Tuesday, March 3, 2026
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महाराष्ट्र के सभी विश्वविद्यालय में डिजिटल निगरानी हेतु एक डैशबोर्ड बनाया जाए- मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस

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मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने निर्देश दिया है कि राज्य के सार्वजनिक विश्वविद्यालय अपनी शैक्षणिक गुणवत्ता के साथ-साथ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग में सुधार के लिए विशेष प्रयास करें और इसके लिए प्रत्येक विश्वविद्यालय में डिजिटल निगरानी हेतु एक डैशबोर्ड बनाया जाए।(A dashboard should be created for digital monitoring in all universities of Maharashtra says Chief Minister Devendra Fadnavis)

आला अधिकारियों के साथ बैठक 

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता में वर्षा के आवास पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) और विकसित महाराष्ट्र 2047 के कार्यान्वयन पर एक समीक्षा बैठक आयोजित की गई।बैठक में उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री चंद्रकांत (दादा) पाटिल, वित्त विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव ओ. पी. गुप्ता, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव बी. वेणुगोपाल रेड्डी, मुख्यमंत्री कार्यालय के प्रधान सचिव अश्विनी भिडे, मुख्यमंत्री कार्यालय के सचिव डॉ. श्रीकर परदेशी, तकनीकी शिक्षा निदेशक डॉ. विनोद मोहितकर, उच्च शिक्षा निदेशक डॉ. शैलेंद्र देवलंकर, कला निदेशालय के निदेशक डॉ. किशोर इंगले, उप सचिव प्रताप लुबल, संयुक्त सचिव संतोष खोरगड़े और राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के कुलपति एवं प्रतिकुलपति उपस्थित थे।

विश्वविद्यालय रैंकिंग की वर्तमान स्थिति पर आत्मचिंतन आवश्यक

मुख्यमंत्री फडणवीस ने कहा कि उच्च शिक्षा में शैक्षणिक गुणवत्ता, शोध, बुनियादी ढांचे और विश्वविद्यालय रैंकिंग की वर्तमान स्थिति पर आत्मचिंतन आवश्यक है। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्वविद्यालयों की रैंकिंग बढ़ाने के लिए एक कार्ययोजना तैयार की जानी चाहिए और समयबद्ध योजना बनाई जानी चाहिए। इस कार्ययोजना को और गति देने के लिए एक ऑनलाइन डैशबोर्ड बनाया जाना चाहिए, जिसके लिए राज्य सरकार हर संभव सहयोग प्रदान करेगी।

रोज़गार के अवसर बढ़ाने के प्रयास 

वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में, विश्वविद्यालयों को उद्योग क्षेत्र के साथ समझौते, इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप और कौशल-आधारित पाठ्यक्रमों के माध्यम से शैक्षिक गुणवत्ता और कुशल जनशक्ति का निर्माण करके रोज़गार के अवसर बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने यह भी कहा कि जिस तरह निजी विश्वविद्यालयों में नए विचार/पाठ्यक्रम सामने आ रहे हैं, उसी तरह सार्वजनिक विश्वविद्यालयों को भी गुणवत्ता पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

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मुंबई- घाटकोपर के एक स्कूल में समोसे खाने से पांच छात्र बीमार

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17 नवंबर 2025 को दोपहर 2:15 बजे घाटकोपर (पश्चिम) के साईनाथ नगर रोड स्थित एक निजी स्कूल, केवीके स्कूल में फ़ूड पॉइज़निंग की घटना की सूचना मिली। राजावाड़ी अस्पताल के सुरक्षा गार्ड द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, स्कूल कैंटीन से समोसे खाने के बाद पाँच बच्चे बीमार पड़ गए।(Mumbai five students fall ill after eating samosas at Ghatkopar school)

राजवाड़ी अस्पताल के AMO डॉक्टर अजीत ने पुष्टि की कि दो बच्चों, इकरा जाफ़र मियाज सैय्यद (11) और वैजा गुलाम हुसैन (10) की हालत स्थिर है और उनका ओपीडी के आधार पर इलाज चल रहा है।

अन्य तीन बच्चों, राजिक खान (11), आरुष खान (11) और अफजल शेख (11) को अस्पताल लाया गया था, लेकिन उन्होंने DAMA का विकल्प चुना और उन्हें छुट्टी दे दी गई। यह अपडेट दोपहर 2:45 बजे दर्ज किया गया।

