में यूक्रेन का प्रभाव बढ़ेगा और रूस की इमेज को धक्का लगेगा, क्योंकि ईरानी ड्रोन में कई पार्ट्स रूसी हैं। इन ड्रोन को उन्नत बनाने में भी रूस ने मदद की है।
अमेरिका ने करीब एक साल से यूक्रेन की आर्थिक मदद रोक रखी है। जेलेंस्की की कोशिश है कि इस सहायता के जरिये खाड़ी देशों से धन जुटाया जा सके, ताकि एयर डिफेंस मिसाइल के अलावा रक्षा क्षेत्र को चलाया जा सके। एक वजह यह भी है कि यूक्रेन के खिलाफ ईरान ने खुलकर रूस की मदद की थी। अब जेलेंस्की चार साल बाद खाड़ी देशों के साथ खड़े होकर तेहरान को साफ संदेश देना चाहते हैं।
देश में गैस की किल्लत का असर अब उन शहरों में दिखने लगा है जहां प्रवासी कामगार रहते हैं। कई शहरों में गैस न मिल पाने के चलते वहां के कामगार ठीक उसी तरह अपने घर लौटने लगे हैं जैसे लॉकडाउन के समय लौटे थे। गुजरात के सूरत में शुक्रवार को कई कामगारों ने बताया कि लंबे समय से गैस नहीं मिल पा रही है और कई फैक्ट्रियां भी बंद हो रही हैं। ऐसे में उन्हें मजबूरन अपने घर लौटना पड़ रहा है। रेलवे स्टेशन पहुंचे कामगारों का कहना है कि कोई भी उनकी मदद नहीं कर रहा है इसलिए वे अपने गांव लौट रहे हैं।
दूसरी तरफ, सरकार की ओर से लगातार दावा किया जा रहा है कि गैस की कोई कमी नहीं है। हालांकि, अब सिर्फ बुकिंग से ही गैस मिल रही है। अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर के जो कामगार छोटे सिलेंडर भरवाते हैं, उन्हें बिल्कुल भी गैस नहीं मिल पा रही है। कालाबाजारी करने वाले लोग इसी का फायदा उठाकर 100 रुपये में मिलने वाली गैस 400 से 500 रुपये में बेच रहे हैं। इसी का नतीजा है कि कई शहरों के कामगार परेशान हो गए हैं और अपने घर लौटने को मजबूर हो रहे हैं। वहीं, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के कई शहरों की गैस आधारित फैक्ट्रियां भी बंद होने लगी हैं।
सूरत स्टेशन पर जुटे लोगों में एक कामगार ने बताया, ‘गांव जा रहे हैं। दो-चार पांच रोज से गैस नहीं मिल रही है। धीरे-धीरे कंपनी भी बंद हो रही है। भूखे मर रहे हैं इसलिए गांव जा रहे हैं, क्या करें? 4-5 दिन से ज्यादा ही दिक्कत हो रही है। 400-500 रुपये लीटर गैस मिल रही है। कोशिश की लेकिन सब अपना-अपना देख रहे हैं। कोई मदद नहीं करता है। कंपनी में कोई आदमी नहीं जा रहा है। अब जब गैस चालू होगी तभी वापस आएंगे।’
एक और महिला सीमा देवी ने बताया, ‘गैस की दिक्कत की वजह से गांव जा रही हूं। पैसे नहीं मिल रहे हैं। 15 दिन से गैस नहीं मिल रही है। पैसे न होने की वजह से अकाउंट भी बंद हो रहा है। एजेंसी से भी नहीं मिल पा रही है। दो बच्चे यहीं छोड़ दिए हैं, मैं और मेरी बेटी जा रहे हैं। कुछ दिन से उपले से गैस बना रहे थे। गली-गली खोजने पर छोटा वाला सिलेंडर भी नहीं भरवा पा रहे हैं।’
बता दें कि कमर्शियल गैस को कम प्राथमिकता मिलने का असर यह हो रहा है कि सेरैमिक, सीमेंट और कांच जैसे उत्पाद बनाने वाली कंपनियां गैस पर आधारित होती हैं। गैस न मिलने की स्थिति में ये कंपनियां बंद हो रही हैं जिसके चलते दिहाड़ी करने वाले लोगों को काम भी नहीं मिल पा रहा है और पैसे की कमी के चलते उन्हें अपने घर लौटना पड़ रहा है।
होली रंगों का त्योहार है। इस दिन घर पर तरह-तरह की मिठाइयां बनती हैं। लोग घर पर दोस्तों और परिजनों के साथ पार्टी करते हैं। इस दिन कई लोग भांग या शराब का सेवन भी करते हैं। अधिक मात्रा में भांग या शराब पीने से सिरदर्द, मतली, उलटी और चक्कर आने की दिक्कत होने लगती हैं। डॉक्टर्स के मुताबिक होली के बाद हैंगओवर होने की समस्या डिहाइड्रेशन की वजह से होती है।
भांग या शराब पीने की वजह से शरीर में पानी और मिनरल्स की कमी हो जाती है जिसके कारण ये दिक्कतें होती हैं। हम आपको कुछ घरेलू नुस्खें बता रहे हैं जिसकी मदद से हैंगओवर की समस्या से राहत पा सकते हैं।
हैंगओवर से राहत पाने के लिए गुनगुने नींबू पानी का इस्तेमाल करें। नींबू में विटामिन सी होता है जो ताजगी महसूस कराता है। इससे सिरदर्द और मतली से भी आराम मिल सकता है। सुबह खाली पेट नींबू पानी पीना फायदेमंद होगा। इससे शरीर भी हल्का महसूस करेगा।
नारियल पानी
नारियल पानी शरीर में पानी की कमी को पूरा करता है। नशीली चीजों को पीने से शरीर डिहाइड्रेटे हो जाता है। नारियल पानी में जरूर मिनरल्स और इलेक्ट्रोलाइट्स मौजूद होते हैं जो शरीर को हाइड्रेटेड रखने में मदद करता है।
