निर्जला एकादशी कब है, 24 या 25 जून? सही तारीख, मुहूर्त और पूजा विधि जानिए

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सनातन धर्म में एकादशी का विशेष महत्व माना जाता है। इस पर्व पर कई लोग भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना और व्रत रखते हैं। हर महीने में दो एकादशियां मनाई जाती हैं, जिनमें एक एकादशी शुक्ल पक्ष की होती है तो दूसरी एकादशी कृष्ण पक्ष की होती है। दोनों ही एकादशियों का अलग-अलग महत्व होता है। इस तरह पूरे साल में 24 एकादशी पर्व मनाए जाते हैं, जिनमें निर्जला एकादशी का खास महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो भी भक्त इस दिन व्रत रखते हैं, भगवान उनकी सभी इच्छाओं को पूरा करते हैं। साथ ही इस व्रत के प्रभाव से भक्तों के पाप और कष्ट दूर हो जाते हैं।


निर्जला एकादशी पर्व ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है। यानी यह जून महीने में पड़ता है। इस साल कई भक्तों के मन में यह सवाल है कि निर्जला एकादशी कब है। जहां कुछ लोगों का मानना है कि यह पर्व 24 जून को मनाया जाएगा, वहीं कई धार्मिक जानकारों का कहना है कि इस साल 25 जून को निर्जला एकादशी मनानी चाहिए। आइए जानते हैं निर्जला एकादशी की सही तारीख, मुहूर्त और पूजा की सही विधि क्या है।

 

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कब है निर्जला एकादशी व्रत?


हिन्दू पंचांग के मुताबिक, निर्जला एकादशी 24 जून को रात 8 बजकर 9 मिनट पर शुरू होगी, जो 25 जून की रात 9 बजकर 14 मिनट पर समाप्त होगी। पर्व की उदया तिथि 25 जून को पड़ रही है, इसलिए निर्जला एकादशी का व्रत और पूजन 25 जून को करना शुभ माना जाएगा।


निर्जला एकादशी का व्रत रखने वाले भक्त 26 जून को व्रत का पारण करेंगे। हिन्दू पंचांग के अनुसार, 26 जून को सुबह 5 बजकर 41 मिनट से लेकर सुबह 8 बजकर 25 मिनट तक पारण का शुभ मुहूर्त रहेगा। पारण से पहले स्नान करके पूजा-पाठ करना चाहिए।

 

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पूजा का मुहूर्त


धार्मिक जानकारों के अनुसार, निर्जला एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 5 मिनट से शुरू होगा, जो सुबह 4 बजकर 45 मिनट तक रहेगा। इसके अलावा निर्जला एकादशी के दिन रवि योग भी रहेगा, जिसका शुभ समय सुबह 5 बजकर 25 मिनट से लेकर शाम 4 बजकर 29 मिनट तक माना गया है। रवि योग ज्योतिष शास्त्र में अत्यंत शुभ माना जाता है। इस समय किए गए कार्यों में सफलता मिलने की मान्यता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके पूजा-पाठ करना शुभ माना जाता है।पूजा की विधि


धार्मिक जानकारों के मुताबिक, निर्जला एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए। इसके बाद भक्तों को व्रत का संकल्प लेना चाहिए। फिर श्रद्धा और प्रेम भाव से भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। पूजन के दौरान भगवान को फूल, फल और तुलसी दल अर्पित करना चाहिए। इसके बाद घी का दीपक जलाना चाहिए। पूजा समाप्त होने के बाद विष्णु चालीसा और भगवान विष्णु के मंत्रों का पाठ करना चाहिए। साथ ही दिनभर व्रत का पालन करते हुए भगवान का स्मरण करना चाहिए।

 

नोट: यह खबर धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसकी पुष्टि हम नहीं करते हैं।

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