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वनीला बाजार में भारी गिरावट: वैश्विक आपूर्ति बढ़ी, कीमतें 600 डॉलर से लुढ़ककर 60 डॉलर प्रति किलो पर आईं

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– फोटो : सोशल मीडिया AI

विस्तार


अंतरराष्ट्रीय बाजार में वनीला की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई है। वैश्विक स्तर पर आपूर्ति बढ़ने और मांग स्थिर रहने के कारण कीमतें लगभग 90 प्रतिशत तक नीचे आ गई हैं। कभी 2016 से 2021 के बीच 600 डॉलर प्रति किलोग्राम तक पहुंचने वाली वैनीला अब 60-70 डॉलर प्रति किलो के दायरे में सिमट गई है। भारत में भी यही रुझान देखा जा रहा है। यहां वनीला की कीमतें ₹600-700 प्रति किलो तक गिर गई हैं, जबकि कुछ वर्ष पहले यही कीमत ₹5,000 प्रति किलो थी।मेडागास्कर से बढ़ी आपूर्ति ने तोड़ा बाजार का संतुलन
इडुक्की (केरल) स्थित वनीला प्रोसेसिंग कंपनी इकोस्पाइस (EcoSpice) के प्रबंध निदेशक जोसेफ सेबेस्टियन ने बताया कि दुनिया के सबसे बड़े उत्पादक मेडागास्कर में उत्पादन ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है। इसके चलते हरी वनीला (Green Vanilla) की कीमतें भी रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गई हैं। उन्होंने कहा कि “राजनीतिक अस्थिरता के चलते मेडागास्कर में निर्यात प्रवाह प्रभावित हुआ है, जिससे बाजार की सामान्य गतिविधियां भी धीमी पड़ गई हैं।”

मांग स्थिर, बाजार खरीदारों के पक्ष में
वनीला की कीमतों में गिरावट के बावजूद वैश्विक मांग में कोई खास वृद्धि नहीं हुई है। सेबेस्टियन ने बताया कि “वर्तमान में उत्पादन इतना अधिक है कि मांग उसका समर्थन नहीं कर पा रही। इससे कीमतों पर लगातार दबाव बना हुआ है और बाजार पूरी तरह ‘खरीदार-प्रधान चक्र’ (buyer-driven cycle) में फंसा हुआ है।” उन्होंने कहा कि कई देशों में किसान कठिन दौर से गुजर रहे हैं क्योंकि अधिक आपूर्ति और कमजोर मांग से उनकी आय पर बुरा असर पड़ रहा है।

इंडोनेशिया और युगांडा में अलग हालात
रिपोर्ट के अनुसार, इंडोनेशिया अब भी वैश्विक आपूर्ति- मांग संतुलन के अनुरूप नहीं चल रहा है और लगातार स्टॉक जमा कर रहा है, जिससे पहले से ही संतृप्त बाजार पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। वहीं युगांडा अपेक्षाकृत संतुलित रुख रखता है और अपने इन्वेंट्री स्तर को कम बनाए हुए है। हालांकि कमजोर फॉर्म-गेट कीमतों के कारण वहां के किसान अब कॉफी और कोको जैसी अधिक लाभदायक फसलों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे भविष्य में युगांडा की वैनीला आपूर्ति घट सकती है।

भारत की भूमिका सीमित, घरेलू मांग तक सिमटा उत्पादन
भारत अब भी वैश्विक वनीला बाजार में छोटी भूमिका निभा रहा है। सेबेस्टियन के मुताबिक, भारत में हर साल लगभग 15-20 टन वैनीला का उत्पादन होता है, जो मुख्यतः घरेलू उपभोग के लिए प्रयुक्त होती है। उन्होंने बताया कि अधिकांश कन्फेक्शनरी कंपनियों के पास पहले से पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, क्योंकि उन्होंने कम कीमतों पर बड़ी मात्रा में वनीला खरीदी हुई है।

बाजार का दृष्टिकोण: निकट भविष्य में सुधार की संभावना कम
सेबेस्टियन ने कहा कि फिलहाल बाजार की स्थिति बेयरिश (Bearish) बनी हुई है। आपूर्ति और मांग के बीच असंतुलन के कारण निकट और मध्यम अवधि में सुधार की संभावना बहुत कम है। वनीला की खेती करने वाले किसानों के लिए यह दौर चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि उच्च उत्पादन के बावजूद उन्हें लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है।