हर्बल टी
हर्बल टी हैंगओवर की समस्या से राहत दिलाता है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट की भरपूर मात्रा होती है। साथ ही इसमें कैफीन होता है जो हैंगओवर को कम करता है।
अगर आपको हैंगओवर महसूस हो रहा है तो ज्यादा से ज्यादा मात्रा में पानी पिएं। पानी शरीर से टॉक्सिन को बाहर निकालने का काम करता है। साथ ही शरीर को डिहाइड्रेशन की समस्या को कम करता है।
गुड़ और काली मिर्च
होली पर कुछ लोग भांग का सेवन अधिक मात्रा में कम कर लेते हैं। भांग के हैंगओवर को कम करने के लिए गुड़ और काली मिर्च का सेवन करें। इन दोनों चीजों को खाने से नशा कम होता है।
पोटेशियम वाले फ्रूट्स खाएं
नशीली चीजों को पीने से शरीर में पोटेशियम का लेवल कम हो जाता है। ऐसे में केले का सेवन करें जो पोटेशियम से भरपूर है। साथ ही इलेक्ट्रोलाइट को बनाने में मदद करता है। इसके अलावा आप पपीता भी खा सकते हैं। इससे शरीर में एनर्जी बनी रहेगी।
मार्च महीने का पहला दिन ज्योतिषीय दृष्टि से बहुत खास है। चंद्रमा सिंह राशि में गोचर कर रहे हैं, जो हमें बिना किसी डर के नेतृत्व करने की प्रेरणा देते हैं। साथ ही, आज का मूलांक 1 है जिसका स्वामी बुध है। यह संयोग उन लोगों के लिए शानदार है जो कुछ नया शुरू करना चाहते हैं या कहीं यात्रा की योजना बना रहे हैं।
आज की ऊर्जा हमें पुराने ढर्रे से निकलकर कुछ अलग सोचने और करने के लिए प्रेरित करेगी। आइए जानते हैं कि इस तरह के बदलाव का आपकी राशि पर क्या असर पड़ेगा और आपको किन बातों का ख्याल रखना चाहिए।
ईरान युद्ध अब एक और चरण की तरफ बढ़ रहा है। अगर इसे सही समय पर रोका नहीं गया तो दुनिया सबसे बड़े ऊर्जा संकट के मुहाने पर खड़ी होगी। अभी तक अमेरिका-इजरायल ने सिर्फ ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर हमलों को अंजाम दिया। वहीं जवाबी एक्शन में ईरान ने भी खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इराक में अमेरिकी सैन्य अड्डे के अलावा दूतावास पर हमला किया गया। मगर इजरायल ने पार्स गैस क्षेत्र में हमला करके जंग का एक नया चरण खोल दिया है।
इजरायली सेना ने बुधवार को दुनिया के सबसे बड़े गैस क्षेत्र दक्षिणी पार्स पर हमला किया। यहां कतर के साथ मिलकर ईरान एलएनजी का उत्पादन करता है। एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी से बातचीत करने के बाद इजरायल ने ईरान के गैस क्षेत्र को निशाना बनाया। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान का नियंत्रण है। इसके जवाब में ही ट्रंप ने इजरायल को गैस क्षेत्र में हमले की मंजूरी दी।
दक्षिणी पार्स क्षेत्र में इजरायली हमले का ईरान ने कुछ ही घंटे में जवाब दिया। उसने सऊदी अरब की राजधानी रियाद और कतर के रास लाफान गैस फील्ड पर बैलेस्टिक मिसाइल से हमला किया। कतर प्रशासन के मुताबिक रास लाफान को भारी नुकसान पहुंचा है। ईरान ने कतर के अलावा सऊदी अरब की समरेफ रिफाइनरी और जुबैल पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स, संयुक्त अरब अमीरात के अल-होसन गैस क्षेत्र, कतर के मेसाईद पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स, मेसाईद होल्डिंग कंपनी पर हमले की धमकी दी थी। ईरान के यह हमले दुनिया के सामने सबसे गंभीर वैश्विक ईंधन संकट पैदा कर सकते हैं।
रास लाफान: यह दुनिया का सबसे बड़ी एलएनजी उत्पादन करने वाला क्षेत्र है। कतर की राजधानी से करीब 80 किमी उत्तर-पूर्व में स्थित है। यहां दुनियाभर की करीब 20 फीसद एलएनजी का उत्पादन होता है। यहां पहले से ही उत्पादन बंद है। मगर ताजा हमले से उत्पादन को दोबारा शुरू करने में अधिक समय लगेगा। नतीजा यह होगा कि गैस की कीमतें लंबे समय तक महंगी बनी रह सकती हैं। पूरी क्षमता से उत्पादन करने में कई महीनों का समय लग सकता है। यूरोप की एलएनजी पर अधिक निर्भरता है। खाड़ी देशों पर ईरानी हमलों का असर सीधे यूरोप पर पड़ेगा। तुर्की, जापान और भारत की भी निर्भरता अधिक है।
दक्षिणी पार्स गैस क्षेत्र: यह इलाका करीब 9,700 वर्ग किलोमीटर में फैला है। ईरान के असलूयेह शहर के करीब स्थित यह इलाका दुनिया की सबसे बड़ी गैस फील्ड है। मैदान के तीन हिस्सों पर ईरान का कब्जा है। उत्तर के एक हिस्से पर कतर का नियंत्रण है। ईरान अपनी जरूरत का करीब 75 फीसद प्राकृतिक गैस का उत्पादन यही से करता है। यही कारण है कि इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बहुत अधिक असर पड़ने की उम्मीद नहीं है। हालांकि यहां से कुछ गैस इराक को भेजी जाती है। हमले के बाद ईरान ने यह आपूर्ति रोक दी है। इस कारण इराक में बिजली का उत्पादन प्रभावित हुआ है।
