डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के कार्यकर्ताओं के विरोध-प्रदर्शन से जुड़े विवाद के बीच, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल ने एक इंटरव्यू में कई संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दों पर खुलकर अपने विचार रखे हैं।
पार्टी के नेता सौरव दास से अपने संबंधों को लेकर उन्होंने स्पष्ट किया कि वे उनका ‘मेंटर’ नहीं थे। एक साल पहले दिवाली के मौके पर ली गई एक तस्वीर को गलत ढंग से पेश किया गया। उन्होंने बताया कि सौरव पूर्व में एक पत्रकार थे, जिनसे बस एक-दो बार ही मुलाकात हुई थी। उस दौरान उन्होंने सौरव को अपनी भाषा में थोड़ी नरमी लाने की सलाह दी थी, क्योंकि अलग-अलग पीढ़ियों की भाषा में अक्सर फर्क होता है।
जस्टिस कौल ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) की नियुक्ति में एक तटस्थ तीसरे पक्ष की भूमिका और स्वतंत्र सदस्य की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि इस पर विचार किया जाना चाहिए। अनुच्छेद 370 के फैसले के बाबत उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत कश्मीरी हिंदू पृष्ठभूमि के बावजूद उन्होंने हमेशा एक ‘संवैधानिक जज’ के रूप में अपनी निष्पक्ष भूमिका निभाई।
इसके अलावा, पूर्व सीजेआइ डीवाई चंद्रचूड़ के साथ अपने संबंधों और कई न्यायिक नियुक्तियों के दौरान कार्यपालिका के दबाव से निपटने के अपने अलग तरीकों का भी उन्होंने जिक्र किया।
उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि हमारे सिस्टम में अब “मुकदमे की लंबी प्रक्रिया ही अपने आप में सजा बन जाती है”, हालांकि कुछ कठोर कानून जमानत पर रोक लगाते हैं।
जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले की जांच को ‘अनुचित’ बताते हुए उन्होंने कहा कि कमरे में आग लगने के कारणों और मिले पैसों की सच्चाई सामने आनी चाहिए थी। साथ ही, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अदालतों को विपक्ष का हथियार या राजनीतिक मंच नहीं बनना चाहिए। पीएमएलए मामले में किसी भी दबाव से इन्कार करते हुए उन्होंने अधिवक्ता सौरभ कृपाल के रोके गए कालेजियम प्रस्ताव पर भी अपनी बात रखी।