वनीला बाजार में भारी गिरावट: वैश्विक आपूर्ति बढ़ी, कीमतें 600 डॉलर से लुढ़ककर 60 डॉलर प्रति किलो पर आईं

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– फोटो : सोशल मीडिया AI

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अंतरराष्ट्रीय बाजार में वनीला की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई है। वैश्विक स्तर पर आपूर्ति बढ़ने और मांग स्थिर रहने के कारण कीमतें लगभग 90 प्रतिशत तक नीचे आ गई हैं। कभी 2016 से 2021 के बीच 600 डॉलर प्रति किलोग्राम तक पहुंचने वाली वैनीला अब 60-70 डॉलर प्रति किलो के दायरे में सिमट गई है। भारत में भी यही रुझान देखा जा रहा है। यहां वनीला की कीमतें ₹600-700 प्रति किलो तक गिर गई हैं, जबकि कुछ वर्ष पहले यही कीमत ₹5,000 प्रति किलो थी।मेडागास्कर से बढ़ी आपूर्ति ने तोड़ा बाजार का संतुलन
इडुक्की (केरल) स्थित वनीला प्रोसेसिंग कंपनी इकोस्पाइस (EcoSpice) के प्रबंध निदेशक जोसेफ सेबेस्टियन ने बताया कि दुनिया के सबसे बड़े उत्पादक मेडागास्कर में उत्पादन ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है। इसके चलते हरी वनीला (Green Vanilla) की कीमतें भी रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गई हैं। उन्होंने कहा कि “राजनीतिक अस्थिरता के चलते मेडागास्कर में निर्यात प्रवाह प्रभावित हुआ है, जिससे बाजार की सामान्य गतिविधियां भी धीमी पड़ गई हैं।”

मांग स्थिर, बाजार खरीदारों के पक्ष में
वनीला की कीमतों में गिरावट के बावजूद वैश्विक मांग में कोई खास वृद्धि नहीं हुई है। सेबेस्टियन ने बताया कि “वर्तमान में उत्पादन इतना अधिक है कि मांग उसका समर्थन नहीं कर पा रही। इससे कीमतों पर लगातार दबाव बना हुआ है और बाजार पूरी तरह ‘खरीदार-प्रधान चक्र’ (buyer-driven cycle) में फंसा हुआ है।” उन्होंने कहा कि कई देशों में किसान कठिन दौर से गुजर रहे हैं क्योंकि अधिक आपूर्ति और कमजोर मांग से उनकी आय पर बुरा असर पड़ रहा है।

इंडोनेशिया और युगांडा में अलग हालात
रिपोर्ट के अनुसार, इंडोनेशिया अब भी वैश्विक आपूर्ति- मांग संतुलन के अनुरूप नहीं चल रहा है और लगातार स्टॉक जमा कर रहा है, जिससे पहले से ही संतृप्त बाजार पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। वहीं युगांडा अपेक्षाकृत संतुलित रुख रखता है और अपने इन्वेंट्री स्तर को कम बनाए हुए है। हालांकि कमजोर फॉर्म-गेट कीमतों के कारण वहां के किसान अब कॉफी और कोको जैसी अधिक लाभदायक फसलों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे भविष्य में युगांडा की वैनीला आपूर्ति घट सकती है।

भारत की भूमिका सीमित, घरेलू मांग तक सिमटा उत्पादन
भारत अब भी वैश्विक वनीला बाजार में छोटी भूमिका निभा रहा है। सेबेस्टियन के मुताबिक, भारत में हर साल लगभग 15-20 टन वैनीला का उत्पादन होता है, जो मुख्यतः घरेलू उपभोग के लिए प्रयुक्त होती है। उन्होंने बताया कि अधिकांश कन्फेक्शनरी कंपनियों के पास पहले से पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, क्योंकि उन्होंने कम कीमतों पर बड़ी मात्रा में वनीला खरीदी हुई है।

बाजार का दृष्टिकोण: निकट भविष्य में सुधार की संभावना कम
सेबेस्टियन ने कहा कि फिलहाल बाजार की स्थिति बेयरिश (Bearish) बनी हुई है। आपूर्ति और मांग के बीच असंतुलन के कारण निकट और मध्यम अवधि में सुधार की संभावना बहुत कम है। वनीला की खेती करने वाले किसानों के लिए यह दौर चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि उच्च उत्पादन के बावजूद उन्हें लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है।