ट्रंप प्रशासन को एक डर भी सता रहा है। अगर ईरान की तेल और गैस सुविधाओं पर ईरान हमला जारी रखता है तो दुनियाभर में ईंधन के दाम बढ़ सकते हैं।
अमेरिका का मानना है कि इन हमलों से ईरान की जनता को नुकसान पहुंचेगा। विद्रोह में उसे ईरानी जनता का साथ चाहिए। मगर हमले के बाद ईरानी जनता नाराज हो सकती है।
अमेरिका चाहता है कि वेनेजुएला की तरह ईरान के तेल और गैस क्षेत्र में उसका प्रभाव हो। युद्ध के बाद वह ईरान के साथ सहयोग चाहता है। अगर हमलों में ईंधन सुविधाओं को निशाना बनाया गया तो दोबारा भारी भरकम निवेश लगेगा।
डर यह भी है कि अपनी तेल सुविधाओं के जवाब में तेहरान खाड़ी के देशों के तेल अवसंरचना पर बड़े हमले कर सकता है। इन्हीं सभी कारणों से ट्रंप प्रशासन ने इजरायल से ईरान की तेल सुविधाओं पर हमला न करने का आग्रह किया।
ईरान की दबाव वाली रणनीति
युद्ध के शुरूआती चरण में ईरान ने खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर मिसाइल और ड्रोन से हमला किया। बहरीन और ओमान समेत कुछ देशों में तेल सुविधाओं पर मामूली हमले किए, ताकि यह संदेश भेजा जा सके कि अगर ईरान पर हमले जारी रहते हैं तो वह आने वाले समय में तेल और गैस सुविधाओं को निशाना बनाएगा। तेल और गैस ही खाड़ी देशों की दुखती रग है। उनकी पूरी अर्थव्यवस्था ही इस पर टिकी है। अगर खाड़ी देशों का तेल ढांचा तबाह होता है तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को बड़ा संकट देखना पड़ सकता है।
पहले नाकाबंदी अब उत्पादन, ईरान के निशाने पर क्या-क्या?
इजरायल और अमेरिका ने जब बमबारी तेज की तो जवाब में ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को रोक दिया। दुनिया के कई देशों पर ऊर्जा संकट खड़ा हुआ और अचानक ईंधन के दाम बढ़ने लगे। अब यहां से ईरान की मंशा के बिना कोई टैंकर नहीं गुजर पा रहा है। दुनियाभर के कई देशों में गैस और तेल का संकट खड़ा हो गया है। ईरान ने होर्मुज पर पाबंदी लगाकर दुनिया को अपनी ताकत का प्रदर्शन किया।
उधर, ट्रंप प्रशासन ईरान के सामने बेबस है। लगातार दबाव बनाया जा रहा है, ताकि होर्मुज को खुलवाया जा सके। चीन, जापान, फ्रांस और यूके तक से मदद मांगी जा चुकी है। मगर ईरान समझ चुका है कि होर्मुज न केवल खाड़ी देशों, बल्कि अमेरिका भी नाजुक नब्ज है। इस पर चोट करके अमेरिका पर युद्ध रोकने का दबाव बनाया जा सकता है। अब ईरान होर्मुज को दबाव के टूल के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है।
होर्मुज खुल भी गया तो कोई फायदा नहीं होगा!
पार्स पर इजरायली हमले के बाद युद्ध का नया चरण खुल चुका है। अगर ईरान की तेल सुविधाओं पर हमले जारी रहते हैं तो जवाबी कार्रवाई में खाड़ी देशों के ईंधन ठिकानों पर तेहरान के हमले तय हैं। यदि यह हमले सफल होते हैं तो दुनियाभर में अभी ऊर्जा आपूर्ति का संकट है। मगर कुछ दिन में यह ऊर्जा उत्पादन का संकट बन जाएगा। ऐसी स्थिति में अगर अमेरिका ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खुलवा भी लिया तो दुनिया को इसका कोई फायदा नहीं होगा, क्योंकि हमलों के कारण खाड़ी देशों में तेल और गैस का उत्पादन ही ठहर जाएगा।
ट्रंप का कयामत का दिन
डोनाल्ड ट्रंप अभी तेल सुविधाओं पर हमले के पक्ष में नहीं है। मगर वह इस विकल्प को ‘कयामत के दिन’ की खातिर बचाकर रखना चाहते हैं। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि अगर ईरान पहले खाड़ी देशों की तेल सुविधाओं पर हमला करता है तो उसका जवाब ईरान की ईंधन सुविधाओं पर हमला करके दिया जाएगा। ट्रंप पहले भी कह चुके हैं कि यदि ईरान ने वैश्विक तेल आपूर्ति को नुकसान पहुंचाया तो उसे 20 गुना अधिक दंड मिलेगा।
मध्य पूर्व में युद्ध के बीच देशभर में प्रीमियम पेट्रोल की कीमतों में 2.35 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। हालांकि अभी रेगुलर पेट्रोल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। नई कीमतें आज से लागू होंगी। भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) के स्पीड, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) के पावर और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड के XP95 पेट्रोल की कीमतों में 2.09 से 2.35 रुपये प्रति लीटर का इजाफा किया गया है।
