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आपके प्लेट में रखी फल-सब्जियां कितनी शुद्ध? सर्वे में सामने आई बाजार की डरावनी सच्चाई

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जागरण न्यूज नेटवर्क, नई दिल्ली। ज्यादातर लोग फल सब्जियां खरीदते समय कीमतों को लेकर तो मोलभाव करते हैं लेकिन ये इस बात पर शायद ही विचार करते हैं कि ये स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित हैं या नहीं या कहीं इनमें खतरनाक रसायन तो मौजूद नहीं है। यही वजह है कि चार में से तीन भारतीयों को यह पता ही नहीं है कि जो फल सब्जियां वे खा रहे हैं वे कितनी शुद्ध हैं। लोकल सर्कल्स के देशव्यापी सर्वे में यह खतरनाक तस्वीर सामने आई है। सर्वे के मुताबिक दो तिहाई भारतीयों को उन फल और सब्जी विक्रेताओं पर इस बात को लेकर भरोसा नहीं करते हैं वे रसायनों के जरिये पकाए गए फल या रंगे गए उत्पाद नहीं बेच रहे हैं। इसके बावजूद ज्यादातर परिवार फल और सब्जियों की खरीदारी स्थानीय बाजार या स्टोर से खरीदते हैं। सर्वे के मुताबिक अगर उन्हें प्राकृतिक रूप से पकाया गया फल और बिना रंग के इस्तेमाल वाले उत्पाद मिलें तो 72 प्रतिशत लोग इसके लिए अधिक कीमत देने को तैयार हैं। सर्वें के दौरान 80 प्रतिशत लोगों ने मांग की है कि सरकार संगठित क्षेत्र के रिटेल स्टोर और आनलाइन प्लेटफार्म के लिए यह अनिवार्य बनाए कि वे अपने यहां प्राकृतिक रूप से पके हुए फल और बिना मिलावट वाले उत्पादों की उपलब्धता सुनिश्चित करें। बड़े पैमाने पर जब्त किए गए हैं संदिग्ध फल देश में रसायनों के जरिये फलों को पकाने और उनको रंगने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। अगस्त में कर्नाटक के खाद्य सुरक्षा अधिकारियों ने उडुपी जिले में 10,890 किलोग्राम केला जब्त किया था। आरोप है कि इस केले को रसायन का इस्तेमाल करते हुए पकाया गया था और इसे रंगा भी गया था। छापे के दौरान रसायन भी बरामद किया गया था। ये अकेला मामला नहीं है। पिछले आम के सीजन में पूरे देश में बड़ी मात्रा में कृत्रिम रूप से पकाए गए फल बरामद किए गए थे। अप्रैल, 2026 में हैदराबाद में खाद्य सुरक्षा टीमों ने करीब सात टन संदिग्ध आम जब्त किए और दो थोक व्यापारिकयों को गिरफ्तार किया था। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और कर्नाटक में इसी तरह के छापे पड़े थे। एफएसएसएआई की एडवाइजरी फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथारिटी आफ इंडिया (फएसएसएआइ) ने अप्रैल 2016 को एक एडवाइजरी जारी कर फलों को रसायनों के जरिये कृत्रिम तौर पर पकाए जाने के मामलों की निगरानी तेज करने का निर्देश दिया था। एडवाइजरी में अधिकारियों से कहा गया था कि वे फलों के बाजार, गोदामों और स्टोरेज में एसिटिलीन गैस का पता लगाने के लिए स्ट्रिप पेपर टेस्ट का इस्तेमाल करें। अगर फलों के क्रेट के नजदीक कैल्शियम कार्बाइड की मौजूदगी मिलती है तो इसे कानूनी कार्रवाई के लिए साक्ष्य माना जा सकता है। प्रतिबंधित है कैल्शियम कार्बाइड का उपयोग कैल्शियम कार्बाइड का इस्तेमाल आमतौर पर आम, केला, पपीता आदि फलों को तेजी से पकाने के लिए एक सस्ते केमिकल एजेंट के रूप में किया जाता है। भारत में फलों को पकाने के लिए इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध है। कैल्शियम कार्बाइड जब हवा में मौजूद नमी या फल के प्राकृतिक पानी के संपर्क में आता है, तो एक रासायनिक प्रतिक्रिया होती है। इससे एसिटिलीन गैस बनती है। एसिटिलीन गैस की प्रभावशीलता प्राकृतिक रूप से फल पकाने वाले हार्मोन एथिलीन जैसी ही होती है। जब कच्चे फलों को अखबार या कागज की पुड़ियों में कैल्शियम कार्बाइड रखकर बंद कमरों या पेटियों में रखा जाता है, तो निकलने वाली गैस फलों का रंग तेजी से बदल देती है और वे बाहर से पके हुए दिखने लगते हैं। कैल्शियम कार्बाइड खुद तो स्वास्थ के लिए हानिकारक है ही, साथ ही इसमें आर्सेनिक और फास्फोरस जैसे अत्यधिक जहरीले रसायनों के अंश भी पाए जाते हैं।

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