बालासाहेब ठाकरे के व्यक्तित्व निर्माण में मध्य प्रदेश के शहरों का अनजाना योगदान

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जबलपुर : महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे बड़े और प्रभावशाली नामों में से एक, शिवसेना संस्थापक बालासाहेब केशव ठाकरे, के जीवन और व्यक्तित्व को लेकर एक विशेष चर्चा मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर छाई हुई है। यह चर्चा मुख्य रूप से उनके राजनीतिक उदय या मुंबई केंद्रित गतिविधियों पर नहीं, बल्कि उनके शुरुआती जीवन और वैचारिक धरातल के निर्माण में मध्य प्रदेश के प्रमुख शहरों, विशेषकर इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर की अनजानी और महत्वपूर्ण भूमिका पर केंद्रित है। यह विश्लेषण बताता है कि मराठी मानुष के इस कट्टर समर्थक की वैचारिक नींव का एक हिस्सा वास्तव में मराठी भाषी क्षेत्रों से दूर, हिंदी भाषी मध्य भारत की भूमि पर रखा गया था।

बालासाहेब ठाकरे, जिनका जन्म 1926 में पुणे में हुआ था, अपने शुरुआती जीवन में एक राजनीतिक कार्यकर्ता से अधिक एक सफल कार्टूनिस्ट के रूप में स्थापित हुए थे। लेकिन उनके व्यक्तित्व और विचारों को जो तीखापन और दृढ़ता मिली, उसका सूत्रधार केवल महाराष्ट्र नहीं था। इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 1940 और 1950 के दशक में, जब भारत स्वतंत्रता और उसके बाद के शुरुआती पुनर्गठन के दौर से गुजर रहा था, तब मध्य प्रांत और बरार (तत्कालीन सीपी एंड बरार, जिसमें जबलपुर शामिल था) और ग्वालियर रियासत (जो बाद में मध्य भारत का हिस्सा बनी) का वातावरण मराठी सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना के साथ एक गहरा जुड़ाव रखता था।

यह माना जाता है कि उस दौर में इंदौर और जबलपुर जैसे शहर मराठी साहित्य, रंगमंच और विचारों के महत्वपूर्ण केंद्र थे। मराठी ब्राह्मणों और मराठा प्रशासनिक अधिकारियों की बड़ी संख्या इन शहरों में निवास करती थी, जिन्होंने अपनी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूती से थाम रखा था। बालासाहेब ठाकरे के विचारों पर उस समय के मराठी राष्ट्रवाद की गहरी छाप थी, और मध्य प्रदेश के ये शहर, जहां मराठी संस्कृति का प्रभाव हिंदी भाषी बहुसंख्यकों के साथ सह-अस्तित्व में था, उन्हें 'अस्मिता' (पहचान) के महत्व को और अधिक गहराई से समझने का मौका दिया।

जबलपुर, जो सीपी एंड बरार की राजधानी नागपुर के करीब था और शिक्षा एवं प्रशासनिक गतिविधियों का एक बड़ा केंद्र था, वहां मराठी भाषी बुद्धिजीवियों की एक सक्रिय जमात थी। इन बुद्धिजीवियों के बीच भाषाई पहचान, विदर्भ और महाराष्ट्र के एकीकरण के मुद्दे और केंद्र सरकार में मराठी हितों की उपेक्षा को लेकर गहरी बहसें चलती थीं। ऐसा माना जाता है कि बालासाहेब ठाकरे ने अपने राजनीतिक और पत्रकारिता जीवन की शुरुआत में इन बहसों और विचारों का बारीकी से अध्ययन किया। जबलपुर के मराठी अखबारों और पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों और कार्टूनों ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय पहचान की राजनीति की चुनौतियों और संभावनाओं को समझने में मदद की।

उसी प्रकार, इंदौर और ग्वालियर में भी मराठी संस्कृति का गहरा प्रभाव था। इंदौर पर होल्कर राजवंश का शासन था, जबकि ग्वालियर पर सिंधिया राजवंश का। ये दोनों ही मराठा राजघराने थे, जिन्होंने सदियों तक अपनी सांस्कृतिक विरासत को यहाँ बनाए रखा। बालासाहेब के लिए, इन शहरों का दौरा करना या यहाँ के घटनाक्रमों को देखना एक महत्वपूर्ण अनुभव रहा होगा। जब वे 'मार्मिक' पत्रिका के लिए कार्टून बनाते थे और महाराष्ट्र की सीमाओं से बाहर मराठी अस्मिता के संघर्ष को देखते थे, तो उन्हें यह स्पष्ट होता गया होगा कि क्षेत्रीय हितों की रक्षा केवल सांस्कृतिक मंच से नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति के माध्यम से करनी होगी।