प्रीमियम पेट्रोल में सामान्य पेट्रोल की तुलना में ऑक्टेन संख्या अधिक होती है। सामान्य पेट्रोल में ऑक्टेन नबंर 87 होता है। वहीं प्रीमियम पेट्रोल में यह 91 या उससे अधिक होता है। यही कारण है कि सामान्य पेट्रोल की तुलना में प्रीमियम पेट्रोल महंगा होता है। सामान्य पेट्रोल की तुलना प्रीमियम पेट्रोल में इंजन अच्छा प्रदर्शन करता है। इसमें कुछ एडिटिव्स और डिटर्जेंट होते हैं। इनका काम इंजन में कार्बन और कचरे को बनने से रोकना है। प्रीमियम पेट्रोल का इस्तेमाल हाई परफॉर्मेंस कारों में होता है, क्योंकि इन कारों के इंजन में अगर कार्बन या कचरा बना तो वह काम करना बंद कर सकता है। रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली कारों में सामान्य पेट्रोल ही डाला जाता है।
आजकल के भागदौड़ भरे जीवन में जिस प्रकार शरीर को रेस्ट देना जरूरी है, उसी प्रकार दिन भर काम कर रहे दिमाग को भी आराम देना बेहद अहम हो जाता है। दिमाग को रेस्ट तभी मिल पाएगा जब व्यक्ति डिजिटल गैजेट जैसे फोन और लैपटॉप से दूरी बनाकर रखेगा। तभी दिमागी शांति की उम्मीद की जा सकती है। डिजिटल गैजेट से डिजिटल डिटॉक्स प्रक्रिया के जरिए किया जा सकता है। आजकल की कॉरपोरेट लाइफ में दिमाग को रेस्ट देना थोड़ा मुश्किल हो गया है, क्योंकि कभी ऑफिस का जरूरी मैसेज आ जाता है तो कभी काम का मेल आ जाता है। जिस वजह से व्यक्ति हर वक्त फोन या लैपटॉप से चिपका रहता है। ज्यादा फोन और लैपटॉप के इस्तेमाल से व्यक्ति का दिमाग हर वक्त कुछ न कुछ सोचता रहता है। साथ ही ज्यादा फोन के इस्तेमाल से व्यक्ति को फोन की लत लग जाती है। इस वजह से लोगों को अपने दिमाग को आराम देने के लिए डिजिटल डिटॉक्स करना चाहिए।
डिजिटल डिटॉक्स हमारे दिमाग के लिए बेहद जरूरी प्रक्रिया है। डिजिटल डिटॉक्स में लोगों को अपने फोन और लैपटॉप से दूरी बनानी होती है। यानी कुल मिलाकर डिजिटल प्लेटफॉर्म से दूरी बनानी होती है ताकि दिमाग को कुछ समय के लिए आराम और शांति मिल सके। अब सवाल उठता है कि दिमाग के आराम के लिए डिजिटल डिटॉक्स क्यों जरूरी है, डिजिटल डिटॉक्स की प्रक्रिया क्या है और डिजिटल डिटॉक्स के फायदे क्या हैं।
डिजिटल डिटॉक्स दिमाग के लिए बेहद जरूरी है क्योंकि हद से ज्यादा फोन चलाने से व्यक्ति को फोन और डिजिटल प्लेटफॉर्म की लत लग जाती है। जेनरेशन Z के कई युवा फोन में रील्स स्क्रॉल करते ही रहते हैं। जिस वजह से दिमाग में लगातार विचार चलते रहते हैं, जिससे दिमाग को रेस्ट नहीं मिलता है। दिमाग को आराम न मिल पाने के कारण दिमाग थक जाता है। दिमाग के थकने के बाद व्यक्ति का काम करने का मन कम हो जाता है। इससे ऑफिस में काम करने का मन नहीं करता, मानसिक तनाव महसूस होता है, व्यक्ति की फोकस करने की क्षमता कमजोर हो जाती है और नींद भी कम हो जाती है।
अगर हम समय रहते डिजिटल डिटॉक्स की प्रक्रिया अपना लें तो हमें जल्द ही दिमाग से संबंधित परेशानियों से छुटकारा मिल सकता है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की एक स्टडी के मुताबिक, सिर्फ एक हफ्ते के डिजिटल डिटॉक्स में भाग लेने वाले लोगों में चिंता 16.1 प्रतिशत, डिप्रेशन के लक्षण 24.8 प्रतिशत और नींद न आने की समस्या 14.5 प्रतिशत कम हो गई। इन आंकड़ों से साफ होता है कि आज के दौर में डिजिटल डिटॉक्स कितना जरूरी है।
दिन में कुछ घंटों के लिए फोन से दूरी बना लें। जैसे सुबह उठते समय फोन न चलाएं और रात में सोने से पहले फोन का इस्तेमाल न करें ताकि समय पर नींद आ सके। इससे व्यक्ति का स्लीप साइकल भी ठीक हो जाता है। अगर बेहद जरूरी हो तभी फोन का नोटिफिकेशन ऑन रखें, वरना कोशिश करें कि फोन का नोटिफिकेशन बंद रखें।
फोन की समय सीमा तय करनी चाहिए। यानी एक दिन में हम कितने घंटे फोन चला रहे हैं इसका ध्यान रखना चाहिए और केवल जरूरी काम के लिए ही फोन का इस्तेमाल करना चाहिए। अगर ऑफिस की छुट्टियां चल रही हों तो कुछ दिनों के लिए फोन को बंद भी किया जा सकता है। हालांकि फोन बंद करने से पहले अपने परिवार और करीबी दोस्तों को इसकी जानकारी दे देनी चाहिए ताकि उन्हें चिंता न हो। इस प्रक्रिया से फोन चलाने की लत कम हो जाएगी।
