नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह दिव्यांग बच्चों के लिए बने रिहैबिलिटेशन सेंटर्स और ऐसी अन्य संस्थाओं के नियमन, रजिस्ट्रेशन और निगरानी से जुड़ी राज्य-वार जानकारी इकट्ठा करे और उसे रिकॉर्ड पर रखे।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की अध्यक्षता वाली बेंच ने दिव्यांगों के अधिकारों के लिए काम करने वाले वकील राहुल बजाज और बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले जहीर अब्बास जान द्वारा दायर जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करते हुए ये निर्देश जारी किए। इस बेंच में जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे।
सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने केंद्र सरकार से कहा कि वह सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) के साथ मिलकर काम करे और ऐसी संस्थाओं को नियंत्रित करने वाले कानूनी सुरक्षा उपायों के लागू होने के बारे में विस्तृत डेटा तैयार करे।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह एक हलफनामे के जरिए ‘दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (आरपीडब्ल्यूडी), 2016’ के तहत वैधानिक प्राधिकरणों के गठन और कामकाज, मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों के लिए न्यूनतम मानकों को तय करने और उनकी अधिसूचना जारी करने, तथा पुनर्वास सुविधाओं के निरीक्षण और निगरानी के तरीकों के बारे में जानकारी रिकॉर्ड पर रखे।
सुनवाई के दौरान बजाज ने कहा कि दिव्यांगजनों के लिए पुनर्वास केंद्रों को आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम के तहत राज्यस्तर पर अनिवार्य रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह पता लगाने के लिए ठोस डेटा की जरूरत है कि क्या सभी राज्यों में तय कानूनी अथॉरिटीज का गठन किया गया है और क्या वे अपने रेगुलेटरी और निगरानी के काम ठीक से कर रही हैं।
बजाज ने मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 का जिक्र करते हुए बताया कि अब तक सिर्फ 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने ही मेंटल हेल्थ सेंटर्स के लिए जरूरी कम से कम स्टैंडर्ड्स के बारे में नोटिफिकेशन जारी किया है।
इन बातों पर ध्यान देते हुए सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन के साथ तालमेल बिठाए और जरूरी जानकारी सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश करे।
इस मामले की अगली सुनवाई 22 अक्टूबर को होगी। याचिका में आरपीडब्ल्यूडी एक्ट, रिहैबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इंडिया (आरसीआई) एक्ट, 1992 और मेंटल हेल्थकेयर एक्ट के तहत कानूनी सुरक्षा उपायों को लागू करने में सिस्टम की नाकामियों की ओर इशारा किया गया है।
याचिका के अनुसार, मौजूदा कानूनी ढांचे के बावजूद, दिव्यांग बच्चों को गैर-पंजीकृत संस्थानों के कामकाज, अपर्याप्त बुनियादी ढांचे, योग्य पेशेवरों की कमी और प्रभावी रेगुलेटरी निगरानी न होने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि दिव्यांग लोगों को सुविधाएं देने वाले संस्थानों का आरपीडब्ल्यूडी एक्ट की धारा 50 के तहत रजिस्ट्रेशन होना जरूरी है। यह धारा किसी भी व्यक्ति को सक्षम अधिकारी से रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट लिए बिना ऐसा संस्थान शुरू करने या चलाने से रोकती है।
याचिका में कहा गया है कि दिव्यांग लोगों के लिए काम करने वाले कई संस्थान कानून के तहत रजिस्टर्ड नहीं हैं, जिससे उनकी सही तरह से निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं हो पाती। इसमें ‘मेंटल हेल्थकेयर एक्ट’ (मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम) को लागू करने को लेकर भी चिंता जताई गई। इस कानून में राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरणों और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कम से कम क्वालिटी स्टैंडर्ड्स (गुणवत्ता मानक) तय करने की व्यवस्था है।
याचिकाकर्ताओं ने 2025 में श्रीनगर की चाइल्ड वेलफेयर कमिटी द्वारा एक चाइल्ड डेवलपमेंट सेंटर के अचानक किए गए निरीक्षण के नतीजों का भी हवाला दिया। याचिका के अनुसार, संस्थान के पास आरपीडब्ल्यूडी एक्ट और आरसीआई एक्ट के तहत रजिस्ट्रेशन नहीं था और वहां बुनियादी सुविधाओं, योग्य कर्मचारियों और प्रोग्राम को ठीक से लागू करने की कमी थी।
याचिकाकर्ताओं ने दिव्यांग बच्चों के लिए रिहैबिलिटेशन और मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं के रजिस्ट्रेशन, रेगुलेशन और मॉनिटरिंग से जुड़े कानूनी प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग की है।
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— Mnt News Bharat (@mntnewsbharat) October 5, 2026




