कार्टूनिस्ट के रूप में अपनी यात्रा के दौरान, बालासाहेब ठाकरे ने अक्सर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीति पर कटाक्ष किए। मध्य प्रदेश के शहरों में उस समय विभिन्न भाषाई और सांस्कृतिक समूहों के बीच जो सामाजिक और राजनीतिक गतिरोध थे—जैसे कि सरकारी नौकरियों और स्थानीय व्यापार पर किसका अधिकार हो—वे समस्याएं बालासाहेब के लिए मुंबई की 'भूमिपुत्र' की लड़ाई का अग्रदूत थीं। उन्होंने यहाँ देखा कि कैसे भाषाई आधार पर पहचान की राजनीति का बीज बोया जा सकता है।

राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर जोर देते हैं कि मध्य प्रदेश की तत्कालीन राजनीतिक गतिशीलता ने ठाकरे को सिखाया कि एक मजबूत क्षेत्रीय पार्टी के लिए 'पहचान' की राजनीति कितनी आवश्यक है। उन्होंने देखा कि कैसे मराठीभाषी लोग, जो प्रशासनिक पदों पर महत्वपूर्ण थे, धीरे-धीरे हिंदी भाषियों की बढ़ती आबादी और राजनीतिक प्रभुत्व के सामने कमजोर हो रहे थे। यह अनुभव ही बाद में उनके "जय महाराष्ट्र" और "मराठी मानुष" के नारे का आधार बना।

हालांकि इस बात का कोई सीधा लिखित प्रमाण नहीं है कि बालासाहेब ठाकरे ने अपनी किसी जीवनी में मध्य प्रदेश के इन शहरों का नाम सीधे तौर पर अपनी प्रेरणा के स्रोत के रूप में लिया हो, लेकिन इन शहरों की सामाजिक-राजनीतिक संरचना, जहां मराठी संस्कृति एक बड़े क्षेत्र पर हावी थी, निश्चित रूप से उनके वैचारिक परिपक्वता में एक अनजाना लेकिन ठोस योगदान देती है। आज जब शिवसेना अपनी मूल पहचान से हटकर राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर अपने पैर जमाने की कोशिश कर रही है, तब यह चर्चा महत्वपूर्ण है कि उस विचार की उत्पत्ति केवल मुंबई के मराठी गलियारों में नहीं हुई, बल्कि इसकी जड़ें मध्य भारत के सांस्कृतिक और राजनीतिक वातावरण से भी पानी लेती थीं। यह विश्लेषण बालासाहेब ठाकरे के व्यक्तित्व और राजनीति को एक नए दृष्टिकोण से देखने का मौका देता है, यह दर्शाता है कि महान नेताओं के विचारों को आकार देने में दूरस्थ भौगोलिक क्षेत्रों और उनकी अनूठी सामाजिक गतिशीलता का भी कितना बड़ा हाथ हो सकता है। यह विशेष खबर हमें बताती है कि बालासाहेब ठाकरे का राजनीतिक डीएनए जितना मुंबई का था, उतना ही उस समय के विस्तृत मध्य भारत का भी था।

पुलिसिंग को आधुनिक बनाने की दिशा में बड़ा कदम: Ghaziabad में 2 नई चौकियां तैयार

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गाजियाबाद में पुलिस कमिश्नरेट द्वारा जन सुरक्षा को सुदृढ़ करने और पुलिसिंग को आधुनिक बनाने के निरंतर प्रयास जारी हैं। इसी क्रम में शनिवार को थाना नंदग्राम क्षेत्र की चौकी गुलधर और थाना मधुबन बापूधाम क्षेत्र की चौकी दुहाई के नवनिर्मित भवनों का उद्घाटन किया गया। इसका उद्घाटन अतिरिक्त पुलिस आयुक्त मुख्यालय/अपराध केवश कुमार चौधरी और अतिरिक्त पुलिस आयुक्त कानून-व्यवस्था एवं यातायात आलोक प्रियदर्शी द्वारा किया गया। इस अवसर पर पुलिस उपायुक्त नगर धवल जायसवाल, मुख्य सुरक्षा आयुक्त एनसीआरटीसी एस. डी. मिश्रा, एनसीआरटीसी के अधिकारी और पुलिस कर्मी मौजूद रहे।