दिमाग को आराम – डिजिटल डिटॉक्स के कारण हमारे दिमाग को आराम मिलता है, जिससे दिमाग शांत और स्वस्थ रहता है। तनाव कम – दिमाग को अगर समय पर आराम मिल जाए तो चिंता और तनाव के लक्षण कम हो जाते हैं। बेहतर नींद – अगर फोन चलाने की लत कम हो जाएगी तो व्यक्ति बेवजह रात को सोने से पहले फोन इस्तेमाल नहीं करेगा और सही समय पर सो पाएगा, जिससे उसकी नींद पूरी होगी। बॉडी फिट रहेगी – डिजिटल डिटॉक्स से हमारी आंखों पर पड़ने वाला दबाव कम होता है, गर्दन और पीठ पर पड़ने वाला तनाव भी कम हो जाता है। साथ ही शारीरिक गतिविधि भी बढ़ती है।
देशभर में होली के त्योहार को लेकर इस बार लोगों के बीच काफी उलझन बनी हुई है कि आखिर किस दिन इसे मनाया जाए। ज्योतिष गणना और पंचांग के अनुसार, इस साल चंद्र ग्रहण और पूर्णिमा तिथि के समय में बदलाव के कारण होली की तारीखों को लेकर विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।
ज्योतिषीय गणित के अनुसार, फाल्गुन पूर्णिमा 2 और 3 मार्च दोनों दिन पड़ रही है लेकिन 3 मार्च को लगने वाले चंद्र ग्रहण की वजह से पर्व की व्यवस्था में बदलाव किया गया है। ग्रहण का सूतक काल और समय को देखते हुए ही विद्वानों ने होली खेलने के लिए 4 मार्च का दिन तय किया है।
2 मार्च को फाल्गुन पूर्णिमा के दौरान होलिका दहन किया जाएगा। 3 मार्च को दोपहर 3:20 बजे से चंद्र ग्रहण शुरू हो जाएगा। इसका सूतक काल 9 घंटे पहले ही शुरू हो जाएगा, इसलिए इस दिन रंग खेलना शुभ नहीं माना जा रहा है।
चैत्र मास की प्रतिपदा तिथि, जिसमें रंग खेला जाता है, वह 4 मार्च की सुबह तक रहेगी। इसलिए रंगोत्सव 4 मार्च 2026 को ही मनाया जाना शास्त्र सम्मत है।
पूजा के लिए शुभ मुहूर्त
यदि आप होली पर देवी-देवताओं को रंग अर्पित कर विशेष पूजा करना चाहते हैं, तो 4 मार्च को ये तीन मुहूर्त सबसे श्रेष्ठ हैं।
होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि भावनाओं का मेल है। माना जाता है कि अलग-अलग रंग हमारे स्वभाव को दर्शाते हैं—जैसे लाल रंग जोश के लिए, पीला खुशी के लिए और सफेद शांति का प्रतीक है। इस दिन लोग पुराने गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को गुलाल लगाते हैं और गले मिलते हैं।
नोट: इस खबर में लिखी गई बातें धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।
ईरान, इजरायल और अमेरिका। दुनिया की सारी बहसें, इन तीन देशों के इर्दगिर्द घूम रहीं हैं। इजरायल और अमेरिका मिलकर ईरान पर मिसाइलें दाग रहे हैं, जवाब में ईरान पड़ोसी देशों के साथ-साथ खाड़ी के देशों में भीषण हवाई हमले कर रहा है। जंग में न तो इजरायल, न अमेरिका, न ईरान की सेना, जमीनी कार्रवाई कर रही है। जंग मिसाइल और ड्रोन की मदद से लड़ी जा रही है। अंजाम यह हुआ है कि खाड़ी के देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकाने तबाह हो चुके हैं, इजरायल की राजधानी यरुशलम की इमारतें तक हिल गईं हैं।
ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामनेई और सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव अली लारिजानी मारे जा चुके हैं। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) का शीर्ष नेतृत्व खत्म हो चुका है।
हमास और इजरायल की जंग की तरह, इजरायल की सेनाएं, गाजा या रफाह में नहीं घुसी हैं। हमले हवा में हो रहे हैं। यह जंग, सैन्य कार्रवाई से कहीं ज्यादा महंगी पड़ रही है। इजरायल और अमेरिका के लिए राहत की बात यह है कि उन्हें सैन्य नुकसान कम हो रहा है, ईरान के लिए दुखद यह है कि उसकी सेना और आम नागरिक हमलों में मारे जा रहे हैं।
ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने दावा किया है कि 28 परवरी से अब तक कम से कम 1444 लोग मारे जा चुके हैं, 18551 लोग घायल हो चुके हैं। ईरान इस जंग में एकतरफा हार नहीं रहा है। वह अपनी ड्रोन और मिसाइल क्षमता की बदौलत 10 से ज्यादा देशों से एक साथ भिड़ रहा है। अमेरिका, इजरायल, सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन, कुवैत, जॉर्डन, साइप्रस, इराक और लेबनॉन जैसे देशों में अमेरिकी ठिकानों को तबाह कर रहा है। ईरान में मौतें ज्यादा हुईं हैं लेकिन घाटा अमेरिका और इजरायल का ज्यादा हुआ है।
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ड्रोन vs ड्रोन की लड़ाई, कौन किस पर भारी?
