Home Uncategorized सेक्युलर हो गया पाकिस्तान? इस्लामपुरा बनेगा कृष्ण नगर, हिंदू नामों पर जोर

सेक्युलर हो गया पाकिस्तान? इस्लामपुरा बनेगा कृष्ण नगर, हिंदू नामों पर जोर

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पाकिस्तान के लाहौर में बंटवारे के करीब 79 साल बाद सड़कों, गलियों और चौकों के पुराने नामों को वापस लाया जा रहा है। वहां की पंजाब सरकार ने फैसला किया है कि 1947 के बंटवारे से पहले जो हिंदू, सिख, जैन और अंग्रेजों के जमाने के नाम थे उन्हें फिर से रखा जाएगा। बंटवारे के बाद इन जगहों के नाम बदलकर जो नए नाम रखे गए थे उन्हें अब हटा दिया जाएगा।

 

इस काम की शुरुआत पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की मुख्यमंत्री मरियम नवाज की कैबिनेट मीटिंग से हुई। इस मीटिंग में सरकार ने लाहौर के पुराने नामों को दोबारा इस्तेमाल करने के प्लान को मंजूरी दे दी। एक अधिकारी ने बताया कि पिछले दो महीनों में लाहौर के कई इलाकों में पुराने नामों वाले नए साइनबोर्ड लगने भी शुरू हो चुके हैं। अब तक ऐसी 9 जगहों को उनका पुराना नाम आधिकारिक रूप से वापस मिल गया है।

 

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किस जगह का नाम बदलकर क्या रखा गया?

सरकारी फैसले के बाद लाहौर की कई मुख्य जगहों के पुराने नाम वापस आ गए हैं जिसके तहत अब इस्लामपुरा को फिर से कृष्ण नगर, बाबरी मस्जिद चौक को जैन मंदिर चौक या जैन मंदिर रोड और सुन्नत नगर को संत नगर कहा जाएगा। इसी तरह मुस्तफाबाद को अब लोग फिर से धर्मपुरा के नाम से जानेंगे जबकि मौलाना जफर अली खान चौक को उसका पुराना और मशहूर नाम लक्ष्मी चौक वापस मिल गया है। इसके अलावा सर आगा खान रोड को बदलकर फिर से डेविस रोड, फातिमा जिन्ना रोड को क्वींस रोड और प्रसिद्ध बाग-ए-जिन्ना को अब उसके पुराने नाम लॉरेंस गार्डन्स के रूप में जाना जाएगा।

लोगों को हमेशा याद रहे ये नाम

भले ही सरकारी कागजों और बोर्ड पर बंटवारे के बाद नाम बदल दिए गए थे लेकिन लाहौर के आम लोगों ने इन नामों को कभी नहीं भुलाया। लाहौर संस्था के पूर्व अधिकारी कामरान लशारी बताते हैं कि वहां के चाय वाले, दुकानदार, रिक्शा चलाने वाले और आम लोग आपस में बातचीत के दौरान हमेशा इन्हीं पुराने नामों का इस्तेमाल करते थे। उनके लिए लक्ष्मी चौक हमेशा लक्ष्मी चौक ही रहा चाहे बोर्ड पर कुछ भी लिखा हो। उन्होंने कहा कि यह कोशिश लाहौर की उस पुरानी पहचान को अपनाने की है जो मुस्लिम, सिख, हिंदू, ईसाई और पारसी सभी से मिलकर बनी थी।

 

अमृतसर से सिर्फ 50 किलोमीटर दूर लाहौर कभी सभी धर्मों का एक साझा घर हुआ करता था। वहां के बाजार, कॉलेज, पार्क, अखाड़े, मंदिर और गुरुद्वारे सबके थे। 1947 के बंटवारे के समय हुई हिंसा के बाद ज्यादातर हिंदू और सिख परिवार वहां से चले गए। इसके बाद धीरे-धीरे उनसे जुड़ी जगहों के नाम बदल दिए गए लेकिन शहर के आम लोगों ने अपनी यादों को कभी मिटने नहीं दिया।

ऐतिहासिक इमारतें

लाहौर में 100 से ज्यादा ऐसी ऐतिहासिक इमारतें हैं जिन्हें सरकार अब सुधार रही है। इस काम के दौरान न सिर्फ सड़कों के नाम बदले जा रहे हैं बल्कि महाराजा रणजीत सिंह के सिख साम्राज्य से जुड़े ढांचों और पुराने चर्चों की मरम्मत भी की जा रही है। लाहौर के किले में सिख राजपरिवार की आखिरी वंशज प्रिंसेस बंबा सदरलैंड की एक पेंटिंग को भी ठीक किया गया है। कामरान लशारी ने बताया कि पहले जब महाराजा रणजीत सिंह की मूर्ति लगाने की कोशिश हुई थी तो उसे नुकसान पहुंचाया गया था लेकिन अब पिछले कुछ सालों में वहां का माहौल बदला है और लोग पुराने इतिहास को अपनाने लगे हैं।

 

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पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भी लाहौर के खेल के दौर को दोबारा जिंदा करने का सुझाव दिया है। उन्होंने लाहौर के पुराने क्रिकेट मैदानों और मिंटो पार्क जिसे अब ग्रेटर इकबाल पार्क कहते हैं उस पुराने कुश्ती अखाड़े को वापस शुरू करने की बात कही है। बंटवारे से पहले इस मैदान ने दोनों देशों को बड़े खिलाड़ी दिए हैं जैसे पाकिस्तान के इंजमाम-उल-हक और भारत के महान क्रिकेटर लाला अमरनाथ जिन्होंने 1947 से पहले यहीं ट्रेनिंग ली थी।

 

मिंटो पार्क का जो अखाड़ा तोड़ दिया गया था वहां कभी दुनिया के मशहूर गामा पहलवान और इमाम बख्श के कुश्ती मुकाबले हुआ करते थे। बंटवारे से पहले लाहौर के सभी हिंदू परिवार हर साल इसी पार्क में दशहरे का त्योहार मनाने के लिए एक साथ इकट्ठा हुआ करते थे। 

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