इन दो जगहों पर बनीं पुलिस चौकी

गाजियाबाद के नंदग्राम थाना क्षेत्र के गुलधर और मधुबन बापूधाम थाना क्षेत्र के दुहाई इलाके में तैयार हुई नई पुलिस चौकियां क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाएंगी। दोनों क्षेत्र शहर के महत्वपूर्ण हिस्सों में आते हैं, जहां भारत ट्रेन के स्टेशन के कारण यात्रियों की आवाजाही लगातार बनी रहती है।

इसके अलावा मेरठ और दिल्ली के बीच आने-जाने वाला ट्रैफिक भी इस मार्ग से अधिक गुज़रता है, जिससे यहां सुरक्षा और निगरानी की आवश्यकता हमेशा बनी रहती है।

नवनिर्मित चौकी भवनों में बेहतर कार्य वातावरण, आधुनिक सुविधाएं और यातायात नियंत्रण प्रणाली उपलब्ध कराई गई है, जिससे पुलिस बल की कार्यक्षमता में और वृद्धि होगी। अधिकारियों के अनुसार इन चौकियों के संचालन से क्षेत्र में गश्त, निगरानी और त्वरित पुलिस कार्रवाई और अधिक प्रभावी हो सकेगी।

लोगों को मिलेगी सुरक्षा

पुलिस कमिश्नरेट ने उम्मीद जताई है कि नए चौकी भवन स्थानीय नागरिकों को अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक वातावरण प्रदान करेंगे। इन चौकियों के माध्यम से कानून-व्यवस्था को मजबूत करने, अपराध नियंत्रण को बेहतर करने और पुलिस की पहुंच को तेज़ बनाने में बड़ी मदद मिलेगी।

नोएडा में सड़क सुरक्षा के लिए क्रिटिकल कॉरिडोर टीम का गठन, पुलिस कमिश्नर ने कहा- ‘अब हादसे होंगे कम’

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नोएडा जिले में सड़क हादसों को रोकने और हादसे के समय घायल की जान बचाने के लिए पुलिस कमिश्नरेट ने नौ थानों में विशेष क्रिटिकल कॉरिडोर टीम बनाई है। प्रत्येक टीम का नेतृत्व एक उप निरीक्षक करेंगे और उनके साथ चार सिपाही तैनात रहेंगे। इन टीमों का मुख्य उद्देश्य थाना क्षेत्र में हादसे होने वाली जगहों की पहचान करना, कारणों का विश्लेषण करना और आवश्यक सड़क सुधार या अन्य उपाय कराना है।

पुलिस कमिश्नर ने दी जानकारी

जानकारी के मुताबिक, यदि किसी इलाके में हादसा होता है, तो टीम तुरंत मौके पर पहुंचकर प्राथमिक जांच करेगी और घायल को तुरंत इलाज दिलाने का प्रयास करेगी। इसके अलावा टीम हादसे का पूरा विवरण तैयार कर थाना प्रशासन को रिपोर्ट करेगी। डीसीपी ट्रैफिक डॉ. प्रवीण रंजन सिंह ने बताया कि भविष्य में अन्य विषयों पर भी प्रशिक्षण आयोजित किया जाएगा।

पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने बताया कि प्रदेश में जीरो फैटेलिटी डिस्ट्रिक्ट (जेडएफडी) कार्यक्रम के तहत 20 जिलों का चयन किया गया है, जिसमें गौतमबुद्ध नगर भी शामिल है। जिले में पिछले वर्षों के हादसों के अध्ययन से पता चला कि शहर की सड़कों पर होने वाले 50 प्रतिशत से ज्यादा हादसों का मुख्य कारण तेज रफ्तार वाहन रहे हैं। कमिश्नरेट का लक्ष्य इन हादसों और उनमें होने वाली मौतों को कम करना है।

पहला सत्र हुआ आयोजित

विशेष रूप से ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे और लालकुआं बॉर्डर से लुहारली टोल तक के हिस्सों को क्रिटिकल क्षेत्र घोषित किया गया है। इन टीमों का पहला प्रशिक्षण सत्र सेक्टर-108 पुलिस कमिश्नर सभागार में आयोजित हुआ। प्रशिक्षण में जीवन रक्षा कौशल, घायल को तुरंत अस्पताल पहुंचाने और अन्य जरूरी उपायों की जानकारी फेलिक्स अस्पताल के डॉक्टरों ने दी।