द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि कैसे अमेरिका अपने मिसाइल और ड्रोन पर पानी की तरह पैसे बहा रहा है, जिसे ईरानी, सस्ते ड्रोन मारकर गिरा दे रहे हैं। ईरान के कामिकेज या शाहेद ड्रोन का मुकाबला करने में अमेरिका और इजरायल के पसीने छूट रहे हैं। एक शाहेद ड्रोन की कीमत करीब 20 हजार डॉलर से 30 हजार डॉलर के बीच में हैं, जबकि इसे गिराने के लिए अमेरिका जिन पैट्रियट मिसाइलों का इस्तेमाल कर रहा है, उनकी एक यूनिट की कीमत 4 मिलयन डॉलर तक होती है। अखबार, अमेरिका की रणनीति पर कह रहा है, ‘मक्खी मारने के लिए बजूका’ का इस्तेमाल किया जा रहा है।
अमेरिका, दुनिया का सबसे ताकतवर देश है। पश्चिम एशिया का सबसे मजबूत देश, इजरायल है, जो मुस्लिम देशों के बीच में खड़ा है, मुस्लिम देशों को ही तबाह कर रहा है लेकिन सारे मुस्लिम देश मिलकर उसका बाल बांका नहीं कर पाते हैं। दो महाशक्तियों के साथ-साथ 7 से ज्यादा देशों से ईरान भिड़ रहा है, उन्हें तबाह कर रहा है। तबाही इतनी भीषण है कि दुबई में कई अमेरिकी ठिकानों को ईरान उड़ान चुका है।
रूस और यूक्रेन की जंग साल 2022 से चल रही है। रूस, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है। लोग दावा कर रहे थे कि एक हफ्ते में यह जंग रूस जीत जाएगा, 4 साल हो गए, रूस नहीं जीत पाया। यूक्रेन, अपने ड्रोन की ताकत, रूस के राष्ट्रपति के आधिकारिक निवास क्रेमलिन तक ड्रोन बरसा चुका है। यूक्रेन के पास तुर्की से मिले घातक ड्रोन हैं। जंग की शुरुआत से ही तुर्की के ड्रोन का इस्तेमाल, यूक्रेन कर रहा है।
तुर्की, इसलिए यूक्रेन की मदद कर रहा है कि वह नॉर्थ अटलांटिक ट्रिटी ऑर्गेनाइजेशन (NATO) का सदस्य देश है। नाटो के देश ही परोक्ष रूप से इस जंग में रूस की मदद कर रहे हैं। ये ड्रोन, इतने सस्ते हैं कि 400 से 500 अमेरिकी डॉलर में मिल जाते हैं। दमदार इतने कि रूस के करोड़ों डॉलर से बने T-90 टैंकों और आधुनिक डिफेंस सिस्टों को तबाह कर चुके हैं। रूस को ‘काला सागर’ में जितने जख्म मिले हैं, यूक्रेन ने ड्रोन से ही दिए हैं।
यूक्रेन तो फिर भी बड़ा देश है। हूती विद्रोही, सऊदी अरब, अमेरिका और इजरायल को आए दिन नुकसान पहुंचाते हैं। हूती विद्रोही ईरानी तकनीक से बने सस्ते ड्रोन का इस्तेमाल करते हैं। सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हमले करते हैं, अमेरिकी नौसेना और इंटरनेशनल शिपिंग को कई बार निशाना बना चुके हैं। 2020 में अजरबैजान और अर्मेनिया में जंग छिड़ी थी। छोटे से देश अजरबैजान ने तुर्की के बेकर बायराकटार टीबी2 जैसे ड्रोन से भीषण तबाही मचाई थी।
अर्मेनिया के पास सोवियत काल के दौरान के बड़े टैंक और एयर डिफेंस सिस्टम हैं, इनके बाद भी अजरबैजान ने कम नुकसान के साथ अपना मकसद पूरा कर लिया था।
पावर एटलस, ग्लोबल फायर पावर, एयरोटाइम, WORLDOSTATS, आर्मी टेक्नोलॉजी और द डिफेंस पोस्ट जैसी एजेंसियों की रैंकिंग बताती है कि साल 2026 में भी अमेरिका, चीन, रूस, इजरायल और तुर्की जैसे देश, ड्रोन बाजार के सबसे बड़े खिलाड़ी बने हुए हैं। अमेरिका, ड्रोन तकनीक वाले देशों में सबसे ताकतवर देश बना हुआ है। अमेरिका से पास तकनीक भी है और सबसे बड़ा ड्रोन बेड़ा भी।
अमेरिका: कहकर मारता है फिर भी लोग पकड़ नहीं पाते
ड्रोन तकनीक का यह देश बादशाह है। हजारों यूनिट्स हैं, ‘MQ-9 रेपर’ और ‘RQ-4 ग्लोबर हॉक’ जैसे ड्रोन महंगे ड्रोन हैं, जिन्हें 60 हजार फीट की ऊंचाई पर 30 घंटे से ज्यादा समय तक उड़ाया जा सकता है। ये ड्रोन, स्टेलत्थ तकनीक से लैस होते हैं, जिन्हें रडार पकड़ नहीं पाता है। सेटेलाइट कंट्रोल में इतने सटीक हैं कि ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई मर भी गए और ड्रोन को ईरान का रडार सिस्टम पकड़ तक नहीं पाया। तेहरान में घुसकर उन्होंने अली खामेनेई को मारा लेकिन इसे न्यूट्रल में करने में ईरान नाकाम रहा। ये डिफेंस सिस्टम को चकमा देने में माहिर हैं।
चीन: खतरनाक कारोबारी, जो बचाता रहा कई देशों की लाज
