



दिनेश जस्पा, लाहौल: हिमाचल प्रदेश की लाहौल घाटी में करीब 13,124 फुट की ऊंचाई पर स्थित नीलकंठ झील, आठ महीने तक बर्फ की मोटी चादर से ढकी रही। ऐसी मान्यता है कि इस अवधि तक भगवान शिव, अपने ध्यान लीला में मग्न रहते हैं। अब भक्तों के लिए झील का द्वार खुल गया है। बड़ी संख्या में भक्त यहां पहुंचकर झील में स्नान कर रहे हैं।
झील खुलने के साथ ही भक्त वहां पहुंच रहे हैं, लोहे की छड़ों से जमी बर्फ तोड़ रहे हैं और पानी में उतरकर स्नान कर रहे हैं। भक्तों का शरीर ठंड से अकड़ रहा है लेकिन शून्य से नीचे के तापमान में भी भक्त डुबकी लगाने से नहीं चूक रहे हैं। झील के आसपास लगातार ‘ओम नम: शिवाय’ का जाप हो रहा है। आने वाले भक्त ओम नम शिवाय और हर हर महादेव का जाप कर रहे हैं।
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मंदिर कैसे पहुंचते हैं भक्त?
झील तक पहुंचने से पहले भक्तों को नंगे पांव 300 मीटर की यात्रा करनी पड़ती है। बर्फ और भीषण सर्दी की वजह से उनके पांव ठंडे पड़ गए लेकिन न तो जयकार रुके न ही भक्त आगे बढ़ने से डगे। वहां मौजूद भक्तों ने बताया कि भगवान तक पहुंचने के लिए खुद को गलाना पड़ता है।
कैसे पहुंचे नीलकंठ?
नीलकंठ झील तक नैनगार तक गाड़ी से पहुंचा जा सकता है, उसके बाद पैदल यात्रा करनी पड़ती है। पुजारी बताते हैं कि धार्मिक मान्यताओं के कारण महिलाएं इस झील की ओर नहीं जाती हैं।
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कब बंद होगा झील का द्वार?
अक्टूबर में फिर से बर्फबारी शुरू होने पर झील का द्वार बंद हो जाएगा। भक्त इस यात्रा में सिर्फ दर्शन भर नहीं करते, बल्कि आठ महीने की प्रतीक्षा, बर्फीली ठंड और कड़ी मेहनत के बाद खुद को भोलेनाथ को समर्पित करते हैं।
महिलाओं के जाने पर क्यों पाबंदी क्यों है?
हिमाचल प्रदेश की लाहौल घाटी में स्थित पवित्र नीलकंठ महादेव मंदिर और झील में महिलाओं के जाने पर पाबंदी के पीछे धार्मिक मान्यताएं और पौराणिक कथाएं हैं। लोक मान्यताओं के अनुसार, इस नीली झील के पानी का रंग भगवान शिव के विषपान से जुड़ा माना जाता है और इस स्थान को बेहद पवित्र एवं अलौकिक माना गया है।
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स्थानीय परंपराओं कहती हैं कि महिलाओं को मासिक धर्म से जुड़ी शुचिता के कड़े पारंपरिक नियमों के कारण इस दुर्गम और पवित्र स्थान से दूर रखा जाता है। एक पौराणिक मान्यता यह भी है कि यहां की स्थानीय देवी महिलाओं के आगमन से रुष्ट हो सकती हैं, जिसके कारण घाटी में अनिष्ट या प्राकृतिक आपदा आने का भय रहता है। यही वजह है कि सदियों पुरानी इस धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का पालन करते हुए आज भी महिलाओं का वहां जाना वर्जित है।