
हम अक्सर मानते हैं कि जीवन और मृत्यु दुनिया की रीति है। जिस व्यक्ति का जन्म हुआ है, उसकी एक न एक दिन मृत्यु भी अवश्य होगी। हिन्दू धर्म के अनुसार, जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान शिव की आराधना करता है, उसकी रक्षा स्वयं शिव जी करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि शिव भगवान केवल पूजा-पाठ से ही प्रसन्न नहीं होते, बल्कि जो भक्त उन्हें सच्चे मन से याद करता है और अपना मानकर उनकी भक्ति करता है, उस पर वह विशेष कृपा करते हैं और उसके सभी कष्ट दूर करते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार शिव भगवान ने अपने प्रिय भक्त राजा श्वेतकेतु की रक्षा के लिए स्वयं काल को भी भस्म कर दिया था।
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने संतों को यह कथा सुनाई थी। इस कथा के अनुसार, राजा श्वेतकेतु बेहद दयालु और शूरवीर थे। वे अपने राज्य की प्रजा के कल्याण के लिए सदैव कार्य करते थे। उन्होंने पूरे जीवन धर्म और शिव भक्ति का मार्ग अपनाया था, जिस कारण उन्हें भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त हुआ और उनकी मृत्यु भी टल गई। आइए जानते हैं कि भगवान शिव ने राजा श्वेतकेतु की जान कैसे बचाई।
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शिव जी ने कैसे बचाई जान?
पौराणिक कथा के मुताबिक, राजा श्वेतकेतु हमेशा भगवान शिव की भक्ति में लीन रहते थे। तभी उनके मृत्यु का समय आ गया। चित्रगुप्त ने यमराज को बताया कि राजा श्वेतकेतु का जीवनकाल पूरा हो चुका है। तब यमराज ने अपने दूतों को आदेश दिया कि वे श्वेतकेतु के प्राण हर लें।
जब यमदूत श्वेतकेतु के पास पहुंचे, तब वे मंदिर में शिवलिंग के सामने ध्यान में लीन थे। यह देखकर यमदूत लंबे समय तक मंदिर के बाहर इंतजार करते रहे। जब काफी देर तक वे उनके प्राण नहीं ले सके, तो यमराज क्रोधित हो गए। क्रोध में यमराज स्वयं श्वेतकेतु के प्राण लेने पहुंच गए। उन्होंने देखा कि श्वेतकेतु शिव भक्ति में पूरी तरह लीन हैं, लेकिन वे एक क्षण भी नहीं रुके। वे मंदिर के गर्भगृह में ही उनके प्राण लेने का प्रयास करने लगे। तभी भगवान शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। उनके तीसरे नेत्र के तेज से यमराज भस्म हो गए। यमराज के भस्म होने के बाद श्वेतकेतु का ध्यान टूटा।
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यमराज को किया दोबारा जीवित
जब श्वेतकेतु को पता चला कि भगवान शिव ने उनकी रक्षा के लिए यमराज को भस्म कर दिया है, तो उन्होंने भगवान शिव से विनम्र निवेदन किया कि यमराज के भय से ही लोग बुरे कर्म करने से बचते हैं। साथ ही, उनके डर से लोग अच्छे कर्म भी करते हैं। इसलिए उन्हें जीवनदान दे दीजिए।
श्वेतकेतु की प्रार्थना सुनकर भगवान शिव ने यमराज को जीवनदान दे दिया। दोबारा जीवित होने के बाद यमराज ने कहा कि जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा करता है, गले में रुद्राक्ष की माला धारण करता है और शिव मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जाप करता है, उसे कभी अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता।
नोट- यह लेख धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं पर आधारित है। खबरगांव इसकी पुष्टि नहीं करता है।