ड्रोन शक्ति में चीन दुनिया का दूसरा सबसे ताकतवर देश है। उत्पादन में अमेरिका को भी यह देश पीछे छोड़ता है। 8 हजार से से ज्यादा सक्रिय ड्रोन, चीन में हमेशा तैयार रहते हैं। चीन न केवल ड्रोन अपने लिए बनाता है, दूसरे देशों को बेचता भी है। चीन के पास ‘विंग लूंग II’ और ‘CH-5 रेनबो’ जैसे ड्रोन हैं, जो ताकत में अमेरिकी ड्रोन को टक्कर दे सकते हैं। चीन दुनिया के 30 से ज्यादा देशों को ड्रोन बेचता है। पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देश, ड्रोन के लिए इसी पर निर्भर हैं।
तुर्की: पहला देश, जिसने जंग का तरीका ही बदल दिया
तुर्की का आधिकारिक नाम अब तुर्किए है। यह देश, सस्ते ड्रोन बनाने में माहिर है। 5 साल की मेहनत से इस देश ने अपनी रैंकिंग ऐसे सुधारी है कि अब फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों से कहीं ज्यादा आगे है। तुर्की ड्रोन का सबसे बड़ा व्यापारी बन रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत में जिन ड्रोन के दम पर पाकिस्तान हमले कर रहा था, वे तुर्की और चीन मेड थे। तुर्की ही बायराकटार टीबी2 बनाता है, जिसने अकेले, तुर्की को ‘ड्रोन सुपरपावर’ में बदल दिया है। कम कीमत में आने वाले ये ड्रोन, दुश्मनों पर काल बनकर टूटते हैं।
इजरायल: हर तरफ दुश्मन, फिर भी अजेय है
इजरायल, नई ड्रोन तकनीक का जन्मदाता कहा जा रहा है। इजरायल के पास ‘हेरोन टीपी’ और ‘हर्मेस 900’ जैसे घातक ड्रोन हैं। इजरायली ड्रोन, अपनी जासूसी क्षमताओं और रडार सिस्टम से बचने की क्षमताओं की वजह से बेहद घातक होते हैं। आलम यह है कि भारत जैसे बड़े देश भी इजरायल से ड्रोन खरीदते हैं। इजरायल, रक्षा क्षेत्र में भारत का बड़ा भागीदार है। एक दशक में भारत और इजरायल, आर्थिक और सामरिक रूप से और करीब आए हैं।
ईरान: एक साथ 12 मुल्कों से भिड़ने वाला देश
विश्वयुद्ध के बाद, ऐसा मौका कभी नहीं आया कि किसी जंग में 2 या 3 से ज्यादा देश शामिल हों। ईरान, इजरायल और अमेरिका की जंग में, 12 देशों पर गाज गिरी है। खाड़ी के जिन देशों में अपनी सेनाओं के सैन्य बेस अमेरिका ने बनाए थे, ईरान उन्हें बड़ी क्षति पहुंचा रहा है। इस जंग में कुवैत, बहरीन, UAE और दुबई पर जैसा कहर टूटा है, महीनों की जंग में जमीनी लड़ाई लड़कर ऐसा नहीं किया जा सकता था। ईरान अपने ड्रोन से हमले कर रहा है।
ईरान के सस्ते आत्मघाती ड्रोन, इजरायल और अमेरिका की नाक में दम कर रहे हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अमेरिका जो भी गंवा रहा है, वह इन्हीं ड्रोन की बदौलत हो रहा है। ईरान ने वैश्विक प्रतिबंधों के बाद भी अपनी ड्रोन क्षमताएं विकसित की हैं। ईरान के पास ‘शाहेद’ जैसे ड्रोन हैं, जो भीषण तबाही मचाते हैं।
ईरान सैकड़ों ड्रोन एक साथ दागता है। किसी भी देश की एयर डिफेंस सिस्टम भ्रम में पड़ जाता है कि किसे पहले गिराएं। इतने बड़े पैमाने पर लक्षित हमले होते हैं, जिन्हें न इजरायल का डिफेंस सिस्टम रोक पाता है, न अमेरिका का। यह तकनीक ‘स्वार्म’ कहलाती है, ईरान इसका बेताज बादशाह साबित हो रहा है।
कितने तरह के होते हैं ड्रोन?
गाइडेड ग्लाइड बम: खतरनाक हथियार है, जिनका इस्तेमाल ड्रोन की तरह भी हो सकता है। हवा में उड़ते हैं, रिमोट या GPS कंट्रोल के जरिए तय निशाने को भेद सकते हैं।
टारगेट ड्रोन: इस्तेमाल सेना युद्धाभ्यास में करती है। असली विमान के बदले इन ड्रोनों पर निशाना लगाकर मिसाइलों या हथियारों का परीक्षण किया जाता है।
डिकॉय ड्रोन: दुश्मन की रडार पर ऐसे ड्रोन नजर नहीं आते हैं। ये राडार पर असली लड़ाकू विमान की तरह दिखते हैं, दुश्मन का ध्यान इन पर जाता है और मिसाइलें इन्हें निशाना बनाती हैं।
रिसर्च ड्रोन: इनका इस्तेमाल वैज्ञानिक करते हैं। मौसम की जानकारी हासिल करना, विजिलेंस, निगरानी, उड़ान तकनीकों की पर्तें सुलझाना, ऐसे ड्रोन का मकसद है। जानकारी जुटाना, वन्यजीवों की निगरानी करना या नई उड़ान तकनीकों का परीक्षण करना।
जासूसी ड्रोन: सीमा पर ऐसे ड्रोन का इस्तेमाल ज्यादा होता है। कैमरों और सेंसर से लैस ये ड्रोन, दुश्मन के इलाकों का पूरा खाका खींच लाते हैं। चुपके से जानकारियां लाते हैं, खुफिया जानकारियां हासिल करते हैं।
कॉम्बेट ड्रोन: ईरान, जिन ड्रोन के जरिए पश्चिम एशिया के देशों में तबाही मचा रहा है, ये ड्रोन वही हैं। इनकी अलग-अलग रेंज होती है। ईरान की ड्रोन क्षमताओं की त्रासदी दुनिया देख रही है। जमीन से लेकर आसमान तक, ईरान तबाही मचा रहा है।
अतीत से आज तक का सफर क्या है?