यूपी पुलिस के इंस्पेक्टर 17 सितंबर से लापता, मां की शिकायत के बाद पुलिस ने जनता से की खास अपील

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यूपी पुलिस के इंस्पेक्टर अनुज कुमार 17 सितंबर से लापता हैं। अनुज कुमार की पोस्टिंग अलीगढ़ जिले के महुआखेड़ा थाना क्षेत्र में थी। वे उस दिन अपने घर प्रभात नगर कालोनी, गाजियाबाद से बिना किसी सूचना दिए चले गए और तब से उनका कोई पता नहीं चल पाया है। पुलिस ने उन्हें ड्यूटी पर नहीं आने के कारण सस्पेंड कर दिया है।

मां ने दर्ज कराई है एफआईआर

जानकारी के मुताबिक, अब अनुज की मां ने भी पुलिस में FIR दर्ज कराई है और इंस्पेक्टर बेटे को खोजने की अपील की है। पुलिस ने इस संदर्भ में महुआखेड़ा थाना में 18 अक्टूबर 2025 को गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज की है।

उनकी गुमशुदगी का पोस्टर सोशल मीडिया पर वायरल है, जिसमें बताया गया है कि गाजियाबाद के अवंतीका कालोनी थाना क्षेत्र के निवासी अनुज कुमार की उम्र 36 वर्ष है। वे सफेद शर्ट और काले पैंट में थे और 5 फुट 7 इंच लंबाई के हैं। उनका रंग गेहूंआ बताया गया है। पुलिस का कहना है कि अनुज कुमार के लापता होने की सूचना मिलने पर तत्काल उनके खोजने के प्रयास शुरू किए गए हैं।

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थाना प्रभारी हुए सक्रिय

महुआखेड़ा थाना प्रभारी और क्षेत्राधिकारी नगर द्वितीय जनपद अलीगढ़ भी इस मामले में सक्रिय हैं। पुलिस ने आसपास के इलाकों में भी तलाशी शुरू कर दी है। जनता से भी अपील की गई है कि यदि किसी को अनुज कुमार के बारे में कोई जानकारी मिलती है, तो वे नीचे दिए गए नंबरों पर सूचना दें।

संपर्क नंबर:

क्षेत्राधिकारी नगर द्वितीय, जनपद अलीगढ़ – 9454401240
प्रभारी निरीक्षक, थाना महुआखेड़ा – 9454402806
उपनिरीक्षक विजेन्द्र यादव, धनिपुर मंडी थाना महुआखेड़ा – 8077035181

यूपी में 34 नए पुलिस उपाधीक्षकों को मिली पहली तैनाती, विभिन्न जिलों और कमिश्नरेट में की गई नियुक्ति

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उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग में प्रशिक्षण पूरा कर चुके 34 पुलिस उपाधीक्षकों को पहली तैनाती मिल गई है। विभाग की ओर से जारी आदेश के अनुसार इन अधिकारियों को प्रदेश के विभिन्न जिलों और पुलिस कमिश्नरेटों में पदस्थापित किया गया है। तैनाती सूची में कई नए नाम शामिल हैं जिन्हें अब अपनी-अपनी ड्यूटी का कार्यभार संभालना है।

देखें लिस्ट

सूची के अनुसार प्रतिज्ञा सिंह को बांदा जिले में पुलिस उपाधीक्षक पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जबकि जयंत यादव को कुशीनगर और अभिषेक कुमार को सीतापुर भेजा गया है। दीप शिखा को मैनपुरी में उनकी पहली पोस्टिंग दी गई है। इसी क्रम में शशि प्रकाश मिश्रा को लखनऊ और अपूर्व पांडे को वाराणसी कमिश्नरेट में नियुक्त किया गया है।

महाराजगंज जिले में बसंत सिंह को पुलिस उपाधीक्षक के रूप में भेजा गया है। संकल्प दीप कुशवाहा को एटा, नारायण दत्त मिश्र को बहराइच, मयंक मिश्रा को अयोध्या और ऋतिक कपूर को सुल्तानपुर में उनकी नई जिम्मेदारी मिली है। अभिमन्यु त्रिपाठी को खीरी, पीयूष कुमार पांडे को झांसी और क्रिश राजपूत को मऊ में तैनाती दी गई है।