‘अनमैन्ड एविएशन, अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ एनमैन्ड एरियल व्हीकल्स’ में लॉरेंस आर न्यूक लिखते हैं, ’19वीं सदी में जब लोग पहले-पहल हवाई जहाज बनाने की कोशिश कर रहे थे, तब उन्होंने छोटे-छोटे मॉडल बनाए और उड़ाए। केली और स्ट्रिंगफेलो जैसे वैज्ञानिकों के बनाए गए जहाज, बड़े हवाई जहाज बनाने से पहले टेस्ट करने के लिए इस्तेमाल होते थे।’
शुरुआत में ये मॉडल बड़े और इंसानों द्वारा उड़ाए जाने वाले विमानों के परीक्षण के लिए बनाए गए थे। समय के साथ ये तकनीक विकसित हुई और आज ‘एरियल टॉरपीडो’ से लेकर आधुनिक जासूसी और अनमैन्ड कॉम्बेट एयर व्हीकल (UCAV) तक का सफर तय कर चुकी है। 1990 के दशक में ‘UAV’ शब्द लोकप्रिय हुआ, जिसने पुराने रिमोटली पायलटेड व्हीकल की जगह ली। जिसे दुनिया आज क्रूज मिसाइल के नाम से जानती है, उसकी शुरुआत भी एक एयरियल टॉरपीडो से हुई थी।
कितना बड़ा है ड्रोन का बाजार?
‘ग्रैंड व्यू रिसर्च’ की एक रिपोर्ट में यह अनुमान जताया गया है कि साल 2025 में वैश्विक ‘मिलिट्री ड्रोन मार्केट’ करीब 47.38 अरब अमेरिकी डॉलर का था। साल 2033 तक, यह 99.24 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। दुनिया अब AI, मशीन लर्निंग, सेल्फ नेविगेशन जैसी तकनीक पर काम कर रहा है।
भविष्य के ड्रोन, रीयल-टाइम फैसले लेंगे, स्वार्म ऑपरेशन करने में सक्षम होंगे। ड्रोन को हथियार से विजिलेंस तक के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, इनकी रेंज बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। और लंबी दूरी की निगरानी संभव बना रही है।
सीमा सुरक्षा, एंटी टेरर ऑपरेशन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर तकनीक पर ड्रोन कंपनियां जोर दे रहीं हैं। भारत, चीन और जापान जैसे देश, इस सेक्टर में क्षेत्रीय तनाव की वजह से और निवेश बढ़ा रहे हैं। यूरोप में NATO के देश भी बढ़ती जरूरतों की वजह से ड्रोन तकनीक विकसित करने पर जोर दे रहे हैं।
मिलिट्री ड्रोन बनाने वाली प्रमुख कंपनियां कौन सी हैं?
अमेरिकी कंपनियां, जिन्हें ड्रोन बनाने में महारत हासिल है
जनरल एटॉमिक्स: MQ-9 रीपर और प्रिडेटर ड्रोन पूरी दुनिया में मशहूर हैं।
नॉर्थरोप ग्रमॅन: यह कंपनी RQ-4 ग्लोबल हॉक जैसे ड्रोन बनाती है।
लॉकहीड मार्टिन: RQ-170 सेंटिनल जैसे स्टील्थ ड्रोन यह कंपनी बनाती है।
एयरोवाइरन्मेंट: स्विचब्लेड जैसे आत्मघाती ड्रोन, यही कंपनी बनाती है।
तुर्की कंपनियां, जिनका दुनिया में दबदबा
बायकर टेक: सबसे सफल ड्रोन बायराकतार TB2 यही कंपनी बनाती है।
टर्किश एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज: अंका और अक्सुंगुर जैसे ड्रोन, TAI ही बनाती है।
इजरायली कंपनियां, जिनका खरीदार भारत भी है
इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज: भारतीय सेना हेरॉन ड्रोन का इस्तेमाल करती है।
एल्बिट सिस्टम्स: यह कंपनी हर्मिस सीरीज के ड्रोन बनाती है। भारत भी खरीदार है।
चीन, कॉम्बैट ड्रोन का सबसे बड़ा सप्लायर
चाइना एयरोस्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी कॉर्प: यह कंपनी CH (रेनबो) सीरीज के ड्रोन बनाती है।
एविएशन इंडस्ट्री कॉर्पोरेशन ऑफ चाइना: यह कंपनी विंग लूंग सीरीज के कॉम्बैट ड्रोन बनाती है।
रूस, स्टील्थ कॉम्बैट ड्रोन पर दे रहा है जोर
सुखोई: यह S-70 ओखोटनिक-B जैसा भारी स्टील्थ कॉम्बैट ड्रोन विकसित कर रही है।
क्रोनश्टाट ग्रुप: ओरियन ड्रोन यही कंपनी बनाती है।
इस रेस में भारत का हाल क्या है?
भारत ड्रोन बनाने की रेस में अभी बहुत पीछे है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL), मिलिट्री ड्रोन प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। आइडिया फोर्ज, सेना के लिए विजिलेंस ड्रोन बनाता है। अअदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस, इजरायल के साथ मिलकर हर्मिस सिरीज के ड्रोन बनाने की तैयारी में है। टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स मिलिट्री विजिलेंस और अटैकिंग ड्रोन पर काम कर रहा है।