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इनका नाम भी है शामिल

इसी तरह गायत्री यादव को मिर्जापुर, मनोज कुमार गंगवार को औरैया, सुधीर सिंह को मेरठ, रोहिणी यादव को सिद्धार्थनगर, प्रभा पटेल को हरदोई और आकृति पटेल को पीलीभीत भेजा गया है। अभय कुमार वर्मा को फतेहगढ़, अनुभव राजर्षि को गाज़ीपुर और आकांक्षा गौतम को बिजनौर में पदस्थापित किया गया है। शुभम वर्मा को शाहजहांपुर, अमित कुमार को संत कबीर नगर और देवराज सिंह को बलिया में तैनाती मिली है।

अंत में, कुलदीप सिंह यादव को बस्ती, अवनीश कुमार सिंह को इटावा, शशांक श्रीवास्तव को बुलंदशहर, गौरव उपाध्याय को महोबा, विनी सिंह को उन्नाव और अपूर्व पांडे को यूपी-112 लखनऊ में तैनाती दी गई है। वहीं सहायक पुलिस आयुक्त स्तर पर शशि प्रकाश मिश्रा को लखनऊ कमिश्नरेट, हरे कृष्णा शर्मा को आगरा, अरुण पाराशर को प्रयागराज और अपूर्व पांडे को वाराणसी कमिश्नरेट में जिम्मेदारी सौंपी गई है।

जब्त केमिकल की जांच बना मौत का कारण, नौगाम थाने का विस्फोट हादसा घोषित

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श्रीनगर के नौगाम थाने में शुक्रवार देर रात हुआ विस्फोट अब एक बड़े हादसे के रूप में सामने आ रहा है। प्रारंभिक जांच में स्पष्ट हुआ है कि यह कोई आतंकी हमला नहीं था, बल्कि जब्त किए गए रसायनों की फोरेंसिक जांच के दौरान हुई गंभीर चूक इसका कारण बनी। इस धमाके में अब तक नौ लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि कई घायलों का उपचार जारी है।

ऐसे हुआ हादसा

जांच टीम के अनुसार, फरीदाबाद की अल-फलाह यूनिवर्सिटी से बरामद किए गए रासायनिक पदार्थ—एसिटोफेनोन, हाइड्रोजन पेरोक्साइड और सल्फ्यूरिक एसिड—को नौगाम थाने में जांच के लिए रखा गया था।

इन्हीं के मिश्रण का नमूना तैयार करते समय तेज रोशनी पड़ने से अचानक रिएक्शन हुआ और वह पल भर में भीषण धमाके में बदल गया। विशेषज्ञों का कहना है कि ये रसायन एसीटोन पेरोक्साइड जैसे उच्च संवेदनशील विस्फोटक के निर्माण में उपयोग होने वाले तत्व हैं, इसलिए हल्की असावधानी भी भारी पड़ सकती है।

थाने में करीब 360 किलो रासायनिक सामग्री एक साथ रखी हुई थी, जिससे विस्फोट की तीव्रता और बढ़ गई। धमाका इतना शक्तिशाली था कि थाने का बड़ा हिस्सा धराशायी हो गया और आसपास के क्षेत्र में भी कंपन महसूस किया गया।

डीजीपी ने दी जानकारी 

डीजीपी नलिन प्रभात और संयुक्त सचिव (कश्मीर) प्रशांत लोखंडे ने प्रेस ब्रीफिंग में साफ कहा कि यह पूरी तरह एक दुर्घटना थी। उन्होंने बताया कि फोरेंसिक टीम रसायनों की संवेदनशील प्रकृति को ध्यान में रखते हुए सावधानी बरत रही थी, लेकिन नमूने से छेड़छाड़ के दौरान अचानक यह हादसा हो गया। जांच की निगरानी शहर के एसएसपी डॉ. जीवी संदीप चक्रवर्ती कर रहे हैं।

यह मामला उस व्हाइट कॉलर टेरर नेटवर्क की जांच से भी जुड़ा है, जिसका पर्दाफाश पिछले महीने हुआ था। नौगाम में लगाए गए भड़काऊ पोस्टरों की जांच से शुरू बनी यह कड़ी डॉक्टरों, मौलवी और अन्य लोगों तक जा पहुंची।

इसी केस से जुड़े रसायन और बरामदगी नौगाम थाने में सुरक्षित रखी गई थी। पुलिस ने इस मामले में अल-फलाह यूनिवर्सिटी के दो डॉक्टरों सहित कई लोगों को गिरफ्तार किया था। इसी मॉड्यूल के सदस्य उमर नबी पर लाल किला क्षेत्र में धमाका करने का आरोप है।